Tag: ईशावास्य
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निज-पर के भेद को मिटाना ईश्वर के ज्ञान का फल
संत विनोबा वेद प्रवचन करते हुए कहते हैं कि ईशावास्य – बोध* मंत्र 4 और 5 का एक स्वतंत्र परिच्छेद होता है। उसका सार है कि ईश्वर की शक्ति अलौकिक है। वह असीम है उसके बारे में हम तर्क नहीं कर सकते। हमारे तर्क से वह सीमित हो जायेगा। गीता में बताया है कि ईश्वर…
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मन को देह से अलग पहचानें
संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद अंश मंत्र आठ का अवशेष भाग बताते हुए कहते हैं कि कहने का तात्पर्य है कि ये सारी अनुभूतियां हमें आनी चाहिए। हमको महसूस होना चाहिए कि हम देह से, उसके गुण-दोषों से अलग हैं। उसी तरह मन से भी अपना अलगाव पहचानना चाहिए। अपापविद्वम से यह सूचित होता है। पाप…
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अखंड दर्शन से मोह-शोक नहीं होता
आज का वेद चिंतन विचार संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद के 7वें मंत्र पर कहते हैं कि आज सुबह हम जगन्नाथ दास का भागवत पढ़ रहे थे। उसमें श्रीकृष्ण के अंतकाल के समय कवि कहता है कि अब मैं अनाथ हो गया हूं। उसने देखा कि वह धागा खंडित हो गया है। लेकिन वह उसने उपासना…
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ज्ञानी सभी को आत्मस्वरूप देखता है
संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का मंत्र 7 पढ़ते हुए कहते हैं – *यस्मिन सर्वानि भूतानि आतमैवआभ्रद् विजानतः तत्र को मोह: क: शोक: एकत्वमनुपश्यत। मंत्र छह में बताया कि आत्मज्ञानी अपने में सब भूतों को और सब भूतों में अपने को देखता है। इस तरह जो विश्व और आत्मा को एक-दूसरे से ओतप्रोत देखता है, उसको…
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आत्मतत्व : अज्ञानी के लिए दूर, ज्ञानी के लिए पास
आत्मतत्व के बारे में बताते हुए संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का पांचवा मंत्र पढ़ते हैं – तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तदु अन्तिके तद् अंतरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत: विनोबा कहते हैं कि मंत्र 4 से आत्मतत्व का वर्णन चल रहा है। तद एजति – वह हलचल करता है, तत् न एजति – वह हलचल नहीं…
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प्राण का आधार कभी खंडित नहीं होता
संत विनोबा बताते हैं कि ईशावास्य उपनिषद के अनुसार प्राण का आधार कभी खंडित नहीं होता। इसलिए प्राण तो रहता ही है परंतु हमें मालूम नहीं होता और प्राणवायु की हलचल समाप्त हुई तो हम कहते हैं कि मनुष्य मर गया। परंतु उसका मतलब इतना ही है कि यंत्र बंद हो गया, अब इस यंत्र…
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प्रकाश से अधिक गति मन की, ईश्वर सबसे गतिवान
आज का वेद चिंतन विनोबा भावे ईशावास्य उपनिषद काचौथा मंत्र पढ़ते हैं – अनेजदेकं मनसो जवीयः नैनददेवा आपप्नुवन् पूर्वमर्षत्तद्धावतोडन्यान् अत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपना मातरिश्वा दधाति। ईशावास्य के प्रथम तीन मंत्रोें में एक पूर्ण जीवन-विचार बताया। 1-ईश्वरनिष्ठा 2-कर्मयोग 3- भोगासक्त जीवन का परिणाम। अब मंत्र 4-5 में आत्मा के स्वरूप का वर्णन है। ईश्वर और आत्मा एक…
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हमें खुद कर्म करना चाहिए
आज का वेद चिंतन विनोबा भावे ईशावास्य उपनिषद का तीसरा मंत्र पढ़ते हैं – असुर्या नाम ते लोकाः अंधेन तमसावृताःतांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः प्रथम मंत्र में ऋषि ने कहा, जगत् में जो कुछ जीवन है, यानी जीवनवान है, उसमें ईश्वर बसता है, वह सब ईश्वर का बसाया हुआ है। इसलिए तू त्यागपूर्वक भोगता…
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मुक्ति के लिए कर्म छोड़ने की जरूरत नहीं
आज का वेद चिंतन विचार ईशावास्य उपनिषद जिजीविषेत् शतं समाः – जिजीविषा यानी जीने की इच्छा। समाः शब्द संवत्सर का पुराना रूप है। सौ साल जीना है- उसमें उत्साह भी बताया है और मर्यादा भी। वैसे सामान्यतः आयु 60-70 साल की मानी जायेगी। सतयुग में 500 साल, त्रेता में 300 साल, द्वापर में 200 और…
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कर्म करने वाला ही जीने का अधिकारी
संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद मंत्र पढ़ते हैं कि कुर्वनेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतम समा: एवं त्वयि नान्यथेतोअस्ति न कर्म लिप्यते नरे* *कुर्वन् एव इह कर्माणि*- इस दुनिया में कर्म करते – करते सौ साल जीने की इच्छा रखें। कर्म करनेवाला ही जीने का अधिकारी है। जो कर्म – निष्ठा छोड़कर वह भोग वृत्ति रखता है, वह…