कैंची धाम और नीम करौली बाबा का बढ़ता प्रभाव: क्यों उमड़ रही है श्रद्धालुओं की भीड़?

कैंची धाम आज केवल नीम करौली बाबा का आश्रम नहीं, बल्कि भारत के सबसे तेजी से लोकप्रिय हो रहे आध्यात्मिक स्थलों में शामिल हो चुका है। बढ़ती श्रद्धालुओं की भीड़, पर्यटन, रियल एस्टेट और वैश्विक हस्तियों से जुड़ाव ने इस छोटे से पहाड़ी आश्रम को एक बड़े आध्यात्मिक आकर्षण में बदल दिया है।

विनीता द्विवेदी

भारत की कुमाऊँ पहाड़ियाँ हमेशा से अध्यात्म, शांति या घूमने-फिरने के शौकीन पर्यटकों को खींचती रही हैं। ये खूबसूरत पहाड़ प्रसिद्ध मंदिरों, शानदार नज़ारों और ठंडे मौसम के लिए जाने जाते हैं, जो थकान मिटाने के लिए एकदम सही हैं। लेकिन हाल के दिनों में, इस इलाके की सबसे खास जगह बन गई है कैंची धाम—नैनीताल के पास स्थित नीम करौली बाबा का आश्रम।

जैसे ही आप किसी नजदीकी स्टेशन या एयरपोर्ट से बाहर निकलते हैं, टैक्सी वाले आपको एक ही जगह जाने की सलाह देते हैं: कैंची धाम। सड़क पर लगे बोर्ड इसी तरफ इशारा करते हैं, और आश्रम तक जाने वाले घुमावदार रास्तों पर हर तरफ नीम करौली बाबा की तस्वीरें दिखाई देती हैं।

नैनीताल से आधे घंटे की वह शांत, देवदार के पेड़ों से घिरी राह, जहाँ कभी कोई यात्री कोसी नदी के किनारे अकेले बैठकर आराम से जप कर सकता था, अब भवाली-अल्मोड़ा नेशनल हाईवे पर लंबे ट्रैफिक जाम में बदल चुकी है। होटल वाले अब अक्सर यात्रियों को सलाह देते हैं कि अगर वे सुबह6:00 बजे तक नहीं पहुँचते हैं, तो उन्हें मुख्य सड़क तक फैली कई किलोमीटर लंबी गाड़ियों की कतार और घंटों के जाम का सामना करना पड़ेगा।

पहाड़ों के बीच बसे इस छोटे से आश्रम की ओर जाने वाली संकरी सड़कों पर, भक्तों की एक मील लंबी लाइन उस जगह जाने के लिए घंटों इंतज़ार करती है जहाँ कभी बाबा रहते थे और जहाँ अब एक मंदिर है—ताकि लोग उनकी ऊर्जा और मौजूदगी को महसूस कर सकें।

Neeb Karauli Baba Kainchi Dham

बचपन से नीम करौली बाबा के बारे में सुनने की वजह से वे मेरे लिए कोई नए नहीं थे। लेकिन उनके प्रति लोगों की बढ़ती यह नई और हैरान करनेवाली इतनी दिलचस्प थी कि जून की एक सुबह पहाड़ों की ताज़ा हवा के बीच मैं खुद वहाँ खिंची चली आई।

आश्रम पहुँचने का रास्ता ही पूरी कहानी बयाँ कर रहा था। संकरी सड़कों पर बसों और कारों की भीड़ उत्तराखंड के इस शांत कोने के हिसाब से नामुमकिन सी लग रही थी। लेकिन फिर भी, जैसे ही आश्रम के अंदर कदम रखा, बाहर का सारा शोर गायब हो गया। यह आश्रम आज भी वैसा ही है जैसा इसे हमेशा होना चाहिए था: सादा, छोटा और बिना किसी दिखावे का। आश्रम का जादू आज भी कायम है। मंदिर ट्रस्ट ने अंदर प्रसाद चढ़ाने पर सख्त रोक लगा रखी है और सभी को एक शांत, चलती हुई लाइन में आगे बढ़ना होता है। इसी वजह से अंदर का माहौल एकदम साफ़, शांत और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा है जिसने दशकों पहले लोगों को आकर्षित किया था। यह एक ऐसी जगह है जहाँ संत की सादगी ने बाहरी दिखावे को अंदर नहीं आने दिया।

हैरानी आश्रम के अंदर देखकर नहीं होती, बल्कि उसके आसपास के माहौलको देखकर होती है—सोवेनिर (यादगारी सामान) का बाज़ार, खाने-पीने कीदुकानें, धक्का-मुक्की करती भीड़ और रियल एस्टेट का बाज़ार। आश्रम तोवैसा ही है, लेकिन उसके आसपास का पूरा ढांचा नया है।

हाल ही में नीम करौली बाबा पर बनी नई फिल्म ‘हनुमान अंश’ को बहुतबड़ी कामयाबी मिली है, जिसने अपनी आध्यात्मिक कहानी से दर्शकों का दिल जीत लिया है। इस सफलता के बाद, फिल्म बनाने वालों ने आधिकारिक तौर पर ऐलान किया है कि इस फिल्म का बहुप्रतीक्षित दूसरा हिस्सा मुख्य रूप से नैनीताल के कैंची धाम पर आधारित होगा।

तीर्थयात्रा का एक नया रूप

कैंची धाम में इस नई दिलचस्पी का उभरना कोई हैरानी की बात नहीं है।उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा सितंबर से नवंबर 2025 के बीच कराए गए एक अध्ययन (Carrying Capacity Study) के मुताबिक, यहाँ आनेवाले लगभग 59.4% श्रद्धालु पहली बार आए थे।

आने वाले लोगों की संख्या इतनी तेज़ी से बढ़ी है कि ट्रैफिक, पार्किंग औरसफ़ाई की व्यवस्था इसे संभालने में जूझ रही है। भीड़ वाले दिनों में रोज़ाना आने वालों की संख्या लगभग 11,000 तक पहुँच जाती है। पिछले छह महीनों में, मंदिर में लगभग 19 लाख (1.9 मिलियन) लोग आए, जिनमें से67% लोग 15 से 30 साल की उम्र के थे।

आश्रम के चारों ओर होटल, रिसॉर्ट, होम  स्टे, कैफ़े, सोवेनिर दुकानें औरगाड़ियों की सुविधाओं का एक बड़ा नेटवर्क भक्तों की बढ़ती भीड़ की ज़रूरतों को पूरा कर रहा है। दुकानें कैंची धाम की यादगार चीज़ें, पूजा का सामान, तस्वीरें, किताबें, हनुमान जी से जुड़ी चीज़ें, कंबल और महाराज जीसे जुड़ी वस्तुएँ बेच रही हैं।

नीम करौली बाबा को अक्सर एक सादे चेकदार कंबल में याद किया जाताहै जो वे हमेशा ओढ़े रहते थे। भक्तों के लिए यह सादगी, प्यार, सुरक्षा और त्याग का प्रतीक है। दिलचस्प बात यह है कि यह कंबल अपने आप में एक सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। लोग कैंची धाम में इसे खरीदने के लिए कतार लगाते हैं।

इस बीच, ज़मीन-जायदाद (रियल एस्टेट) के कारोबारी उस इलाके पर नज़रबनाए हुए हैं जिसे मीडिया “नीम करौली कॉरिडोर” कह रहा है। इससे लगताहै कि इस क्षेत्र में आध्यात्मिक पर्यटन आगे और बढ़ेगा। उत्तराखंड सरकारइस इलाके में नई सुविधाएँ देने के लिए ₹17.59 करोड़ खर्च कर रही है।

हालाँकि संत अपने जीवनकाल में हमेशा सादगी से रहे, लेकिन हर साल जून में होने वाला ‘कैंची धाम महोत्सव’ अब एक बहुत बड़ा मेला बन गया है, जहाँ हर दिन लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। निजी गाड़ियों के जाने पर अब रोक है, एक नया पैदल रास्ता खोला गया है, और ट्रैफिक जाम 10 घंटे तक लग सकता है।

15 जून को मनाया जाने वाला कैंची धाम स्थापना दिवस कभी एक स्थानीय त्योहार हुआ करता था। अब यहाँ एक ही दिन में लाखों लोग पहुँचते हैं, जिससे पूरी घाटी भर जाती है और भीड़ संभालने के लिए भारी पुलिस तैनात करनी पड़ती है।

यह आश्रम कोई बहुत बड़ा फैला हुआ परिसर नहीं है। यह 1,400 मीटर(4,600 फीट) की ऊँचाई पर पहाड़ों की घाटी में स्थित एक छोटा और संकरा आश्रम है, जो एक तरफ कुमाऊँ की चट्टानों और दूसरी तरफ बहती शिप्रा नदी के बीच घिरा है। चूँकि आश्रम को बाहर की तरफ बढ़ाना मुमकिन नहीं है, इसलिए उत्तराखंड सरकार को बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए आस पास की सुविधाओं और सड़कों को चौड़ा करने पर ध्यान देना पड़ रहा है।

नीम करौली बाबा का असर सिर्फ उनके आश्रम तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक खास “नीम  करौली बाबा सर्किट” बना रही है। यह सर्किट राज्य के अंदर बाबा से जुड़ी मुख्य जगहों—फ़िरोज़ाबाद में उनका जन्मस्थान, फ़र्रुखाबाद में उनके शुरुआती साल, और वृंदावन तथा लखनऊ के मुख्य मंदिरों को जोड़ेगा, और इन्हें ‘परशुराम तीर्थ सर्किट’ जैसी बड़ी योजनाओं से भी जोड़ेगा।

नीम करौली बाबा

1900 के आसपास उत्तर प्रदेश में ‘लक्ष्मण नारायण शर्मा’ के रूप में जन्मे नीम करौली बाबा, बिना किसी बड़े संगठन, नियम या किताबों के भी भारतके सबसे आदरणीय संतों में से एक बने। भगवान हनुमान के अनन्य भक्त, वे अपने एक सरल संदेश के लिए जाने जाते थे: “सब एक”, जिसे उन्होंने चार आसान बातों में समझाया—सब से प्यार करो, सब की सेवा करो, भगवानको याद रखो, और सच बोलो।

भक्तों के बीच “महाराज जी” के नाम से मशहूर बाबा ने बहुत ही सीधे और अनोखे तरीकों से भक्ति का रास्ता दिखाया। बाबा के बारे में कहा जाता है कि उनके पास अद्भुत शक्तियाँ (सिद्धियाँ) थीं—जैसे एक ही समय में कई जगहों पर दिख जाना या सिर्फ एक छुअन से परेशानी दूर कर देना।

अपने इर्द-गिर्द बड़े-बड़े आश्रम और संस्थाएँ बनाने वाले कई आधुनिकगुरुओं से अलग, नीम करौली बाबा हमेशा सादे और हर किसी के लिएसुलभ रहे। 1964 में कैंची धाम में उनके आश्रम की स्थापना हुई। “कैंची” नाम दो आपस में कटती पहाड़ी चोटियों से पड़ा है जो कैंची की तरह दिखतीहैं।

नीम करौली बाबा को समझने के लिए हनुमान जी के प्रति उनके जुड़ाव को समझना ज़रूरी है। महाराज जी के लिए हनुमान जी की भक्ति ही सब कुछ थी: उनकी शिक्षाएँ, उनके आश्रम (जिनमें से कई हनुमान मंदिर के रूप में बने), और भक्तों को ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ने की सलाह—वह 40 पंक्तियोंकी प्रार्थना जिसे करोड़ों भारतीय रोज़ पढ़ते हैं। भारत जैसे देश में हनुमानजी सबको जोड़ने वाली एक मिसाल हैं, और इसी वजह से महाराज जी भी सबको जोड़ने वाले संत माने जाते हैं।

उनका प्रभाव विदेशों में भी फैला, खासकर राम दास जैसे शिष्यों के ज़रिये, जिनकी किताब बीहियरनाउ (Be Here Now) बहुत मशहूर हुई और जिसने हज़ारों पश्चिमी साधकों को महाराज जी से जोड़ा। 1960 और1970 के दशक में, विदेशी साधकों की एक बड़ी लहर भारत आई और उनसे मिली, जो बाद में पश्चिम में उनकी सीख को फैलाने वाले मुख्य जरिया बने। (नीम करौली बाबा के जीवन और उनके भारतीय व विदेशीशिष्यों से जुड़े रिश्तों पर एक ब्रिटिश शोधकर्ता का पीएचडी शोध पत्र भी है—जो लोग उनके बारे में और गहराई से जानना चाहते हैं, उनके लिए यह पढ़ने लायक है.

आज, उनकी शिक्षाएँ दुनिया भर में फैली हुई हैं। उनकी यादों और सीख को’लव सर्व रिमेंबर फ़ाउंडेशन’ और अमेरिका के न्यू मेक्सिको में स्थित ‘टाओसहनुमान मंदिर’ जैसे केंद्र आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ हर साल हज़ारों विदेशी आते हैं। इसके अलावा ‘सेवा फ़ाउंडेशन’ जैसी संस्थाएँ महाराज जी की मुख्य बात—”सबकी सेवा करो”—को लगातार पूरा कर रही हैं।

कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता

शायद भारत की किसी भी दूसरी आध्यात्मिक जगह को दुनिया की टेक और पॉप-कल्चर हस्तियों से इतना अनजाना बढ़ावा नहीं मिला ,जितना कैंची धामको मिला है।

अब यह एक मशहूर कहानी बन चुकी है कि एप्पल के संस्थापक स्टीवजॉब्स बाबा का आशीर्वाद लेने भारत आए थे, हालाँकि उन्हें यह नहीं पता था कि बाबा का निधन हो चुका है। 1974 में, बीहियरनाउ किताब से प्रेरित होकर युवा जॉब्स कुमाऊँ की पहाड़ियों में पहुँचे थे। भले ही वे बाबा के जाने के कुछ महीनों बाद पहुँचे, फिर भी उन्होंने उस शांत आश्रम में काफी समय बिताया। बाद में उन्होंने मार्क जुकरबर्ग को भी यहाँ जाने की सलाह दी।

इसी तरह, हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स ने नीम करौली बाबा में अपनी आस्था के बारे में बताया है। उनका कहना है कि वे सिर्फ उनकी तस्वीर देखकर ही उनकी ओर खिंची चली आई थीं। लेकिन हाल के दिनों में सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाले यात्री क्रिकेटर विराट कोहली रहे हैं। कोहली और उनकी पत्नी अनुष्का शर्मा ने 2022 में पहली बार यहाँ का दौरा किया, और माना जाता है कि इसके बाद से ही यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी। विराट कोहली की फॉर्म में वापसी को मीडिया और फ़ैंस ने इस यात्रा से जोड़ा। अब आईपीएल के कई क्रिकेटर, ओलंपिक खिलाड़ी और बड़े नेता अक्सर इस आश्रम में दिखाई देते हैं।

यह ‘सोशल प्रूफ़’ (देखा-देखी का असर) का एक बड़ा उदाहरण है: जबजानी-मानी हस्तियाँ किसी आस्था या परंपरा को मानती हैं, तो बाकी लोग भी उसे सच्चा और सही मानने लगते हैं। रिसर्च भी बताती है कि मशहूरहस्तियों का व्यवहार लोगों की सोच को बदलता है।

आश्रम की लोकेशन भी इसमें मदद करती है। नैनीताल के पास होने की वजह से यहाँ अध्यात्म के साथ-साथ कुदरत की खूबसूरती भी मिलती है।आज के समय में जब भारतीय शहर भीड़भाड़, प्रदूषण और तनाव से भरे हैं, तो हिमालय की यह जगह दिमागी सुकून देती है। कोरोना महामारी के बाद लोग मानसिक सेहत, जीवन की अनिश्चितता और मकसद को लेकर ज़्यादा सोचने लगे हैं। जब पारंपरिक रास्ते दिमागी शांति नहीं दे पाए, तो ऐसी आध्यात्मिक जगहों ने उस खालीपन को भरा। कई श्रद्धालु कहते हैं कि उन्हें कैंची धाम से “बुलावा आया” था या यहाँ आकर अजीब और सुखद संयोग हुए। इंटरनेट पर ऐसी कई कहानियाँ भरी पड़ी हैं जहाँ लोग अपनी ज़िंदगी बदलने का अनुभव बताते हैं।

समाजशास्त्र के नज़रिए से, ये कहानियाँ मिलकर एक “साझा आध्यात्मिक अनुभव” बनाती हैं। लोग अलग-अलग वजहों से आते हैं लेकिन अपनी कहानियों के साथ लौटते हैं, और वही कहानियाँ और लोगों को खींच लाती हैं। जो बातें कभी सिर्फ मुँह से सुनकर फैलती थीं, वे अब इंस्टाग्राम रील्स के ज़रिये तेज़ी से फैल रही हैं।

2020 के दशक में, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर महाराज जी से जुड़ीपोस्ट्स में भारी उछाल आया है। उनके विचार, डिजिटल तस्वीरें और लो-फ़ाई (lo-fi) म्यूज़िक वाली रील्स आज की युवा पीढ़ी (Gen Z औरMillennials) तक पहुँच रही हैं, जो एक आसान और साफ़-सुथराआध्यात्मिक रास्ता चाहती है। कैंची धाम के वीडियो यूट्यूब पर लाखों लोगदेखते हैं।

भारत में मुख्य आश्रमों को चलाने वाले आधिकारिक ट्रस्ट खुद कोई भी सोशल मीडिया अकाउंट नहीं चलाते। फिर भी, महाराज जी के विशाल प्रभाव की वजह से भक्तों द्वारा चलाए जा रहे पेजों का एक बड़ा ताना-बाना बन चुका है। ऐसे सैकड़ों पेज हैं जो रोज़ नई-नई पोस्ट डालते हैं और लाखों लोगों तक पहुँचते हैं।

जो संत अब हमारे बीच नहीं हैं, उनमें नीम करौली बाबा की डिजिटल मौजूदगी (digital footprint) सबसे बड़ी है। उन्हें समर्पित भक्तों केव्यक्तिगत पेजों पर 20 से 30 लाख तक फ़ॉलोअर्स हैं, जो दशकों पहलेदुनिया छोड़ चुके किसी गुरु के लिए एक अनोखी बात है। नीम करौली बाबा आज इंटरनेट पर भारत के सबसे लोकप्रिय आध्यात्मिक संतों में से एक हैं।

डिजिटल मीडिया पर बढ़ी इस मौजूदगी ने यहाँ आने वाले लोगों को सिर्फशांत साधकों से बदलकर पर्यटकों में भी बदल दिया है। यहाँ तक कि रिसर्च करने वाले भी अब कैंची धाम का अध्ययन कर रहे हैं। मीडिया थ्योरी में इसे”पवित्र जगह से मीडिया के ज़रिये जानी जाने वाली जगह” (sacred space to mediated sacred space) में बदलना कहते हैं—जहाँ लोग असल में पहुँचने से पहले ही इंटरनेट पर उस जगह को देख और महसूस करचुके होते हैं।

यह विरोधाभास बड़ा दिलचस्प है: एक संत, जो सिर्फ एक कंबल लपेट कर बैठते थे और जिन्होंने कभी न तो शोहरत चाही और न ही कोई बड़ा संगठन बनाया , वे अपने जाने के आधी सदी बाद आज भारत के सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले, खोजे जाने वाले और हैशटैग किए जाने वाले संतों में से एक बन गए हैं।



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