डा अचल पुलस्तेय
समकालीन भारत में ‘विकास’ और ‘राष्ट्रवाद’ के नए विमर्श ने एक जटिल परिस्थिति पैदा कर दी है, जहाँ हाशिए पर खड़े समुदायों का अस्तित्व लगातार संकटग्रस्त होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की हालिया रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि नफरत अब केवल सामाजिक पूर्वाग्रह या राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक संस्थागत संरचना का रूप लेती जा रही है, जिसके माध्यम से अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, श्रमिकों और गरीब समुदायों को उनके भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेश से व्यवस्थित रूप से बेदखल किया जा रहा है।
यह विस्थापन केवल जमीन का प्रश्न नहीं है; यह स्मृति, संस्कृति, समुदाय और पहचान के विघटन का प्रश्न भी है। भारत के विभिन्न हिस्सों में चल रही परियोजनाएँ इस नए भूगोल को स्पष्ट करती हैं। बुंदेलखंड की केन-बेतवा लिंक परियोजना, छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, ओडिशा का नियमगिरि, सिंगरौली की कोयला खदानें, असम का डोलू चाय बागान और पूर्वोत्तर के सामरिक क्षेत्र—ये सब अब केवल विकास परियोजनाएँ नहीं रहे, बल्कि ‘सैक्रिफाइस ज़ोन्स’ में बदलते जा रहे हैं।
इन क्षेत्रों में आदिवासी और स्थानीय समुदायों को इस तर्क के साथ विस्थापित किया जा रहा है कि राष्ट्र की ऊर्जा, खनिज, आधारभूत संरचना और शहरी विस्तार के लिए यह ‘आवश्यक’ है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या किसी राष्ट्र का विकास अपने सबसे कमजोर समुदायों को मिटाकर संभव है? केन-बेतवा परियोजना के कारण हजारों आदिवासी परिवारों के डूब क्षेत्र में आने की आशंका है।
पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास रहने वाले गोंड और सौर समुदायों को उनके पारंपरिक परिवेश से हटाकर पुनर्वास केंद्रों में भेजा जा रहा है, जहाँ अक्सर बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। हसदेव अरण्य में कोयला खनन के विस्तार ने अनेक आदिवासी गाँवों को संकट में डाल दिया है। स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं और ‘पेसा कानून’ तथा वनाधिकार कानून की अनदेखी के आरोप सामने आए हैं।
शहरी भारत में भी विस्थापन का स्वरूप अलग नहीं है। दिल्ली, वाराणसी, लखनऊ, मुंबई, भोपाल और कोलकाता जैसे शहरों में ‘सौंदर्यीकरण’, ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियानों के नाम पर हजारों गरीब परिवारों और श्रमिक समुदायों को उजाड़ा जा रहा है।
इन घटनाओं का सबसे चिंाजनक पक्ष यह है कि विकास और सुरक्षा की भाषा में दमन को वैधता मिलती जा रही है। जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाले लोगों को ‘विकास विरोधी’, ‘राष्ट्र विरोधी’ या ‘अतिक्रमणकारी’ बताकर उनकी आवाज़ को कमजोर किया जाता है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो इसके परिणाम केवल मानवाधिकार संकट तक सीमित नहीं रहेंगे।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विकास को केवल पूंजी और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के रूप में देखना बंद करे और उसे संवैधानिक नैतिकता, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जोड़े। अन्यथा ‘विकास’ का वर्तमान मॉडल एक ऐसे सभ्यतागत संकट में बदल सकता है, जहाँ आर्थिक प्रगति की चमक के पीछे समाज का मानवीय आधार धीरे-धीरे नष्ट होता जा रहा है।
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डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक और कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़,कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी,लोकतंत्र और रेलगाड़ी,जरा सोच के बताना,,लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं, जो उनके रचनात्मक साहस और विशिष्ट दृष्टि को दर्शाती हैं.
