कविता: प्रेम धर्म

कवि स्वामी दास

प्रेम धर्म
 
प्रेम जब हो जाता है किसी से
असम्भव तो कुछ भी नही लगता
हर चीज़ प्रीतम की मोहक लगे
प्रेम में बुरा तो कुछ भी नही लगता
 
किसी भी धर्म में लिखा हो
एक ईश्वर की हम संतान नही
ऐसा तो कुछ भी नही लगता
 
इन्सान ही इन्सान को गाली दे
इन्सान ही इन्सान को मार रहा
ईश्वर से प्रेम जैसा तो कुछ भी नही लगता।
(यह लेखक का कलम नाम है) 
घोषणा :- प्रस्तुत रचना मेरी मौलिक रचना है और ये किसी भी काॅपीराईट का उलंघन नहीं करती है।

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