
(मीडिया स्वराज डेस्क)
12 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे निर्णायक तारीखों में से एक है। इसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली लोकसभा चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें सांसद रहने के अयोग्य घोषित कर दिया। यह फैसला देश की राजनीति में भूचाल लेकर आया।
संयोग से उसी दिन गुजरात विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन जनता फ्रंट ने कांग्रेस को पराजित कर दिया। यह जीत सीधे तौर पर छात्रों के नेतृत्व में चले नवनिर्माण आंदोलन का परिणाम मानी गई। उधर बिहार में लोकनायक Jayaprakash Narayan छात्रों और युवाओं के सहयोग से सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन को जमीं पर उतारने में जुटे थे।

जेपी को पटना से दिल्ली कौन ले गया और क्यों?
विपक्षी दलों को लगने लगा कि इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय है। वे चाहते थे कि जयप्रकाश नारायण दिल्ली आकर राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करें। लेकिन जेपी का ध्यान बिहार में चल रहे व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष पर केंद्रित था।
फिर ऐसा क्या हुआ कि जेपी को पटना से दिल्ली लाया गया? उन्हें रोकने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्या – क्या किया?
वे कौन लोग थे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन को राष्ट्रीय सत्ता संघर्ष की दिशा में मोड़ दिया? क्या यही वह मोड़ था जहाँ से आंदोलन अपने मूल लक्ष्य से भटकने लगा?
12 जून से 25 जून 1975: लोकतंत्र के सबसे निर्णायक 14 दिन
12 जून से 25 जून 1975 के बीच के चौदह दिनों में घटनाएँ इतनी तेजी से घटीं कि भारत का राजनीतिक इतिहास हमेशा के लिए बदल गया।
25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग करते हुए सत्याग्रह का आह्वान किया। लेकिन उसी रात प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया।
जेपी सहित हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लाखों नागरिकों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन चौदह दिनों में पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ? सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन किन कारणों से अपने मूल उद्देश्य से दूर चला गया?
इमरजेंसी की हार और जनता पार्टी की जीत
मार्च 1977 में इमरजेंसी समाप्त हुई और आम चुनाव हुए। गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद जयप्रकाश नारायण ने पूरे देश में घूम-घूमकर लोकतंत्र की बहाली और विपक्षी एकता के लिए अभियान चलाया।
परिणामस्वरूप पहली बार केंद्र में कांग्रेस के स्थान पर गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। Morarji Desai के नेतृत्व में जनता पार्टी सत्ता में आई। राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि के सामने सभी नेताओं ने एकता और नैतिक राजनीति की शपथ ली।
लेकिन क्या जनता पार्टी वास्तव में वैकल्पिक राजनीति का सपना पूरा कर सकी?
जनता पार्टी सिर्फ 28 महीने में क्यों बिखर गई?
सत्ता में आने के कुछ ही महीनों बाद जनता पार्टी के भीतर अंतर्विरोध सामने आने लगे। प्रधानमंत्री पद को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। जेपी, जो इस राजनीतिक परिवर्तन के प्रेरणास्रोत थे, स्वयं धीरे-धीरे सत्ता के निर्णायक केंद्र से बाहर कर दिए गए।
पटना में बीमार और असहाय पड़े जेपी लगातार नेताओं को समझाने का प्रयास करते रहे। उन्होंने Jagjivan Ram को प्रधानमंत्री बनाकर विवाद सुलझाने का सुझाव भी दिया, लेकिन बात नहीं बनी।
दूसरी ओर Indira Gandhi राजनीतिक वापसी की तैयारी में थीं। उन्होंने इसके लिए एक मशहूर शराब व्यापारी का सहारा लिया. अंततः जनता पार्टी सरकार गिर गई और केवल 28 महीनों के भीतर कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई।
इतिहास के कई अनसुलझे सवाल
आज भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं—
- जेपी को इंदिरा विरोधी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने के पीछे किन नेताओं की भूमिका थी?
- सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन अपनी मूल दिशा से क्यों भटक गया?
- जनता पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष इतना तीखा क्यों हुआ?
- क्या जेपी के सपनों के साथ राजनीतिक विश्वासघात हुआ?
- क्या इमरजेंसी और जनता पार्टी का अनुभव आज की भारतीय राजनीति के लिए भी प्रासंगिक है?
कुमार प्रशांत से विशेष बातचीत
इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने के लिए मीडिया स्वराज ने वरिष्ठ पत्रकार, गांधीवादी चिंतक और जयप्रकाश आंदोलन के निकट सहयोगी Kumar Prashant से विस्तृत बातचीत की।
इस विशेष चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी और कुमार प्रशांत इमरजेंसी, सम्पूर्ण क्रांति, जनता पार्टी के उदय और पतन से जुड़े अनेक अनकहे प्रसंगों और ऐतिहासिक रहस्यों पर प्रकाश डालते हैं।
देखें आज शाम 5 बजे
“Inside Story of 1975 Emergency: JP’s Total Revolution & Why Janata Party Failed”
📺 Media Swaraj YouTube Channel पर आज शाम 5 बजे
🔗 https://youtu.be/OC_svIEVTRY
आपसे अनुरोध है कि इस महत्वपूर्ण चर्चा को अवश्य देखें, अपनी प्रतिक्रिया कमेंट में लिखें और इसे उन मित्रों तक भी पहुँचाएँ जिनकी रुचि भारतीय राजनीति, लोकतंत्र और समकालीन सामाजिक प्रश्नों में है।



