
(राम दत्त त्रिपाठी)
भारत के अनेक इलाकों से यह मांग पुरज़ोर तरीके से उठ रही है कि गाय को भारत का ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित किया जाए और देशव्यापी गोहत्या प्रतिबंध लगाया जाए। चौंकाने वाली बात यह है कि इस मांग के सबसे मुखर पैरोकार पारंपरिक दक्षिणपंथी हिंदू संगठन नहीं, बल्कि देश के कई प्रमुख मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु बनकर उभरे हैं।
भारतीय राजनीति और समाज में गाय हमेशा से एक संवेदनशील, आस्थापरक और अत्यधिक ध्रुवीकृत विषय रही है। हाल के दशकों में इसे लेकर सड़कों पर राजनीति, संसद में बहसें और दुर्भाग्यपूर्ण रूप से मॉब लिंचिंग की विचलित करने वाली घटनाएं देखी हैं। लेकिन वर्तमान समय में इस विमर्श ने एक अप्रत्याशित और दिलचस्प मोड़ ले लिया है, जिसने राजनीतिक पंडितों और समाजशास्त्रियों को चकित कर दिया है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम जमात और अजमेर शरीफ दरगाह के मौलानाओं द्वारा उठाई गई इस मांग ने एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है — मुस्लिम नेताओं के इस रणनीतिक कदम ने कई कट्टरपंथी हिंदू नेताओं, संतों और विचारकों के बीच भारी बेचैनी पैदा कर दी है।
आखिर इस बेचैनी की वजह क्या है? क्यों एक ऐसा मुद्दा, जो दक्षिणपंथी राजनीति के एजेंडे में शीर्ष पर होना चाहिए था, आज उनके लिए ही गले की फांस बनता दिख रहा है? इसके पीछे छिपे धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों का गहराई से विश्लेषण आवश्यक है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का ‘धर्मयुद्ध’ और हिंदू राजनीति का अंतर्विरोध
हिंदू खेमे में मची बेचैनी को हवा देने में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया देशव्यापी आंदोलन ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
‘कविष्टि यात्रा’ और गो-प्रतिष्ठा आंदोलन

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने गाय को ‘राष्ट्र माता’ का दर्जा दिलाने और देश में पूर्ण गोहत्या बंदी लागू करने के लिए एक व्यापक अभियान छेड़ रखा है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से शुरू हुई उनकी ८१ दिवसीय ‘कविष्टि यात्रा’ — मवेशियों की रक्षा के लिए वैदिक संघर्ष — राज्य के एक लाख से अधिक गांवों से गुजर रही है। शंकराचार्य का स्पष्ट प्रश्न है: जो सरकार खुद को हिंदुत्ववादी कहती है, उसने नौ साल बाद भी गाय को संवैधानिक संरक्षण क्यों नहीं दिया?
संतों का सत्तारूढ़ दल पर तीखा हमला
शंकराचार्य ने भगवा चोला पहनने वाले राजनेताओं पर सीधे निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि हिंदुत्व के नाम पर वोट लेने वाली सरकारें पर्दे के पीछे से करोड़ों गायों की हत्या और उनके मांस के व्यापार को सहयोग दे रही हैं। चंदौली और लखनऊ की सभाओं में उन्होंने खुलकर कहा:
“यह सरकार खुद को सनातनी कहती है, लेकिन करोड़ों गोमाताएं काटकर विदेशों में बेची जा रही हैं।अगली बार केवल उसी को वोट दें जो गाय को ‘राष्ट्रमाता‘ घोषित करने का लिखित संकल्प ले।“
इस आंदोलन ने दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है, क्योंकि जो संत समुदाय उनका कोर वोटर और मार्गदर्शक माना जाता था, वही अब उनके खिलाफ सड़कों पर है।
मुस्लिम संगठनों की मांग: सोची-समझी सामाजिक रणनीति
ईद-उल-अज़हा के आसपास गोवंश संरक्षण और राष्ट्रीय पशु के दर्जे की मांग मुस्लिम हलकों से तेज हुई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद (अशद मदनी गुट), ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी और अजमेर शरीफ के मौलाना सैयद सरवर चिश्ती ने खुलकर बयान दिए हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने भी कहा कि यदि किसी बड़े विवाद की जड़ को खत्म किया जा सकता है, तो देश में शांति और सौहार्द के लिए ऐसा किया जाना चाहिए।
इस रुख के पीछे दो मुख्य तर्क काम कर रहे हैं:
भीड़ हिंसा के नैरेटिव पर पूर्णविराम
पिछले एक दशक में गो-तस्करी और बीफ के संदेह में होने वाली लिंचिंग ने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना को गहरा किया है। २०१५ का दादरी में मोहम्मद अखलाक मामला, २०१७ में राजस्थान के डेयरी किसान पहलू खान की हत्या और हरियाणा के चरखी दादरी में साबिर मलिक की पिटाई से हत्या — इन सब घटनाओं के केंद्र में गाय रही है।
मुस्लिम नेताओं का तर्क है: यदि गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित किया जाए, तो उसके संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य की संवैधानिक मशीनरी पर आ जाएगी। ‘गौ रक्षा दल’ जैसे स्वयंभू समूहों का कानूनविहीन एकाधिकार समाप्त होगा। जैसा कि एक मुस्लिम धर्मगुरु ने कहा — “न हिंदू मरे, न मुसलमान मरे; विवाद की जड़ ही खत्म हो जाए।”
कानूनी विसंगतियों का अंत
वर्तमान में विभिन्न राज्यों में गोवंश संरक्षण को लेकर परस्पर विरोधी कानून हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बेहद कड़े कानून हैं — गैर-जमानती धाराएं, यहां तक कि NSA तक। वहीं पूर्वोत्तर के राज्यों और गोवा या केरल में मवेशियों के परिवहन पर ऐसे प्रतिबंध नहीं हैं। इस कानूनी असमानता के कारण अंतरराज्यीय पशु व्यापार करने वाले व्यापारी — जो अक्सर मुस्लिम या दलित होते हैं — हिंसा या कानूनी शिकंजे का शिकार हो जाते हैं।
हिंदू नेताओं की बेचैनी के असली कारण
‘राष्ट्र माता’ बनाम ‘राष्ट्रीय पशु’ का वैचारिक टकराव
हिंदू संतों का तर्क है कि गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करना वास्तव में उसका अपमान है। यदि गाय राष्ट्रीय पशु बनती है, तो वह कानूनी रूप से उसी श्रेणी में आ जाएगी जिसमें बाघ या हाथी हैं। हिंदू समाज गाय को ‘गौमाता’ मानता है — इसलिए मांग है ‘राष्ट्र माता’ का सर्वोच्च संवैधानिक दर्जा। मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘पशु’ शब्द के इस्तेमाल ने संतों में यह संदेह पैदा किया है कि कहीं यह गाय के आध्यात्मिक दर्जे को महज एक वन्यजीव की श्रेणी में समेटने की कोशिश तो नहीं।
पूर्वोत्तर का राजनीतिक संकट
पूर्वोत्तर के राज्यों — असम, नागालैंड, मेघालय, मिजोरम — में बड़ी संख्या में ईसाई, जनजातीय और हिंदू आबादी रहती है, जिनकी खान-पान की संस्कृति उत्तर भारत से सर्वथा भिन्न है। यदि पूरे देश में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हुआ, तो पूर्वोत्तर में सत्तारूढ़ दल की पूरी राजनीतिक जमीन एक झटके में खिसक जाएगी।
गिरिराज सिंह का पलटवार: “कागजी मांग बंद करें”
केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने मुस्लिम नेताओं की इस मांग को “ढोंग” और “सहानुभूति बटोरने का जरिया” करार दिया। उनका तर्क सीधा था:
“अगर मुस्लिम नेताओं को गाय से इतनी मोहब्बत है, तो वे पहले आगे आएं और देश के सभी मुसलमानों से अपील करें कि वे स्वेच्छा से बीफ खाना छोड़ दें।क्या जमीयत उलेमा–ए–हिंद या अजमेर शरीफ के मौलाना यह फतवा जारी करने की हिम्मत रखेंगे कि गोमांस खाना इस्लाम में हराम है? जब तक ऐसा नहीं होता, यह मांग केवल बहुसंख्यक समाज को गुमराह करने का जरिया है।“
यह बयान साफ दिखाता है कि हिंदू नेतृत्व मुस्लिम संगठनों के इस बदले रुख को सहजता से स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
गांधीजी की गोरक्षा की अवधारणा
महात्मा गांधी स्वयं को गोरक्षा का समर्थक मानते थे और गाय को भारतीय संस्कृति में करुणा, सेवा और अहिंसा का प्रतीक बताते थे। उनके लिए गाय केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि उन सभी मूक और निर्बल प्राणियों का प्रतिनिधित्व करती थी जिनकी रक्षा करना मनुष्य का नैतिक दायित्व है। गांधीजी का मानना था कि सच्ची गोसेवा का अर्थ केवल गोहत्या रोकना नहीं, बल्कि पशुओं की देखभाल, किसानों की सहायता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।
गोहत्या और सांप्रदायिक तनाव पर गांधीजी का दृष्टिकोण
गांधीजी गोहत्या के स्पष्ट विरोधी थे, लेकिन वे इस बात के भी उतने ही विरोधी थे कि गाय के नाम पर हिंदू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य या हिंसा पैदा हो। उनका प्रसिद्ध विचार था कि “मैं गाय की रक्षा के लिए अपने प्राण दे सकता हूँ, लेकिन किसी मनुष्य की जान नहीं ले सकता।” उनका मानना था कि गोरक्षा प्रेम, संवाद और नैतिक समझाइश से होनी चाहिए, न कि दबाव, भय या हिंसा से। उनके अनुसार गाय की रक्षा के नाम पर किसी मनुष्य के साथ अन्याय या हिंसा करना स्वयं गोरक्षा की भावना के विरुद्ध है।
आज की बहस के संदर्भ में गांधीजी की प्रासंगिकता
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने, गोहत्या प्रतिबंध और भीड़ हिंसा को लेकर चल रही समकालीन बहसों के बीच गांधीजी का दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण नैतिक कसौटी प्रस्तुत करता है। वे संभवतः यह प्रश्न उठाते कि क्या हमारी राजनीति गाय के संरक्षण और गोसेवा को बढ़ावा दे रही है, या फिर गाय को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माध्यम बना रही है। गांधीजी के लिए गोरक्षा का अंतिम उद्देश्य समाज में सद्भाव, पशुधन संरक्षण और ग्रामीण जीवन की समृद्धि था, न कि समुदायों के बीच अविश्वास और संघर्ष को बढ़ाना।
भारत में बीफ का बिज़नेस: वास्तविकता क्या है?
‘कैराबिफ’: गाय नहीं, भैंस का मांस
वैश्विक व्यापार में ‘बीफ’ शब्द बड़े मवेशियों के मांस के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन भारत के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भारत से कानूनी तौर पर निर्यात होने वाला शत-प्रतिशत बीफ वास्तव में गाय का नहीं, बल्कि जल भैंस (Water Buffalo) का मांस होता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘कैराबिफ’ (Carabeef) कहा जाता है।
• भारत सरकार के APEDA नियमों के तहत गाय, बछड़े या सांड के मांस का निर्यात पूरी तरह प्रतिबंधित है।
• वैश्विक सीमा शुल्क कोड में भैंस के मांस को भी ‘बीफ’ श्रेणी में दर्ज किया जाता है — इसी से यह भ्रम फैलता है कि भारत गाय का मांस निर्यात कर रहा है।
• भारत सालाना लगभग 4 बिलियन डॉलर का भैंस का मांस वियतनाम, मलेशिया, मिस्र, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों को निर्यात करता है।
इस बिज़नेस को कौन चला रहा है?
शीर्ष निर्यातक कंपनियां:
| कंपनी | प्रमोटर | विवरण |
| एलानासंस प्राइवेट लिमिटेड | एलाना परिवार (मुस्लिम) | भारत की सबसे बड़ी मीट एक्सपोर्ट कंपनी — सालाना टर्नओवर $1.1 बिलियन से अधिक। |
| एचएमए एग्रो इंडस्ट्रीज | कुरैशी परिवार (मुस्लिम) | शेयर बाजार में सूचीबद्ध अग्रणी मीट प्रोसेसिंग कंपनी। |
| फेयर एक्सपोर्ट्स | लुलु ग्रुप / एम.ए. युसूफ अली (मुस्लिम) | खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर आपूर्ति। |
| रुस्तम फूड्स, अल-हमद, अल-दुआ | मिश्रित मुस्लिम प्रमोटर्स | आधुनिक कत्लखाने और पैकेजिंग इकाइयाँ। |
जमीनी स्तर पर हिंदू भागीदारी:
भले ही बड़ी निर्यातक कंपनियों के मालिक मुस्लिम समुदायों से जुड़े दिखते हों, इस उद्योग की रीढ़ हिंदू व्यापारियों और किसानों पर टिकी है।
• कत्लखानों तक भैंसों और अनुपयोगी मवेशियों को पहुंचाने वाले 70% से अधिक स्थानीय पशु व्यापारी, बिचौलिए और किसान हिंदू समुदाय से आते हैं। खेती के मशीनीकरण के बाद हिंदू किसान ही अपने अनुत्पादक मवेशियों को मंडियों में बेचते हैं।
• मीट प्रोसेसिंग प्लांटों में काम करने वाले मजदूर, कोल्ड स्टोरेज मालिक, पैकेजिंग सामग्री सप्लायर और लॉजिस्टिक्स कंपनियों में बहुसंख्यक समुदाय की बड़ी हिस्सेदारी है।
यही वह आर्थिक घालमेल है जिसके कारण कोई भी राजनीतिक दल इस उद्योग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा पाता — ऐसा करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों चरमरा जाएंगे।
6. खेती का मशीनीकरण और गोवंश का असली संकट
इस पूरी राजनीतिक बहस की परतें हटाकर देखें तो असली संकट न तो ‘राष्ट्रीय पशु’ का है, न ‘राष्ट्र माता’ का। असली संकट आर्थिक और पारिस्थितिक है, जिसे खेती के मशीनीकरण ने जन्म दिया है।
बैल की आर्थिक बर्बादी
भारतीय कृषि में ट्रैक्टर और रोटावेटर का उपयोग अनिवार्य हो चुका है। इसने पारंपरिक कृषि की धुरी रहे नर गोवंश — बैल — की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त कर दी है। बछड़ों और बैलों को पालना किसानों के लिए एक भारी आर्थिक बोझ बन गया है।
पशुधन जनगणना के आंकड़े
• भारत में कुल गोवंश की आबादी लगभग 19.34 करोड़ है।
• डेयरी उद्योग के बढ़ने के कारण मादा गोवंश की संख्या में 18% से अधिक की वृद्धि हुई है।
• नर गोवंश (बैल/सांड) की संख्या में 30% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।
• विदेशी और संकर नस्लें (जर्सी/HF) 29% की दर से बढ़ रही हैं जबकि देशी नस्लें (साहीवाल, गीर) 6% घट गई हैं।
छुट्टा जानवरों की राष्ट्रीय समस्या
मशीनीकरण और सख्त कानूनों के टकराव ने ‘छुट्टा जानवरों’ की भयानक समस्या को जन्म दिया है। दूध बंद होने के बाद किसान गायों और सांडों को रात के अंधेरे में छोड़ देते हैं। ये लाखों छुट्टा पशु खड़ी फसलें तबाह कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में ऐसे लावारिस मवेशियों की संख्या 50 लाख (5 मिलियन) को पार कर चुकी है।
निष्कर्ष: प्रतीकों की राजनीति बनाम यथार्थ की गोसेवा
मुस्लिम नेताओं की यह मांग, शंकराचार्य का राष्ट्रव्यापी धर्मयुद्ध और हिंदू नेताओं की बेचैनी — यह सब साबित करते हैं कि भारत में गाय आज भी एक राजनीतिक फुटबॉल बनी हुई है।
मुस्लिम संगठन इस मांग के जरिए भीड़ हिंसा के नैरेटिव से मुक्त होकर कानून की सुरक्षा छतरी के नीचे आना चाहते हैं, वहीं हिंदू नेता अपनी ‘राष्ट्र माता’ की धार्मिक अवधारणा और मीट एक्सपोर्ट के पेचीदे आर्थिक ताने-बाने को लेकर असहज हैं।
लेकिन पशुधन आंकड़े और बीफ व्यापार के वास्तविक समीकरण साफ बताते हैं कि समस्या किसी ‘संवैधानिक दर्जे’ की कमी की नहीं है। राजनीति प्रतीकों से चलती है, लेकिन समाज और अर्थव्यवस्था यथार्थ के धरातल पर सांस लेते हैं।
जब तक गाय के गोबर, गोमूत्र और अनुत्पादक गोवंश को बायोगैस, CNG उत्पादन और प्राकृतिक खेती से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक कागजी दर्जे बदलने से ज़मीन पर गायों की दुर्दशा का अंत नहीं होगा।



