
(मीडिया स्वराज डेस्क)
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची के सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का संवैधानिक और कानूनी अधिकार प्राप्त है। हालांकि, बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में जिस तेजी और तरीके से SIR अभियान चलाया गया, उस पर उठे सवाल अब भी कायम हैं। इन सवालों का संतोषजनक उत्तर चुनाव आयोग को देना बाकी है।
कांग्रेस नेता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनावी राजनीति, प्रशासनिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष की ओर से बहस करने वाले प्रमुख वकीलों में सिंघवी शामिल थे।
राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव सहित कई अन्य विशेषज्ञों ने भी फैसले के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
1. ‘संवैधानिक वैधता’ बनाम ‘जमीनी हकीकत’
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा पहलू अदालत और विपक्ष के दृष्टिकोण का अंतर है।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मुख्यतः संवैधानिक और कानूनी नजरिए से देखा। अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग को मतदाता सूची को शुद्ध और त्रुटिहीन बनाने के लिए SIR चलाने का पूरा अधिकार है।
विपक्ष का तर्क
विपक्ष चुनाव आयोग की ‘शक्ति’ (Power) पर नहीं, बल्कि उसकी ‘नीयत और कार्यप्रणाली’ (Intent and Implementation) पर सवाल उठा रहा है। सिंघवी का तर्क है कि कोई प्रक्रिया कागजों पर वैध हो सकती है, लेकिन यदि उसका क्रियान्वयन पक्षपातपूर्ण, जल्दबाजी में या त्रुटिपूर्ण हो, तो वह न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जाएगा।
2. नागरिकता का सवाल और ‘घोड़े के आगे गाड़ी’
पूरा विवाद नागरिकता (Citizenship) के प्रश्न से भी जुड़ गया है।
सुप्रीम Court ने अपने फैसले के पैरा 171 में स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय (MHA) और संबंधित सक्षम प्राधिकारियों के पास है। अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने का अर्थ स्वतः नागरिकता समाप्त होना नहीं है।
यहीं विपक्ष ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल उठाया। सिंघवी का तर्क है कि जब आयोग के पास नागरिकता तय करने का अधिकार ही नहीं है, तो लाखों लोगों के नाम “तार्किक विसंगतियों” (Logical Discrepancies) या नागरिकता संबंधी संदेहों के आधार पर हटाने की कार्रवाई इतनी व्यापक स्तर पर क्यों की गई?
विश्लेषकों का मानना है कि नागरिकता पर अंतिम निर्णय से पहले मताधिकार जैसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार को प्रभावित करना प्रक्रियात्मक रूप से गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
3. “पहले निष्कासन, बाद में न्याय” का आरोप
सिंघवी ने चुनाव आयोग की कार्यशैली को “Exclusion First, Decision Later” यानी “पहले बाहर करो, बाद में अपील सुनो” की नीति बताया।
सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाता है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाने के बाद लोगों को अपील और पुनर्विचार की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।
पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए सिंघवी ने दावा किया कि लगभग 6,000 अपीलों में से करीब 4,000 मामलों में नाम दोबारा जोड़ने पड़े। विपक्ष इसे शुरुआती स्तर पर भारी त्रुटियों का संकेत मान रहा है।
4. समय और जल्दबाजी पर सवाल
बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े एवं राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में करोड़ों मतदाताओं की सूची का पुनरीक्षण महज चार से पांच महीनों में पूरा किया गया।
सिंघवी और अन्य विश्लेषकों का सवाल है कि यदि मतदाता सूची को व्यवस्थित करना ही उद्देश्य था, तो यह प्रक्रिया चुनावों से एक या डेढ़ वर्ष पहले क्यों नहीं शुरू की गई?
ऐन चुनावों से पहले तेज गति से नाम हटाने की कार्रवाई ने विपक्ष को यह आरोप लगाने का अवसर दिया कि यह प्रक्रिया “वोटर प्रोफाइलिंग” या किसी विशेष वर्ग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है।
5. न्यायपालिका की सीमित दखल और नागरिक समाज की भूमिका
फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को पूरी तरह “क्लीन चिट” नहीं दी। अदालत ने प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण “गार्डरेल्स” अनिवार्य किए—जैसे हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करना, कारण बताना और पहचान के लिए आधार कार्ड को स्वीकार करना।
सिंघवी का कहना है कि ये सुधार चुनाव आयोग ने स्वतः नहीं किए, बल्कि ADR जैसे संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा अदालत जाने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप से लागू हुए।
हालांकि विपक्ष की निराशा इस बात को लेकर भी रही कि सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की प्रशासनिक कमियों पर कोई कड़ी टिप्पणी या फटकार नहीं लगाई।
निष्कर्ष
राजनीतिक और चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने चुनाव आयोग की कानूनी स्थिति को मजबूत किया है, लेकिन विपक्ष इसे “वैधानिक रूप से स्वीकृत निष्कासन” (Authorized Disenfranchisement) का मुद्दा बनाकर जनता के बीच एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले समय में पंजाब समेत जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और जहाँ SIR लागू किया जाना है, वहाँ यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कानूनी वैधता साबित करना नहीं, बल्कि अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता पर जनता का भरोसा कायम रखना भी होगी।



