
बदलती एकाग्रता, बदलती आदतें
एक समय था जब लोग लंबी और धीमी फिल्में देखते थे। बाद में फिल्मों की गति बढ़ी तो ‘शोले’ जैसी फिल्म भी धीमी लगने लगी। 5G के बाद तो सब कुछ बदल गया। TikTok और Reels का उदय हुआ और मनोरंजन की पूरी कल्पना बदल गई। अब हम 15-20 सेकंड से अधिक का दृश्य देखना पसंद नहीं करते। लंबे समय तक पढ़ नहीं पाते। लगातार लंबे समय तक सोच भी नहीं पाते।
सच यह है कि फिल्म, किताब और चिंतन—तीनों के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यकता होती है, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज हम Reels देखते हैं, यानी बिना ज्यादा सोचे तत्काल समाधान खोजने की आदत विकसित हो रही है।
सोशल मीडिया वास्तव में मुफ़्त नहीं है
आज देश में AI और तकनीक के परिणाम दिखाई दे रहे हैं। रोजगार का संकट है। असमानता बढ़ रही है। फिर भी युवा वर्ग अपेक्षाकृत शांत है। बड़े पैमाने पर असंतोष होने के बावजूद व्यापक आंदोलन दिखाई नहीं देते। लोगों को व्यस्त और उलझाए रखने में डिजिटल तकनीक और AI की भी भूमिका है।
Facebook, Instagram जैसे प्लेटफॉर्म बनाने में उनकी कंपनियों ने अरबों डॉलर निवेश किए हैं। हजारों लोगों को रोजगार दिया है। फिर ये सेवाएँ हमें मुफ्त क्यों मिलती हैं?
क्योंकि वास्तव में हम ग्राहक नहीं, बल्कि उत्पाद हैं।
आप जो देखते हैं, पढ़ते हैं, पसंद करते हैं, उस सबका लगातार विश्लेषण होता रहता है।
आपका डिजिटल प्रोफ़ाइल आपसे ज़्यादा कौन जानता है?
आप किससे प्रेम करते हैं और किससे घृणा?
आप कितना गहराई से सोचते हैं?
आपकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या है?
आपका राजनीतिक रुझान किस ओर है?
आपके मित्र और परिवार कौन हैं?
इन सबका विशाल डेटा सोशल मीडिया कंपनियों के पास मौजूद होता है।
आप उन्हीं के प्लेटफॉर्म पर अधिक समय बिताते रहें, इसलिए आपको आपकी पसंद के अनुरूप समाचार, तस्वीरें, वीडियो और संदेश दिखाए जाते हैं। धीरे-धीरे वही आपकी दुनिया बन जाती है। हर व्यक्ति को अपनी डिजिटल दुनिया ही पूरी दुनिया लगने लगती है।
और इसी जानकारी को बेचकर या उसके आधार पर विज्ञापन दिखाकर कंपनियाँ पैसा कमाती हैं।
विभाजन का डिजिटल कारोबार
जब लोगों की सोचने और प्रश्न पूछने की क्षमता कमजोर होने लगती है, तब कठिन सवालों से ध्यान हटाना आसान हो जाता है।
ऐसे में हिंदू-मुस्लिम, दलित-सवर्ण, उत्तर भारतीय-दक्षिण भारतीय, मराठी-हिंदी भाषी जैसी विभाजन रेखाएँ राजनीतिक और सामाजिक उपयोगिता प्राप्त कर लेती हैं।
गलत खबरें फैलानी पड़ती हैं। झूठ को बार-बार दोहराया जाता है। और एक समय बाद वही सच जैसा प्रतीत होने लगता है।
इन प्रक्रियाओं में AI, डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
AI और झूठ की नई फैक्ट्री
मान लीजिए आप तमिल भाषी हैं। आज आपके मन में हिंदी भाषियों के प्रति कोई नकारात्मक भावना नहीं है। लेकिन यदि आपको लगातार ऐसी झूठी खबरें भेजी जाएँ जो हिंदी भाषियों के बारे में गलत धारणाएँ पैदा करें, तो समय के साथ आपकी सोच प्रभावित हो सकती है।
यह केवल एक व्यक्ति के साथ नहीं होता। यह बड़े समूहों को प्रभावित करने की प्रक्रिया है।
अलग-अलग समुदायों को अलग-अलग संदेश भेजना, विशेष समूहों के लिए अलग सामग्री तैयार करना और धीरे-धीरे उनकी सोच को प्रभावित करना—AI आधारित प्रणालियाँ इस काम को पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी बना सकती हैं।
डीपफेक का खतरा
आपकी आवाज़ और आपके वीडियो AI को उपलब्ध करा दिए जाएँ, तो आपके नाम से अनगिनत नकली वीडियो तैयार किए जा सकते हैं।
उनमें आप पत्थर फेंकते, हिंसा करते या कोई विवादास्पद बयान देते दिखाई दे सकते हैं।
ये वीडियो इतने वास्तविक लग सकते हैं कि चुनावी परिणामों को प्रभावित कर दें।
यदि सोशल मीडिया पर आपका ऐसा वीडियो वायरल हो जाए, तो पुलिस आपको पकड़ेगी या वीडियो बनाने वालों को?
यह प्रश्न आने वाले समय में और जटिल होता जाएगा।
क्या हम सोचने की क्षमता खो रहे हैं?
मोबाइल और डिजिटल माध्यमों के जरिए आज इंसान पर जरूरत से कहीं अधिक जानकारी थोपी जा रही है।
सब कुछ देखने और जानने की आदत बन गई है।
नतीजा यह है कि दिमाग लगातार थकता जा रहा है। गहराई से सोचने की क्षमता कमजोर हो रही है।
और शायद यही वह समय है जब लोगों के बीच घृणा और विभाजन फैलाना सबसे आसान हो जाता है।
तकनीक और नैतिकता का प्रश्न
तकनीक के पास अपनी कोई नैतिकता नहीं होती।
वह जिस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की जाए, उसी दिशा में काम करती है।
यदि वह मानवीय कल्याण के लिए उपयोग हो तो विकास की गति बढ़ सकती है। लेकिन यदि वह विनाशकारी उद्देश्यों के हाथों में पहुँच जाए, तो विनाश की रफ्तार भी कई गुना बढ़ सकती है।
AI और हम: एक सामाजिक पड़ताल
इस श्रृंखला के पिछले भाग
भाग 1: Science और Technology का फर्क — और AI की असली चुनौती
Science और Technology को एक ही समझने की गलती हम अक्सर करते हैं। किसी प्रतिष्ठित technologist को हम scientist कह देते हैं, या किसी scientist को technologist बना देते हैं। AI की चुनौती को समझने के लिए दोनों के बीच का फर्क समझना जरूरी है।
https://mediaswaraj.com/science-technology-difference-ai-challenge/
भाग 2: क्या AI सिर्फ एक और कंप्यूटर प्रोग्राम है? नहीं।
प्रोग्रामिंग में इंसान कंप्यूटर को हर कदम का निर्देश देता है। AI में मशीन बड़ी मात्रा में डेटा से पैटर्न सीखती है और नए निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। यही फर्क आज की तकनीकी क्रांति की जड़ में है।
https://mediaswaraj.com/slug-programming-vs-ai-neural-network-explained/
भाग 3: AI और रोजगार — विकास या Jobless Growth?
कौन से रोजगार नष्ट होंगे, किस क्षेत्र में कितने प्रतिशत कामगारों पर असर होगा—यह World Economic Forum से लेकर NITI Aayog तक सबने बताया है। लेकिन नए रोजगार कितने बनेंगे, इस पर सबकी चुप्पी है।
https://mediaswaraj.com/ai-employment-jobless-growth-india/
भाग 4: AI औरविषमता — क्यातकनीकअसमानताबढ़ारहीहै?
AI की वजह से आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है? Oxfam Report क्या कहती है? Jobless Growth का मतलब क्या है? और लाचार समाज कैसे बन रहा है?
भाग 5 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सूचना। क्या हमारा दिमाग़ जंग खा रहा है?
https://mediaswaraj.com/slug-ai-economic-inequality-india-hindi/
अगले भाग में
AI और मानव कल्याण — क्या सचमुच होगा?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सभी पहलुओं को विस्तार से समझने के लिए बीबीसी के पूर्व संवाददाता राम दत्त त्रिपाठी की टेक गुरु सैम पित्रोदा से बातचीत यहाँ जरूर सुनें



