ख़बरदार! काम पर नहीं जायेंगे’

महेश चंद्र द्विवेदी

पहले भी बहुत ज़िंदगी देखी थी,
सुस्ती देखी थी, काहिली देखी थी;
न सोचा था आयेगा आदेश कभी,
जब बौस हमें घुड़ककर समझायेंगे-
‘ख़बरदार! काम पर नहीं जायेंगे’।

घर में रहेंगे, न मिलेंगे बाहरी से
सोयेंगे या जागेंगे अपनी ख़ुशी से;
देखेंगे सीरियल या नमकीन पिक्चर
खायेंगे, पियेंगे, आराम फ़रमायेंगे-
पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’।

ख़बर दिन भर करोना की देखेंगे
रेप और हिंसा न दिल दहलायेंगे;
दानवीर बनने का मिलेगा मौका,
भूखों को खिलायेंगे, फोटो खिचायेंगे-
पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’।

व्हाट्सऐप पर अपने वीडिओ डालेंगे
ट्विटर पर छिपी विद्वत्ता निकालेंगे;
फेसबुक पर नित-नित कुछ लिखकर
झूठी, सच्ची दाद से मन बहलायेंगे-
पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’।

परिवार संग जमकर खेलेंगे कैरम
लड़ेंगे-झगड़ेंगे औ ख़ूब बतियायेंगे;
घर में दूरी की ज़रूरत ही क्या है?
पत्नी के सभी गिले-शिकवे मिटायेंगे-
पर ‘ख़बरदार! काम पर न जायेंगे’

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