
विजय तांबे, सेवाग्राम, वर्धा
अब तक की पूरी चर्चा के सार के रूप में हम यह कह सकते हैं कि हमारे सामने एक बिल्कुल नया समाज बन रहा है। ऐसा समाज, जिसमें आत्मसम्मान कमजोर पड़ता जा रहा है और नैतिकता विरल होती जा रही है। भाषा संकट में है। सृजनशीलता की पूरी अवधारणा पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा। सच और झूठ के बीच की रेखा लगातार धुँधली होती जाएगी।
सोशल मीडिया जितनी दुनिया खोलता है, उतनी ही व्यावसायिक सेंसरशिप भी लागू करता है। आपका फोटो, फिल्म या कंटेंट कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, एक सीमा के बाद पैसे के बिना उसका प्रसार संभव नहीं होता। आम लोगों को असहाय और निर्भर बनाने की एक पूरी व्यवस्था खड़ी की जा रही है। इंसान एक वस्तु में बदलता जा रहा है, जिसकी कल्पना शायद पहले किसी ने नहीं की थी।
अगर आपको यह सब अपरिहार्य लगता है और आप इसे शर्मिंदगी के साथ स्वीकार करना चाहते हैं, तो वह आपका निर्णय है। लेकिन यह मत मानिए कि कोई विकल्प नहीं है। विकल्प हमेशा होते हैं। हाँ, उनके लिए तकलीफ उठानी पड़ती है। लेकिन क्या आज तक कोई भी बड़ा बदलाव बिना तकलीफ के आया है?
आख़िरकार हर निर्णय व्यक्तिगत होता है। मेरी ज़िंदगी का उद्देश्य क्या है? क्या आत्मसम्मान के साथ जीना मेरा अधिकार नहीं है? अगर मुझे समृद्ध, संवेदनशील और आत्मसम्मानपूर्ण जीवन जीना है, तो उसके लिए मुझे क्या करना होगा? और वास्तविक परिस्थितियों की सीमाएँ क्या होंगी?
हमें यह स्वीकार करना होगा कि अब हमें AI एआई के साथ जीना है। लेकिन हमें अपने शर्तों पर जीना होगा।
टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी ताकत उसकी उत्पादन क्षमता है, और उसी उत्पादन को बेचने के लिए मार्केटिंग और विज्ञापन की विशाल व्यवस्था बनाई गई है।
इस व्यवस्था ने हमारे सोचने और निर्णय लेने की क्षमता पर कितना कब्जा कर लिया है, इसका हमें अंदाज़ा भी नहीं। हमारी खरीदारी के फैसले भी वही तय करने लगे हैं, क्योंकि प्रतिष्ठा और सफलता के मानक भी वही बना रहे हैं। हमें गिनीपिग बनाकर उपभोक्तावाद के नए-नए इंजेक्शन दिए जा रहे हैं।
शुरुआत हमें अपनी ज़िंदगी में छोटे-छोटे बदलावों से करनी होगी। अपनी आवश्यकताओं, ज़रूरतों और उपभोग को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। कोई भी चीज खरीदते समय खुद से दो सवाल पूछिए—
क्या मैं यह चीज सिर्फ उपभोग के लिए खरीद रहा हूँ, या यह वास्तव में मेरी ज़रूरत है?
अगर मैं यह चीज नहीं खरीदूँ, तो क्या मेरा काम चल सकता है?
इन सवालों के जवाब ही आपके खरीदारी के निर्णय तय करेंगे। और यही निर्णय धीरे-धीरे आपके भीतर बदलाव लाएँगे। आप इस कब्जे वाली व्यवस्था के पंजे से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से सोचना शुरू करेंगे।
बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन उसके खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई गंभीर प्रतिरोध दिखाई नहीं देता। लाखों बेरोजगार घरों में बैठे हैं। मेहनत करके पैसा कमाने में आत्मसम्मान है—इस विचार को फिर से जागृत करना होगा।
रोजगार के लिए बार-बार सरकार की ओर देखने की ज़रूरत नहीं। कुछ दोस्त मिलकर अपने आसपास के लोगों की ज़रूरतों पर चर्चा करें। सोचें कि क्या हम उन ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं? हमारे आसपास कौन-कौन से प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं? उनसे क्या बनाया जा सकता है?
इस तरह सोचकर आपको उद्यमी बनना होगा—वह उद्यमिता, जो हमारी शिक्षा व्यवस्था ने कभी नहीं सिखाई।
इसके लिए पहली शर्त है कि खुद को हर तरह के श्रम और कठिनाई के लिए तैयार किया जाए। किसी भी काम को छोटा या हल्का मत समझिए।
नई उद्यमिता की दो बुनियादी शर्तें होनी चाहिए—
पहली, उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल हो।
दूसरी, उससे रोजगार पैदा हो।
तकनीक का उपयोग मजदूर का श्रम हल्का करने के लिए होना चाहिए, उसे बेरोजगार बनाने के लिए नहीं। क्योंकि जो तकनीक आज किसी और को काम से निकाल रही है, वही कल आपको भी घर बैठा सकती है।
मेरे पास किसी विकल्प का तैयार ब्लूप्रिंट नहीं है। लेकिन मैंने कोई बिल्कुल नई बात भी नहीं कही। यह दरअसल हमारे पुराने मूल्यों को नए समय में नए तरीके से इस्तेमाल करने का प्रयास है।
इस एआई AI श्रृंखला में मेरे पास आंकड़ों और उदाहरणों के जरिए केवल वैचारिक बहस खड़ी करने का विकल्प भी था। लेकिन मेरा उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं था। मेरा उद्देश्य पाठक को सोचने के लिए मजबूर करना था। अगर इस सोच के आगे पाठक सक्रिय होकर कुछ करने की दिशा में बढ़ता है, तो मैं खुद को धन्य मानूँगा।
इसी भावना के साथ — समाप्त।
— विजय तांबे : सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक। मराठीमे चार कथासंग्रह प्रकाशित और गोरा लिखित An atheist with Gandhi का मराठी में अनुवाद। चौथी औद्योगिक क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तंत्रज्ञान के सामाजिक परिणाम के अभ्यास में विशेष रुचि। आजकल सेवाग्राम आश्रम, वर्धा के सचिव के रूप में कार्यरत।9869019727
vtambe@gmail.com
AI और हम: एक सामाजिक पड़ताल
इस श्रृंखला के पिछले भाग
भाग 1: Science और Technology का फर्क — और AI की असली चुनौती
Science और Technology को एक ही समझने की गलती हम अक्सर करते हैं। किसी प्रतिष्ठित technologist को हम scientist कह देते हैं, या किसी scientist को technologist बना देते हैं। AI की चुनौती को समझने के लिए दोनों के बीच का फर्क समझना जरूरी है।
https://mediaswaraj.com/science-technology-difference-ai-challenge/
भाग 2: क्या AI सिर्फ एक और कंप्यूटर प्रोग्राम है? नहीं।
प्रोग्रामिंग में इंसान कंप्यूटर को हर कदम का निर्देश देता है। AI में मशीन बड़ी मात्रा में डेटा से पैटर्न सीखती है और नए निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। यही फर्क आज की तकनीकी क्रांति की जड़ में है।
https://mediaswaraj.com/slug-programming-vs-ai-neural-network-explained/
भाग 3: AI और रोजगार — विकास या Jobless Growth?
कौन से रोजगार नष्ट होंगे, किस क्षेत्र में कितने प्रतिशत कामगारों पर असर होगा—यह World Economic Forum से लेकर NITI Aayog तक सबने बताया है। लेकिन नए रोजगार कितने बनेंगे, इस पर सबकी चुप्पी है।
https://mediaswaraj.com/ai-employment-jobless-growth-india/
भाग 4: AI और विषमता — क्या तकनीक असमानता बढ़ा रही है?
AI की वजह से आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है? Oxfam Report क्या कहती है? Jobless Growth का मतलब क्या है? और लाचार समाज कैसे बन रहा है?
https://mediaswaraj.com/slug-ai-economic-inequality-india-hindi/
भाग पाँच : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सूचना. क्या हमारा दिमाग़ जंग खा रहा है?
क्या ChatGPT और AI चैटबॉट हमारी सोचने, विश्लेषण करने और रचनाशील बनने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं? विजय तांबे का यह लेख AI के सामाजिक और बौद्धिक प्रभावों की गहरी पड़ताल करता है।
भाग 6: AI और राजनीति — मन बदलने की मशीन
लोकतंत्र इस धारणा पर टिका है कि नागरिक उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। लेकिन अगर जानकारी का प्रवाह, उसका चयन और उसका प्रस्तुतीकरण एल्गोरिदम नियंत्रित करने लगें तो क्या होगा?
क्या AI चुनावी प्रचार को अधिक प्रभावी बनाएगा या मतदाताओं को प्रभावित करने का नया हथियार बनेगा?
क्या डीपफेक, माइक्रो-टार्गेटिंग और डेटा विश्लेषण लोकतंत्र की प्रकृति बदल रहे हैं?
और क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ मशीनें सिर्फ हमारे सवालों के जवाब नहीं देंगी, बल्कि हमारे राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करेंगी?
भाग 7- AI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मानव कल्याण
सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि technology सरकारी हो या private — काम करने वाले मजदूर से लेकर शिक्षित कर्मचारी तक सब लोग अपने काम से बेदखल होने वाले हैं। वे कहाँ जाएंगे? उनका भविष्य क्या होगा?
भाग – 8 AI एक सामाजिक पड़ताल
AI से बढ़ती बेरोजगारी के बीच Universal Basic Income (UBI) की बहस तेज है। क्या भारत में UBI संभव है या यह आत्मनिर्भरता और लोकतंत्र के लिए चुनौती बनेगा?



