
( मीडिया स्वराज डेस्क)
राम दत्त त्रिपाठी का यह साक्षात्कार 2 फरवरी 2017 को लखनऊ में पत्रकार सोपान जोशी ने रिकॉर्ड किया था — गोटिंगेन विश्वविद्यालय के Centre for Modern Indian Studies (CeMIS) और ICAS:MP की “Long Emergency” दस्तावेज़ीकरण परियोजना के लिए। यह आज तक अप्रकाशित रहा है।
नौ वर्ष बाद यह बातचीत महज़ स्मृति नहीं रह गई। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2026 वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में भारत छह पायदान गिरकर 180 देशों में 157वें स्थान पर आ गया है — रिपोर्ट सरकारी विज्ञापन पर मीडिया की आर्थिक निर्भरता और घटती संपादकीय स्वतंत्रता को प्रमुख कारण बताती है।
इसी वर्ष प्रस्तावित IT नियमों में संशोधन को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ, जिसके आलोचकों का कहना है कि यह स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों पर सरकार को व्यापक नियंत्रण देगा।
राम दत्त त्रिपाठी की यही चिंता है — कि इमरजेंसी की प्रत्यक्ष सेंसरशिप की जगह अब विज्ञापन, स्वामित्व और अप्रत्यक्ष दबाव ने ले ली है। इसी को वे “अघोषित इमरजेंसी” कहते हैं।
गांव से भूमिगत संघर्ष, गिरफ्तारी, जेल और फिर चार दशक की पत्रकारिता तक — यह साक्षात्कार एक व्यक्तिगत यात्रा से कहीं अधिक है। यह भारतीय लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता के प्रश्न का एक ज़रूरी दस्तावेज़ है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1975 में था।
सोपान जोशी की रामदत्त त्रिपाठी से बातचीत
इलाहाबाद के एक गांव से निकल कर सर्वोदय आंदोलन, जेपी आंदोलन, इमरजेंसी के दौरान भूमिगत संघर्ष, जेल और फिर पत्रकारिता की लंबीयात्रा।वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी ने अपने जीवन के उस दौर को याद किया जब लोकतंत्र पर असाधारण संकट था।उनका माननाहै कि इमरजेंसी ने भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचाया।उनके अनुसार आज भी विज्ञापन और व्यावसायिक हितों के दबाव में मीडिया के सामने एक तरह की ‘अघोषित इमरजेंसी’ मौजूद है।प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के संपादित अंश।
गांव से इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक
सवाल: इमरजेंसी से पहले आपके जीवन और राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता की शुरुआत कैसे हुई?
राम दत्त त्रिपाठी:
मेरा जन्म इलाहाबाद से करीब 60 किलोमीटर दूर गंगा किनारे, कड़ा धाम के पास दारानगर गांव में हुआ। मेरी प्रारंभिक शिक्षा वहीं हुई। दारानगर से हाईस्कूल और सैनी कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद आया।
मेरे पिताजी छोटे किसान थे और राइस मिल में मैकेनिक का काम करते थे। मेरे बाबा जी पुरोहित थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मेरा संपर्क प्रोफेसर बनवारी लाल शर्मा और डॉ. रघुवंश जैसे शिक्षकों से हुआ। इन लोगों का मेरे विचारों और सामाजिक सरोकारों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
सर्वोदय और जेपी आंदोलन से जुड़ाव
इलाहाबाद में प्रोफेसर यूपी अरोड़ा और अन्य लोगों का एक समूह था—‘सर्वोदय विचार प्रचार समिति’, जिसकी अध्यक्ष महादेवी वर्मा थीं। वहां होने वाली विचार गोष्ठियों में जाते-जाते मेरा रुझान सर्वोदय आंदोलन और ‘तरुण शांति सेना’ की ओर बढ़ा।
बहुत कम उम्र में मैंने ‘नगर स्वराज्य ’ नाम की पत्रिका के प्रबंध संपादक की जिम्मेदारी भी संभाली। उस समय हैंड कंपोजिंग सीखी और पत्रिका निकालने के काम को करीब से समझा।
1973 के अंत में जयप्रकाश नारायण ने ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ का आह्वान किया। हम लोग उससे जुड़ गए। जेपी देश में भ्रष्टाचार, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था की स्थिति को लेकर चिंतित थे।
1974 के चुनाव के समय हमने ‘मतदाता शिक्षण एवं चुनाव शुद्धि अभियान’ चलाया। उस दौरान युवाओं की सामाजिक और राजनीतिक ट्रेनिंग भी हुई।
इमरजेंसी से पहले का मीडिया और सूचना का संसार
उस समय गांवों में सूचना का मुख्य माध्यम रेडियो और चौपालें थीं। अखबार बहुत कम पहुंचते थे और विज्ञापन का दबाव आज जैसा नहीं था।
संपादक समाज से जुड़े हुए होते थे और पत्रकारिता को एक तरह की सामाजिक सेवा माना जाता था।
जब बिहार आंदोलन शुरू हुआ और जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व संभाला, तो राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से गंभीर होने लगीं। सरकार और आंदोलन के बीच टकराव बढ़ता गया। पटना में जेपी पर लाठीचार्ज भी हुआ।
उस समय अखबारों में आंदोलन की खबरें आती थीं, लेकिन आकाशवाणी का रवैया एकतरफा था। सरकारी प्रसारण की विश्वसनीयता कम होने लगी थी। लोग बीबीसी को ज्यादा भरोसे से सुनने लगे थे।
इमरजेंसी की घोषणा और भूमिगत संघर्ष
सवाल: 25 जून 1975 को इमरजेंसी घोषित हुई। उस समय आप कहां थे और आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?
राम दत्त त्रिपाठी:
इमरजेंसी की घोषणा के समय मैं इलाहाबाद में था। जब पता चला कि पुलिस मुझे तलाश रही है तो पहली रात रामबाग रेलवे स्टेशन और दूसरी रात मुख्य रेलवे स्टेशन पर बिताई। उसके बाद मैं ग्रामीण इलाके में चला गया।
मैंने अपना वेश बदला। शर्ट पहनने लगा और जीरो पावर का चश्मा लगाया। उस समय करीब 125 रुपये में एक हाथ से चलने वाली साइक्लोस्टाइल मशीन खरीदी और आंदोलन से संबंधित पर्चे तैयार करके डाक के जरिए लोगों तक पहुंचाने लगा।
जेपी के आह्वान पर मैंने 1975 में अपनी एलएलबी की पढ़ाई छोड़ दी थी। स्वाभाविक रूप से परिवार में इससे काफी नाराजगी थी। परिवार चाहता था कि मैं पढ़ाई पूरी करूं और अपना भविष्य बनाऊं, लेकिन उस समय हमें लगा कि लोकतंत्र की रक्षा का सवाल उससे बड़ा है।
भूमिगत आंदोलन और गिरफ्तारी
जून में इमरजेंसी लगी थी और उससे कुछ समय पहले ही मई में मेरा गौना हुआ था। लेकिन इसके बावजूद हम भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय रहे।
मैं दिल्ली, राजस्थान और लखनऊ गया और बाहर रह रहे कार्यकर्ताओं को संगठित करने की कोशिश की।
15 अगस्त के आसपास हम कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर सके, क्योंकि अधिकांश सक्रिय कार्यकर्ता जेल जा चुके थे।
इसके बाद हम तीन दोस्त—मैं, संतोष भारतीय और विमल कुमार—आगे के मार्गदर्शन के लिए आजमगढ़ सर्वोदय चिंतक धीरेंद्र मजूमदार के पास जा रहे थे ।
14 सितंबर को बनारस के एक गांधी आश्रम से हमें गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में पता चला कि आश्रम के कुछ कर्मचारी पुलिस के मुखबिर थे।
हमें चेतगंज थाने ले जाया गया। वहां करीब तीन दिन तक कड़ी पूछताछ हुई।

पुलिस पूछताछ की रणनीति
पूछताछ के दौरान हमने एक रणनीति बनाई थी। हम वैचारिक विरोध तो करते थे, लेकिन उन लोगों के नाम ही बताते थे जो पहले से जेल में थे। हमारा उद्देश्य किसी ऐसे व्यक्ति को पुलिस के सामने नहीं लाना था जो अभी तक गिरफ्तारी से बचा हुआ हो।
इसके बाद हमें बनारस सेंट्रल जेल और फिर नैनी जेल भेज दिया गया।
बनारस जेल के सुपरिंटेंडेंट स्वयं स्वतंत्रता सेनानी रह चुके थे। इसलिए वहां राजनीतिक बंदियों के साथ व्यवहार अपेक्षाकृत बेहतर था।
जेल में हमारे साथ डा मुरली मनोहर जोशी, राम नरेश यादव, कल्याण सिंह, आजम खान, राजनाथ सिंह और जनेश्वर मिश्रा जैसे नेता भी थे।
जब छोटे भाई को भी गिरफ्तार कर लिया गया
इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने मेरे 17 वर्षीय छोटे भाई को भी गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। उसका उद्देश्य मुझ तक पहुंचना था।
यह उस समय के दमनकारी माहौल को समझने की एक मिसाल है। पुलिस परिवार के सदस्यों को भी दबाव बनाने के लिए निशाना बना रही थी।
नसबंदी कार्यक्रम और भय का माहौल
इमरजेंसी के दौरान समाज में पुलिस की ज्यादतियां बढ़ गई थीं। खासकर संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम को लेकर लोगों में बहुत डर था।
अधिकारियों पर नसबंदी का लक्ष्य पूरा करने का दबाव था। गांव-गांव में यह भय फैल गया था कि बच्चों और बुजुर्गों तक की जबरन नसबंदी की जा रही है।
उस समय अफवाहें भी बहुत तेजी से फैलती थीं। सूचना के औपचारिक माध्यम सीमित थे, इसलिए लोग एक-दूसरे से मिली जानकारी पर निर्भर रहते थे।
1977 में रिहाई और पत्रकारिता की शुरुआत
जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा हुई। इसके बाद राजनीतिक बंदियों की रिहाई की खबरें आने लगीं।
मैं मार्च 1977 में जेल से रिहा हुआ।
जेल से निकलने के बाद मुझे लगा कि लोकतंत्र फिर बहाल हो गया है। इसके बाद मैंने पत्रकारिता को अपना करियर बनाने का फैसला किया।
मैंने ‘भारत’, ‘अमृत प्रभात’ और ‘संडे मेल’ जैसे अखबारों में काम किया। बाद में बीबीसी से जुड़ा और 1992 से 2013 तक संवाददाता के रूप में काम किया।
इमरजेंसी ने मीडिया की विश्वसनीयता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
सवाल: पीछे मुड़कर देखते हुए इमरजेंसी का भारतीय पत्रकारिता और लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रभाव क्या मानते हैं?
राम दत्त त्रिपाठी:
मेरे विचार से इमरजेंसी ने भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
उस समय बड़े अखबारों और अनेक संपादकों ने सेंसरशिप के सामने समर्पण कर दिया था। इससे जनता और मीडिया के बीच भरोसे को गहरा आघात लगा।
लेकिन समस्या केवल मीडिया तक सीमित नहीं थी। उस समय न्यायपालिका और संसद जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं का भी पतन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने भी उस दौर में मौलिक अधिकारों के निलंबन से संबंधित सरकार के पक्ष को स्वीकार किया था। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए बेहद गंभीर समय था।
क्या आज भी है ‘अघोषित इमरजेंसी’?
सवाल: क्या आपको लगता है कि आज की पत्रकारिता उस दौर से अलग है?
राम दत्त त्रिपाठी:
आज परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दबाव का एक दूसरा रूप दिखाई देता है।
आज विज्ञापन और व्यावसायिक हित मीडिया को प्रभावित करते हैं। मीडिया संस्थानों पर मालिकों का वर्चस्व बढ़ा है।
मेरी चिंता यह है कि ‘एडिटर’ नाम की संस्था धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
इमरजेंसी में सेंसरशिप का दबाव प्रत्यक्ष था। आज कई बार दबाव अप्रत्यक्ष होता है—विज्ञापन, व्यावसायिक हित और संस्थान के मालिकों के माध्यम से।
इसी अर्थ में मैं आज की स्थिति को एक तरह की ‘अघोषित इमरजेंसी’ कहता हूँ.
निष्कर्ष
इलाहाबाद के एक छोटे से गांव से शुरू हुई राम दत्त त्रिपाठी की यात्रा सर्वोदय आंदोलन, जेपी आंदोलन और इमरजेंसी के भूमिगत संघर्ष से गुजरते हुए पत्रकारिता तक पहुंची। जेल का अनुभव और बाद में दशकों तक पत्रकारिता करने का अनुभव उनके लोकतंत्र और मीडिया को देखने के नजरिए को गहराई देता है।
उनकी कहानी केवल एक पत्रकार की व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, बल्कि 1970 के दशक के भारत में लोकतांत्रिक संघर्ष, राजनीतिक दमन और पत्रकारिता की भूमिका को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
मुख्य सवाल आज भी वही है—लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका क्या होनी चाहिए और जब संस्थागत दबाव बढ़े तो पत्रकार अपनी स्वतंत्रता कैसे बचा सकता है?
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( This interview with Ram Dutt Tripathi was recorded in 2 February 2017 in Lucknow by journalist Sopan Joshi for
The Merian-Tagore International Centre of Advanced Studies (ICAS:MP) and the Centre for Modern Indian Studies, University of Göttingen (CeMIS).
It is part of documents/ interviews Titled Long Emergency )



