
विजय तांबे , सेवाग्राम वर्धा
कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी से लेकर डॉक्टर अंबेडकर तक किसी ने भी ‘ जॉब्लेस ग्रोथ ‘ यह शब्द समूह इमेजिन नहीं किया होगा। कितने जॉब लेस हो जाएंगे उसका अंदाज 2016 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अध्यक्ष क्लाउज श्वाबने उनकी पुस्तक में लिखा था।
AI और जॉब्लेस ग्रोथ
52% से 59% तक रोजगार नष्ट होगा, 35% रोजगार का स्वरूप बदलेगा और 6% नए रोजगार निर्माण होंगे। 2018 में भारत के नीति आयोग ने उनके अंदाज में फर्क नहीं किया। 2023 से कई AI और आईटी कंपनियों ने फैलने वाली बेरोजगारी के बारे में इशारा दिया। यह AI कौन से स्पीड से कैसे बदलेगा कुछ कह नहीं सकते। आने वाला मॉडल हमेशा एडवांस और नेक्स्ट वर्जन ही रहता है इसलिए धोखा तो बढ़नेवाला है।
हम बेरोजगार लोगों को जान से मार नहीं सकते? तो बढ़ती हुई बेरोजगारी का हम क्या करें? कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बढ़ते ऑटोमेशन पर कंपनी को अलग टैक्स लगाना। टैक्स से इकट्ठा होने वाली राशि बेरोजगार व्यक्ति को प्रशिक्षित करने या उनके कल्याण के लिए इस्तेमाल करना।
वैश्विक स्तर पर यूनिवर्सल बेसिक इन्कम ( यू बी आय) नाम की एक संकल्पना चर्चा में है। आपको रोजगार नहीं है तो एक फिक्स राशि आपको हर महीना देना , ऐसी यह कल्पना है। यह कल्पना का उद्गम हुआ ऐसे समाज में जहां जान संख्या कम है और जान संख्या वृद्धि का रेट मायनस में है। समाज में समृद्धि है। बेरोजगार बहुत ही कम है। ऐसे स्थिति में जो कोई ऑटोमेशन या AI के कारण बेरोजगार होता है, तो उसे मासिक भत्ता देने की कल्पना उभरी। वह उस भत्ते से अपने खुद को टेक्नोलॉजी में अपस्किल करेगा। या चाहे तो संगीत चित्रकलामें मशगूल होगा। यह प्रयोग टेस्टिंग के लिए ऐसे ही देश के विशिष्ट भागों में किया गया।
दुनिया में भौगोलिक स्थिति के अनुसार जनसंख्या के बदलते पैटर्न , भाषा, रीति रिवाज ,धर्म ,संस्कृति, ज़रूरतें, जिन्दगीकी प्राथमिकताएं अलग-अलग है । फिर भी एक ही टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना यह पहली गलती औद्योगिक क्रांति से चालू है। जैसे-जैसे गए दो शतकों से टेक्नोलॉजी फैलती गई. स्टैंडर्डायनाझेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। बढ़ती टेक्नोलॉजी संस्कृति की विविधता को फ्लैट कर देती है। पर अभी उसके परिणाम के इलाज भी स्टैंडर्डाइज्ड करने का सोच रहे हैं।
AI से बढ़ती बेरोजगारी और UBI की बहस: भारत के लिए क्या रास्ता?
भारत में लगभग 58% लोगों को मुफ़्त अनाज दिया जाता है। यह सब लोग ग़रीबी रेखा के आसपास है या नीचे है। हर साल ए आय से बेरोजगार होने वालों की संख्या बढ़ने वाली है। इसका मतलब गरीब लोगों की संख्या बदलने वाली नहीं है। क्या हम 85 करोड़ लोगों को महीना ₹10000 यूबीआई दे सकते हैं? मतलब हर महीना सिर्फ 85000 करोड़ देना है? समझो दिया तो बाकी सब सब्सिडी और सोशल सिक्योरिटी स्कीम बंद करनी पड़ेगी। बाद में फिर वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे।
हमारी सब संकल्पनाएं इंपोर्टेड होती है। कल्पनाशीलता , सर्जकताका कभी इस्तेमाल करना ही नहीं ऐसा हमने सोचा है क्या?
AI के दौर में रोजगार, आत्मसम्मान और UBI का सवाल
मूलत किसी भी गरीब से गरीब आदमी को श्रम से पैसा कमाने में आत्मसम्मान मिलता है। यू बी आय स्कीम मतलब आदमी के आत्मसम्मान का खच्चीकरण करना, उसको लाचार बनाके पैसा फेंकना और उसे गुलाम बनाना।
मध्य प्रदेश से शुरुआत हुई लाडली बहन स्कीम अभी सभी राज्यों में हर इलेक्शन से पहले चालू होती है। महिलाओं को लाचार बनाकर सत्ता अपने हाथों कायम रखने का यह षड्यंत्र है। यह लोक शाही का मजाक है। हम नागरिक नहीं लाचार मतदाता बना रहे हैं। क्या इसका विकल्प नहीं हो सकता? क्या हम अलग सोच नहीं सकते?
लेखक : विजय तांबे सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक। मराठीमे चार कथासंग्रह प्रकाशित और गोरा लिखित An atheist with Gandhi का मराठी में अनुवाद। चौथी औद्योगिक क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तंत्रज्ञान के सामाजिक परिणाम के अभ्यास में विशेष रुचि। आजकल सेवाग्राम आश्रम, वर्धा के सचिव के रूप में कार्यरत।/ 9869019727 vtambe@gmail.com
AI और हम: एक सामाजिक पड़ताल
इस श्रृंखला के पिछले भाग
भाग 1: Science और Technology का फर्क — और AI की असली चुनौती
Science और Technology को एक ही समझने की गलती हम अक्सर करते हैं। किसी प्रतिष्ठित technologist को हम scientist कह देते हैं, या किसी scientist को technologist बना देते हैं। AI की चुनौती को समझने के लिए दोनों के बीच का फर्क समझना जरूरी है।
https://mediaswaraj.com/science-technology-difference-ai-challenge/
भाग 2: क्या AI सिर्फ एक और कंप्यूटर प्रोग्राम है? नहीं।
प्रोग्रामिंग में इंसान कंप्यूटर को हर कदम का निर्देश देता है। AI में मशीन बड़ी मात्रा में डेटा से पैटर्न सीखती है और नए निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। यही फर्क आज की तकनीकी क्रांति की जड़ में है।
https://mediaswaraj.com/slug-programming-vs-ai-neural-network-explained/
भाग 3: AI और रोजगार — विकास या Jobless Growth?
कौन से रोजगार नष्ट होंगे, किस क्षेत्र में कितने प्रतिशत कामगारों पर असर होगा—यह World Economic Forum से लेकर NITI Aayog तक सबने बताया है। लेकिन नए रोजगार कितने बनेंगे, इस पर सबकी चुप्पी है।
https://mediaswaraj.com/ai-employment-jobless-growth-india/
भाग 4: AI और विषमता — क्या तकनीक असमानता बढ़ा रही है?
AI की वजह से आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है? Oxfam Report क्या कहती है? Jobless Growth का मतलब क्या है? और लाचार समाज कैसे बन रहा है?
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भाग पाँच : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सूचना. क्या हमारा दिमाग़ जंग खा रहा है?
क्या ChatGPT और AI चैटबॉट हमारी सोचने, विश्लेषण करने और रचनाशील बनने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं? विजय तांबे का यह लेख AI के सामाजिक और बौद्धिक प्रभावों की गहरी पड़ताल करता है।
भाग 6: AI और राजनीति — मन बदलने की मशीन
लोकतंत्र इस धारणा पर टिका है कि नागरिक उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। लेकिन अगर जानकारी का प्रवाह, उसका चयन और उसका प्रस्तुतीकरण एल्गोरिदम नियंत्रित करने लगें तो क्या होगा?
क्या AI चुनावी प्रचार को अधिक प्रभावी बनाएगा या मतदाताओं को प्रभावित करने का नया हथियार बनेगा?
क्या डीपफेक, माइक्रो-टार्गेटिंग और डेटा विश्लेषण लोकतंत्र की प्रकृति बदल रहे हैं?
और क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ मशीनें सिर्फ हमारे सवालों के जवाब नहीं देंगी, बल्कि हमारे राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करेंगी?
भाग 7- AI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मानव कल्याण



