
लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका ज्योति यादव की चर्चित पुस्तक Faith and Fury: Covid Dispatches from India’s Hinterlands पर शनिवार को लखनऊ स्थित अखिल भारतीय कैफ़ी आज़मी अकादमी में एक विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम का आयोजन प्रकाशन संस्था वेस्टलैंड बुक्स द्वारा किया गया, जिसमें पुस्तक के साथ-साथ कोविड महामारी के दौरान भारतीय समाज, ग्रामीण भारत और पत्रकारिता की भूमिका पर भी गंभीर विमर्श हुआ।
यह पुस्तक कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से लिखी गई रिपोर्टों का संकलन है। इसमें उन लोगों की कहानियाँ दर्ज हैं, जो महामारी, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक असुरक्षा के बीच संघर्ष कर रहे थे। पुस्तक महामारी के आँकड़ों से आगे बढ़कर उस मानवीय अनुभव को सामने लाती है, जो अक्सर मुख्यधारा की बहसों में छूट जाता है।
परिचर्चा में लेखिका ज्योति यादव के साथ वरिष्ठ साहित्यकार अखिलेश, हिंदुस्तानटाइम्स लखनऊ के आवासीय संपादक प्रांशु मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं बीबीसी के पूर्व संवाददाता राम दत्त त्रिपाठी, तथा लेखक-पत्रकार शरत प्रधान शामिल रहे।
अपने वक्तव्य में ज्योति यादव ने कहा कि कोविड केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि उसने लोगों के जीवन, रिश्तों, कामकाज और सामाजिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि महामारी के दौरान समाज में गुस्सा, असुरक्षा और निराशा तो थी ही, साथ ही मानवता, सहयोग और उम्मीद की अनेक कहानियाँ भी सामने आईं। उनके अनुसार, कोविड के पाँच वर्ष बाद भी समाज और व्यक्ति उस दौर के प्रभावों से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार अखिलेश ने पुस्तक को “समय के तकलीफ़देह पन्नों पर लिखा गया यात्रावृत्त” बताते हुए कहा कि इसके पात्र महामारी के दौरान पैदा हुए विभिन्न सामाजिक और मानवीय संकटों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी ने ज्योति यादव को बधाई देते हुए कहा कि कठिन समय को दर्ज करना स्वयं एक चुनौतीपूर्ण और साहसिक कार्य है। उन्होंने कहा कि महामारी के दौर की जमीनी सच्चाइयों को दस्तावेज़ के रूप में संजोना भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।
लेखक-पत्रकार शरत प्रधान ने कहा कि पुस्तक भारतीय समाज की उन संरचनात्मक विसंगतियों को भी उजागर करती है, जिन्होंने कोरोना संकट को और अधिक गंभीर बना दिया। उनके अनुसार यह कृति केवल महामारी की कथा नहीं, बल्कि समाज की अंतर्निहित कमजोरियों की भी पड़ताल करती है।
पत्रकार प्रांशु मिश्रा ने कहा कि ज्योति यादव की रिपोर्टिंग उन तथ्यों को सामने लाती है जिन्हें अक्सर सत्ता और व्यवस्था के शोर में दबा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि कोविड काल में स्वयं फील्ड रिपोर्टिंग करने के कारण उन्हें पुस्तक से व्यक्तिगत जुड़ाव महसूस हुआ। उनके अनुसार यह पुस्तक पत्रकारों, चिकित्सकों, प्रशासनिक अधिकारियों और कोरोना वॉरियर्स सभी को अपनी कहानी जैसी लगेगी।
कार्यक्रम के पहले सत्र के अंत में लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा ने कहा कि महामारी के दौरान देश की स्वास्थ्य व्यवस्था जिस तरह चरमराई, उस पर गंभीर विमर्श होना चाहिए और यह पुस्तक उस आवश्यक बहस को आगे बढ़ाती है।
कार्यक्रम का संचालन लेखक एवं पत्रकार अरशाना अज़मत ने किया। उन्होंने पुस्तक के प्रमुख विषयों और प्रश्नों को सामने रखते हुए चर्चा को सार्थक दिशा दी।
परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि कोविड महामारी केवल एक चिकित्सा आपदा नहीं थी, बल्कि उसने भारत में स्वास्थ्य, रोजगार, प्रवासन और सामाजिक असमानताओं से जुड़े गहरे सवालों को उजागर किया।



