ज्ञानी

ज्ञानी सभी को आत्मस्वरूप देखता है

ज्ञानी
प्रस्तुति : रमेश भैया

संत विनोबा ईशावास्य उपनिषद का मंत्र 7 पढ़ते हुए कहते हैं – *यस्मिन सर्वानि भूतानि आतमैवआभ्रद् विजानतः तत्र को मोह: क: शोक: एकत्वमनुपश्यत।

मंत्र छह में बताया कि आत्मज्ञानी अपने में सब भूतों को और सब भूतों में अपने को देखता है।

इस तरह जो विश्व और आत्मा को एक-दूसरे से ओतप्रोत देखता है, उसको अरुचि नहीं होती है।

अब मंत्र सात में बता रहे हैं कि ज्ञानी पुरुष सब भूतों को आत्मस्वरूप ही देखता है जो – जो मिलता है उसमें अपना ही रूप उसे दिख पड़ता है।

तुकाराम ने कहा है – तुका म्हने जें जें भेंटे , तें तें वाटे मी ऐसे ,जो – जो मिलता है मैं ही मुझे मिलता हूँ। ऐसा लगता है मेरा ही मुझसे मिलन हो रहा है।

जो इस तरह एकत्व का अनुदर्शन करता है, उसे मोह और शोक नहीं होते।

यस्मिन् सर्वांनि भूतानि आत्मा एव अभ्रत्- जिस पुरुष के लिए सर्व भूत आत्मस्वरूप हो गए। यानी वह भूतों की भूतता देखता नहीं।

सुवर्ण का आकार, रूप नहीं देखता, सुवर्ण ही देखता है।

इसके पहले के मंत्र में आत्मा में सर्व भूत और भूतों में आत्मा ऐसी परस्पर ओतप्रोतता बताई थी। उसे भक्तिभाव कह सकते हैं।

उस भाषा में कुछ प्रेम का अंश था। प्रेम में अरुचि का प्रश्न नहीं उठता। परंतु इस मंत्र में एक कदम आगे बढ़े हैं । भाषा में जो भेद था, वह हटा दिया है।

इसमें कहा कि सर्व भूत आत्मा ही हो गए। यह इसमें ओत है और वह उसमें प्रोत है ,इस तरह अलग से गिनती करने के लिए कुछ नहीं रहा।

दोनों एक ही हो गए। आत्मा ही सर्वभूत हो गया। क में च और च में क नहीं रहा ,क बराबर च हो गया।

*विजानत* : -विज्ञानी, अनुभवी पुरुष को। विज्ञानी पुरुष का यह अनुभव है कि उसके लिए सर्व भूत आत्मा ही हो गए। यहां पर आधुनिक अर्थ में विज्ञान शब्द का प्रयोग नहीं किया है।

आधुनिक अर्थ में विज्ञान यानी विविध ज्ञान। यहाँ विज्ञान यानी अनुभवयुक्त ज्ञान।

*तत्र क ; मोह: क: शोक*:- जिसको सर्वभूत आत्मरूप हो गए ऐसे भी विज्ञानी पुरुष को मोह और शोक कहां से होगा?

*एकत्वम अनुपश्यत:*- वह सतत एकत्व का दर्शन करता है। उसका एकत्व दर्शन कहीं खंडित नहीं होता।

अगर ज्ञानी को किसी भी कारण से एक क्षण के लिए भी आभास हुआ कि उसका एकत्व खंडित हो गया तो उसके लिए सारी सृष्टि छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

सबको पिरोनेवाला धागा ही टूट जाए तो सारे मणि इधर-उधर बिखर जाएंगे।