
भारत में ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए सरकार ने एथनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम को बेहद आक्रामक तरीके से लागू किया है। इसे Eco Friendly या पर्यावरण हितैषी कहकर बेंचा जा रहा है .
वर्तमान में पूरे देश में पेट्रोल में 20% एथनॉल (E20 Fuel) मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है, और आने वाले समय के लिए सरकार E22 से E30 (22% से 30%) तक के उच्च मिश्रणों के लिए मानक तय कर रही है।
इस नीति के फायदे और इसके पीछे छिपे गंभीर नुकसानों (वाहन, पर्यावरण, स्वास्थ्य और राजनीतिक साठगांठ) का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:
1. वाहनों को नुक़सान (कार, मोटरसाइकिल और स्कूटर)
पेट्रोल पंपों पर मिलने वाला E20 ईंधन आधुनिक गाड़ियों के लिए तो ठीक हो सकता है, लेकिन देश की करोड़ों पुरानी गाड़ियों (Legacy Vehicles) के लिए यह एक ‘धीमा जहर’ साबित हो रहा है:
पुर्जों का गलना और सड़ना:
एथनॉल एक कड़ा विलायक (Harsh Solvent) है। यह पुरानी गाड़ियों (विशेषकर 2023 से पहले बनी) के ईंधन तंत्र में मौजूद रबर की नली (Hoses), प्लास्टिक के फिल्टर, और गैसकेट (Seals) को धीरे-धीरे गला देता है। इसके टूटे हुए कण इंजन के इंजेक्टर्स को ब्लॉक कर देते हैं।
पानी को सोखना (Phase Separation):
एथनॉल हवा से नमी (पानी) को बहुत तेजी से सोखता है। जब ईंधन टैंक में पानी की मात्रा बढ़ जाती है, तो एथनॉल और पानी का मिश्रण पेट्रोल से अलग होकर टैंक की तली में बैठ जाता है। जब फ्यूल पंप इस पानी वाले हिस्से को उठाता है, तो गाड़ी अचानक चलते-चलते बंद हो जाती है (मिसफायरिंग) और इंजन को भारी नुकसान पहुँचता है।
धातुओं में जंग (Corrosion):
पानी सोखे हुए एथनॉल का स्वभाव अम्लीय (Acidic) हो जाता है। यह एल्युमिनियम, लोहे और स्टील के पुर्जों (जैसे कार्बोरेटर और फ्यूल पंप) में तेजी से जंग लगाता है।
माइलेज में भारी गिरावट:
एथनॉल में शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले
लगभग 30% कम ऊर्जा घनत्व (Energy Density) होता है। नतीजा यह है कि गाड़ी चलाने के लिए इंजन को ज्यादा ईंधन फूंकना पड़ता है, जिससे गाड़ियों का माइलेज 5% से 10% तक घट जाता है। ग्राहकों को नुकसान यह है कि वे पैसे तो शुद्ध पेट्रोल के दे रहे हैं, लेकिन उन्हें कम माइलेज वाला ईंधन मिल रहा है।
2. पर्यावरण: हवा, पानी और ज़मीन का प्रदूषण
भले ही एथनॉल को “ग्रीन फ्यूल” कहकर प्रचारित किया जाता है क्योंकि यह शहरों में गाड़ियों के धुएं (कच्चे कार्बन) को कम करता है, लेकिन इसके उत्पादन का लाइफसाइकिल (Lifecycle) पर्यावरण के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है:
भूजल का अंधाधुंध दोहन (पानी संकट):
भारत में एथनॉल मुख्य रूप से गन्ने (शीरे/Molasses) और टूटे चावल/मक्के से बनता है। गन्ना और धान दोनों ही पानी सोखने वाली फसलें हैं। एक लीटर एथनॉल बनाने में हजारों लीटर पानी की खपत होती है, जिससे उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भूजल (Groundwater) का स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है।
जहरीला औद्योगिक कचरा (Spent Wash):
गन्ने के शीरे से एथनॉल बनाने के दौरान भारी मात्रा में गाढ़ा, बदबूदार और जहरीला तरल कचरा निकलता है, जिसे ‘स्पेंट वॉश’ कहते हैं। कई फैक्ट्रियां इसे चोरी-छिपे नदियों या जमीनों में बहा देती हैं। इससे जमीनों की उर्वरता खत्म हो रही है और नदियों का ऑक्सीजन स्तर गिरने से जलीय जीव मर रहे हैं। (जैसे पंजाब के जीरा और असम के गोलपारा में देखा गया)।
हवा में जहर और कोयले का इस्तेमाल:
एथनॉल को डिस्टिल (साफ) करने के लिए भारी मात्रा में गर्मी (Steam) की जरूरत होती है। इसके लिए देश की अधिकांश एथनॉल भट्टियां (Distilleries) कोयला जलाती हैं । यानी शहरों की हवा साफ करने के नाम पर ग्रामीण इलाकों की हवा में कोयले का सल्फर डाइऑक्साइड (SO_2) और PM_{2.5} घोला जा रहा है।
3. जन-स्वास्थ्य को नुकसान
एथनॉल प्लांटों के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदायों के स्वास्थ्य पर इसका सीधा और खौफनाक असर दिख रहा है:
सांस की बीमारियां:
फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाली गैसों और उड़ती हुई बॉयलर राख (Ash) के कारण आसपास के गांवों और स्कूलों में बच्चों और बुजुर्गों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सांस फूलने की बीमारियां तेजी से बढ़ी हैं।
कैंसर और त्वचा रोग:
जहां फैक्ट्रियों ने ‘रिवर्स बोरिंग’ या रिसाव के जरिए केमिकल युक्त पानी जमीन के नीचे डाला है, वहां का पीने का पानी जहरीला हो चुका है। भूजल में भारी धातुओं (Heavy Metals) और सायनाइड जैसे रसायनों के मिलने से स्थानीय लोगों में किडनी फेलियर, त्वचा के गंभीर रोग और कैंसर के मामले रिपोर्ट हो रहे हैं।
नारकीय बदबू:
एथनॉल निर्माण के दौरान उठने वाली खमीर (Fermentation) की सड़न इतनी तीव्र होती है कि आसपास के गांवों के लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाता है, जिससे उल्टी और माइग्रेन की समस्याएं आम हैं।
भारत में उत्पादन के मुख्य केंद्र
भारत में एथनॉल का उत्पादन उन राज्यों में सबसे ज्यादा है जो कृषि में समृद्ध हैं:
उत्तर प्रदेश: देश के कुल एथनॉल उत्पादन में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी यूपी की है। मुख्य जिले: लखीमपुर खीरी, बिजनौर, बलरामपुर, सीतापुर, गोंडा और बरेली। इसके अलावा फर्रुखाबाद जैसे जिले मक्के से एथनॉल बनाने के बड़े केंद्र बन रहे हैं।
महाराष्ट्र: चीनी मिलों के बड़े नेटवर्क के कारण पश्चिमी बेल्ट (कोल्हापुर, पुणे, अहमदनगर, सोलापुर, सांगली) एथनॉल का गढ़ है।
कर्नाटक: बेलगावी (बेलगाम), बागलकोट और मांड्या में देश की कुछ सबसे बड़ी डिस्टिलरीज हैं।
बिहार और असम: बिहार (पश्चिम चंपारण) अनाज आधारित एथनॉल में आगे बढ़ रहा है, जबकि असम (गोलाघाट, गोलपारा) में अनाज के साथ-साथ बांस (Bamboo) से एथनॉल (2G Ethanol) बनाने के अनूठे प्रयोग हो रहे हैं।
सरकार इसे क्यों बढ़ावा दे रही है?
सरकार के पास इस नीति को बढ़ावा देने के ठोस आर्थिक और रणनीतिक कारण हैं:
विदेशी मुद्रा की बचत (Forex Savings):
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। पेट्रोल में 20% एथनॉल मिलाने से हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
चीनी मिलों और किसानों का भुगतान: जब बाजार में चीनी सरप्लस (ज्यादा) हो जाती है, तो कीमतें गिर जाती हैं और मिलें किसानों का गन्ने का बकाया नहीं चुका पातीं। सरकार ने मिलों को अतिरिक्त गन्ने/शीरे को सीधे एथनॉल में बदलने की छूट दी, जिससे मिलों के पास नकदी आई और किसानों का भुगतान समय पर होने लगा।
वैश्विक पर्यावरण लक्ष्य:
पेरिस समझौते और कार्बन उत्सर्जन कम करने के अंतरराष्ट्रीय दबाव के तहत सरकार को दिखाना है कि भारत जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) का उपयोग कम कर रहा है।
क्या इसके पीछे ‘भ्रष्टाचार’ और राजनीतिक साठगांठ भी है?
इस पूरी नीति के क्रियान्वयन में “क्रोनी कैपिटलिज्म” (Crony Capitalism – नीतिगत साठगांठ) और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगते रहे हैं:
नेताओं और मंत्रियों के परिवारों का हित:
भारत में चीनी मिलें और एथनॉल डिस्टिलरीज सीधे तौर पर बड़े राजनीतिक घरानों (चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के) के नियंत्रण में हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के बेटों से जुड़ी कंपनियों (जैसे मानस एग्रो, सियान एग्रो) के एथनॉल टर्नओवर और शेयर की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों गुना का उछाल आया है, जिसे लेकर सोशल मीडिया और स्वतंत्र मीडिया में तीखे सवाल उठाए गए हैं। जब नीति बनाने वाले और नीति से सीधे अरबों का मुनाफा कमाने वाले लोग एक ही हों, तो हितों का टकराव (Conflict of Interest) साफ दिखता है।
सब्सिडी और सरकारी खजाने की लूट: सरकार एथनॉल प्लांट लगाने के लिए भारी सब्सिडी, बैंकों से सस्ते कर्ज (Interest Subvention Schemes) और टैक्स में छूट दे रही है। इस रेवड़ी का सबसे ज्यादा फायदा बड़े कॉरपोरेट्स और राजनीतिक रूप से रसूखदार लोगों को मिल रहा है, जबकि आम जनता को पेट्रोल की कीमत में कोई राहत नहीं मिल रही।
नियामकों (Regulators) की साठगांठ:
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जैसे UPPCB या PCBA) स्थानीय स्तर पर इन फैक्ट्रियों के प्रदूषण को नजरअंदाज करते हैं। प्रदूषण की शिकायत करने वाले ग्रामीणों की आवाज को दबा दिया जाता है और पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) के नियमों को ताक पर रखकर फैक्ट्रियों को क्लीन चिट दे दी जाती है, जो बिना बड़े स्तर के भ्रष्टाचार के संभव नहीं है।
खाद्य सुरक्षा बनाम ईंधन का खेल:
जब गन्ने से एथनॉल कम पड़ने लगा, तो सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से गरीबों के हिस्से का चावल और मक्का बेहद सस्ते दामों पर एथनॉल कंपनियों को देना शुरू कर दिया। इस अनाज डाइवर्जन के पीछे भी बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी और कोटे के आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं।
निष्कर्ष:
एथनॉल ब्लेंडिंग नीति कागजों पर देश की अर्थव्यवस्था के लिए जितनी फायदेमंद दिखती है, जमीनी हकीकत में इसने आम वाहन मालिकों की जेब (कम माइलेज और इंजन डैमेज), पर्यावरण की सेहत और ग्रामीण भारत के जन-स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ किया है, जिसका सीधा मुनाफा चुनिंदा रसूखदार उद्योगपतियों और राजनेताओं की जेब में जा रहा है।



