कर्म करने वाला ही जीने का अधिकारी

आज का वेद चिंतन विचार

संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद मंत्र पढ़ते हैं कि कुर्वनेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतम समा: एवं त्वयि नान्यथेतोअस्ति न कर्म लिप्यते नरे* *कुर्वन् एव इह कर्माणि*-

इस दुनिया में कर्म करते – करते सौ साल जीने की इच्छा रखें। कर्म करनेवाला ही जीने का अधिकारी है।

जो कर्म – निष्ठा छोड़कर वह भोग वृत्ति रखता है, वह मृत्यु का अधिकारी बनता है।

खाना हम छोड़ सकते हैं लेकिन कर्म योग छोड़ने का शरीरधारी के लिए प्रसंग ही नहीं है । कर्म करते-करते ही सौ साल जीना है।

कर्म में व्यायाम, कर्म में से ज्ञान, कर्म में से आनंद, कर्म ही खेल-कर्म ही यह सब। मनुष्य सौ साल जीने की चाह रखे व्यर्थ जीवन नहीं, सार्थ जीवन।

सार्थ जीवन यानी निरंतर सेवाकार्य करते हुए जीना।

समाज में कुछ लोगों का जीवन अधिक श्रम के कारण क्षीण होता है, कुछ लोगों का जीवन आराम में रहने से, अपचन के कारण क्षीण होता है।

आज की हमारी समाज – व्यवस्था ठीक नहीं है।

भगवान ने हाथ दिया है, उसका उपयोग करके, तथा बुद्धि दी है, उसका भी उपयोग करके, प्रत्येक मनुष्य को उत्पादन-कार्य में भाग लेना होगा और सृष्टि की सेवा करते हुए जीना है।

हिंदुस्तान में सेवा और भक्ति का मेल बैठाने का काम रामकृष्ण मिशन ने किया।

सिर्फ भक्ति के साथ ही नहीं, अद्वैत वेदांत के साथ भी उन्होंने सेवा को जोड़ने का प्रयत्न किया।

और सेवा को उत्पादक परिश्रम के साथ जोड़ने का काम गांधीजी ने किया।

कर्म करने का अर्थ है, उत्पादन- कार्य करना,सेवा – कार्य करना।

देह के साथ मनुष्य को कर्मरूपी एक महान साधन प्राप्त हुआ है, ऐसी भावना के साथ कर्म होना चाहिए ।

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