
विजय तांबे, सेवाग्राम, वर्धा
आधुनिक तकनीकी के जमाने में किसी भी product की supply, demand से ज्यादा ही रहती है। क्योंकि production उत्पादन तेजी से चलता रहता है। देश के पूरे production उत्पादन का हिसाब हमें GDP दिखाता है। Production बढ़ा तो GDP बढ़ा — मतलब देश की तरक्की हुई, ऐसा कहने का रिवाज है। जितना GDP बढ़ेगा उतना रोजगार बढ़ेगा — यह पहले सिखाया जाता था। लेकिन सच यह है कि जितना GDP ज्यादा, उतना रोजगार बढ़ने की दर कम होती है। इसी को Jobless Growth कहते हैं।
तकनीकी जैसे-जैसे आगे बढ़ी, नई-नई मशीनें आती गईं। Robotics, IoT, automation की तरफ हम कब चले गए पता ही नहीं चला। Garment factory से लेकर car factory तक कामगारों की संख्या घटती गई। विदेशों में एक दिन में दस-बारह हजार t-shirts बनाने वाली फैक्ट्री में कामगारों की संख्या दस से भी कम है। Automation ऑटोमेशन अब चरम सीमा तक पहुँच गया है। बड़े कारखानों का automation पूरा हुए कई साल गुजर गए हैं।
इसी समय market में AI की entry हुई।
Social media पर हमने सबसे ज्यादा ChatGPT का नाम सुना है। लेकिन अलग-अलग काम के लिए हजारों AI chatbots internet पर उपलब्ध हैं। इन chatbots ने हर क्षेत्र में हलचल मचा दी है। 2023 में Hollywood के पटकथा लेखक AI के इस्तेमाल के खिलाफ हड़ताल पर गए। Screenplay से लेकर संगीत तक कई क्षेत्रों में AI अहम हो गया है। Advertising, media भी इससे अछूते नहीं। Legal क्षेत्र में भी बहुत सारे काम AI से हो सकते हैं।
कई साल पहले ऑटोमेशन की वजह से कामगारों की संख्या घटती गई। अब AI के आने के बाद banking, IT, legal, entertainment — सभी उद्योगों की white collar jobs खतरे में आ गई हैं। जिन नौकरियों से मध्यमवर्ग बना, वही अब फँस गया है। नए घर की EMI, बच्चों की स्कूल की भारी fees की चिंता के साथ अब अपनी नौकरी की गारंटी भी नहीं रही।
अब सवाल उठता है — बचेगा कौन?
AI क्षेत्र में उच्च दर्जे के शिक्षित और नई सोच रखने वालों की जरूरत है। Industry में टिके रहने के लिए बार-बार नया सीखना पड़ेगा — क्या यह इंसान के लिए हमेशा संभव होगा? कुछ ऐसे काम हैं जो AI-based robots करेंगे तो बहुत महंगे पड़ेंगे। वहाँ इंसानी काम फायदेमंद रहेगा। Plumber और electrician इसके अच्छे उदाहरण हैं।
एक जमाने में स्थायी नौकरी होती थी और वहीं से रिटायर होते थे। पेंशन भी मिलती थी। बाद में पेंशन बंद हो गई। फिर परमानेंट शब्द निकल गया। Contract संविदा शब्द आया। और अब नया शब्द है — Gig Job। कोई security सुरक्षा नहीं। एक व्यक्ति दो-तीन जगह काम कर सकता है। लेकिन सिद्धांत एक ही है — काम हुआ, पैसा मिला, बात खत्म।
तकनीकी बदलती है तो कई रोजगार नष्ट होते हैं और कई नए बनते हैं — यह कहा जाता है। अभी भी यही होने वाला है, यह एक transitional phase है, डरने की बात नहीं — ऐसा कुछ लोग कहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि “Intelligence” शब्द technology के इतिहास में पहली बार इस्तेमाल हुआ है।
कौन से रोजगार नष्ट होंगे, किस क्षेत्र में कितने प्रतिशत कामगारों पर असर होगा — यह World Economic Forum से लेकर हमारे Niti Aayog तक सबने बताया है। लेकिन नए रोजगार कितने बनेंगे — इस पर सबकी चुप्पी है। कारण यह है कि यह technology किस रफ्तार से, एक साथ किन-किन दिशाओं में फैलेगी — यह भविष्य कोई नहीं बता सकता।
अगले भाग में: AI और विषमता — अमीर-गरीब की बढ़ती खाई
विजय तांबे : सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक। मराठी में चार कथासंग्रह प्रकाशित। गोरा की किताब An Atheist with Gandhi का मराठी अनुवाद। चौथी औद्योगिक क्रांति और AI के सामाजिक परिणामों के अध्ययन में विशेष रुचि। वर्तमान में सेवाग्राम आश्रम, वर्धा के सचिव।
“AI का वर्तमान विमर्श देश की असली समस्याओं और उनके कारणों से आपको दूर ले जाना है। इसे कभी तो रोकना होगा। यह लेख श्रृंखला उसे रोकने की शुरुआत है — और आपके सोचने की भी।”
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कृपया इससे पहले का लेख भाग दो यहाँ पढ़ें :
लेखमाला का पहला भाग यहाँ पढ़ें :
आगे क्या है
4. AI और विषमता — अमर-गरीब की खाई
5. AI और सोचना — क्या हमारा दिमाग जंग खा रहा है?
6. AI और राजनीति — मन बदलने की मशन
7. AI और मानव कल्याण — क्या सचमुच होगा?
8. AI और UBI — बेरोजगारी का जवब या नया जाल?
9. विकल्प है! — हमारे terms पर जीना
क्रमश :



