आखिर क्यों शहरीकरण के इंतजार में बैठे हैं गांव और ग्रामीण?

एक गाँव या गाँवों का समूह कई शहरों का पालन पोषण कर सकता है परन्तु कई शहर मिलकर एक गाँव का या अपना ही पालन पोषण नहीं कर सकते हैं। गाँव के बिना भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

पैसे से सामान तो खरीदा जा सकता है लेकिन खुशी नहीं। आज समाज और परिवार दोनों में ही उपभोक्तावाद घुस गया है। हमारे सारे सम्बन्ध भी उपभोक्तावादी संस्कृति की भेंट चढ़ चुके हैं।

स्वप्निल श्रीवास्तव. प्रयागराज

स्वराज विद्यापीठ ने खेती किसानी को लेकर एक सत्याग्रह आन्दोलन चला रखा है और वह है बीज सत्याग्रह। हम सभी का मानना है कि कॉरपोरेट व्यवस्था ने ऐसा दुष्चक्र रच रखा है कि किसानों के लिए और ग्रामीण समाज के लिए खेती किसानी घाटे का सौदा बन जाय। गाँव की जमीन अर्थात लगभग पूरे देश पर उनका प्रभुत्व स्थापित हो जाय।

इस लड़ाई में उन्होंने (कार्पोरेटी शक्तियों ने) आर्थिक, राजनैतिक व शैक्षिक तंत्र का भरपूर इस्तेमाल करते हुए भारत के मन को गुलाम बनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी है। अब लगभग हर भारतीय, ग्रामीण परिवेश से निकलकर शहरी परिवेश में आना चाहता है। आज लगभग हर गाँव में शहर घुस गया है और अगर एक दो में नहीं भी घुस पाया है तो ग्रामीणों के मन में तो घुस ही गया है और वे पलक पावंडे बिछाकर शहरीकरण के इंतज़ार में बैठे हैं।

यह कहना बिलकुल ही गलत होगा कि हमारे गाँव बहुत ही सम्पन्न थे और वहाँ कोई समस्या नहीं थी, परन्तु यह भी सही है कि समस्याएं सभी जगह होती हैं और हर व्यवस्था में भी। हमें गाँव की समस्याओं के बारे में गम्भीरता से सिर्फ सोचना ही नहीं होगा बल्कि यथाशक्य उनको दूर करने के प्रयास भी करने होंगे। कोई बाहरी आकर हमारी समस्याओं से हमें निज़ात नहीं दिला सकता है।

शहर और उसके बढ़ते प्रभुत्व ने हमारी समस्याओं को दूर करने की बजाय उन्हें बढ़ाया ही है। आज आर्थिक क्षेत्र में जिस उन्नति की बात लगातार की जा रही है वह किसकी बलि देकर हो रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। पैसे से सामान तो खरीदा जा सकता है लेकिन खुशी नहीं। आज समाज और परिवार दोनों में ही उपभोक्तावाद घुस गया है। हमारे सारे सम्बन्ध भी उपभोक्तावादी संस्कृति की भेंट चढ़ चुके हैं। ए

सहज व सरल जीवन और उसका रास्ता शायद सबसे कठिन है! बात बीज सत्याग्रह की कर रहा था वहीं वापस लौटते हैं। आज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बीजों पर एकाधिकार की ओर कदम बढ़ा रखा है और वह इसमें काफी हद तक सफल भी हैं। बीजों पर अधिकार अर्थात जीवन पर अधिकार। हमारी देशज संस्कृति में तो बीजों (अन्न) को ब्रह्म (सृष्टि निर्माता) की संज्ञा दी गयी है। आज पूरे देश में भ्रमण के दौरान पूछने पर इक्का दुक्का किसानों के पास ही अपने बीज मिलेंगे।

बहुतायत किसान बीजों पर पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर निर्भर हो गये है। बीजों पर इस तरह की निर्भरता ने उन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के शिकंजे में इस तरह से जकड़ लिया है कि वह चाहकर भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। बीजों के बाद रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर आदि खेती में प्रयुक्त होने वाले बड़े बड़े यंत्र सभी कुछ तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा ही उपलब्ध हैं और लगातार खेती में इनकी उपयोगिता को बढ़ाने का प्रयास हो रहा है।

इस तरह की खेती के बाद उत्पादित फसलों के उपयोग ने हम सभी को ऐसा बना दिया है कि हम नित नयी बीमारियों की जकड़ में फँसते जा रहे हैं; और फिर इलाज व दवाओं के रूप में उन्हीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मकड़जाल में उलझते जा रहे हैं। लगातार ये कंपनियां ऐसा माहौल बना रही हैं कि हम सभी वास्तविक समस्याओं को छोड़कर उनके द्वारा बनायी गयी कृत्रिम समस्याओं के विषय में ही चर्चा कर रहे हैं और उनका समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करने में लगे हुए हैं। ऐसा करते हुए हम लगातार अपने को गौरवान्वित भी महसूस करते हैं।

स्वराज विद्यापीठ लगातार किसानों से सम्पर्क कर देसी बीजों के संरक्षण व संवर्धन के साथ ही साथ खेती की उन सभी पुरानी व नयी तकनीकों को किसानों के बीच में प्रचारित व प्रसारित कर रहा है जिसे आज के युवा किसान लगभग भूल से गये हैं। इस कार्य में कुछ सफलता भी मिली है परंतु यह बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ पा रही है। हमें ऐसे साथियों की जरूरत है जो बीज सत्याग्रह के आन्दोलन को आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभाएं।

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एक बात जो मुझे लगती है कि किसानों की समस्याओं या ग्रामीण भारत की समस्याओं को दूर तभी किया जा सकता है जबकि हम किसान बनकर (जिनमें ग्राम स्वराज के सभी आयाम शामिल हों) इस परिवर्तन के कार्य में लगें। जितना ज़्यादा राजनैतिक दलों का, सत्ता के लिए लालायित घटकों का, ठेठ विरोध करने वाली शक्तियों का, बौद्धिकता का जामा ओढ़े व्यक्तियों का दखल इस परिवर्तनगामी कार्य में होगा उतना ही हम ग्राम स्वराज या स्वराज के रास्ते के विपरीत दिशा की ओर बढेंगे।

इनसे व इनके समर्थन करने वाली सोच से दूर रह कर और किसान बनकर (वे सभी किसान हैं जो प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में सीधे तौर पर खेती से जुड़ें हैं। इसमें वे सभी शामिल हैं जिनके पास खेत हैं और नहीं भी हैं। जिन्होंने खेती को संस्कृति से जोड़कर देखा है और उसी आधार पर जीवन जी रहे हैं। वे कत्तई किसान नहीं है जिनके पास जमीन तो है परन्तु खेती उनके लिए सिर्फ व्यापार की वस्तु है) ही हम किसानों की ही नहीं अपितु पूरे समाज की समस्याओं को दूर कर पाएंगे।

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