उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन तैयार कर पायेगी कांग्रेस?

आगामी चुनाव को लेकर UP में सियासी जमीन तैयार कर पायेगी कांग्रेस?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस: महिलाओं के लिये ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं‘ अभियान चलाने के बाद अब कांग्रेस पार्टी युवाओं को रिझाने के लिये ‘भर्ती विधान‘ नाम से अपना चुनावी घोषणा पत्र लेकर जनता के बीच पहुंची। इस मुद्दे पर मीडिया स्वराज और द इंडियन पोस्ट ने मिलकर इस मुद्दे पर चर्चा की कि क्या आगामी चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन तैयार कर पायेगी कांग्रेस?

इसके अलावा अमित शाह के कैराना पहुंचने का भी अर्थ तलाशने की कोशिश हम करेंगे। माना जा रहा है कि शाह कैराना में उसी अंदाज में चुनाव प्रचार करेंगे जैसा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में किया था।

वरिष्ठ संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी और कुमार भवेश चंद्र के साथ इस मुद्दे पर चर्चा में शामिल हैं जुबली पोस्ट के संपादक डॉ. उत्कर्ष सिन्हा, जदीद मरकज के संपादक हिजाम सिद्दीकी साहब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत बताने वाले विश्वराज चौधरी और कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता अंशू अवस्थी।

कांग्रेस ने आज 20 लाख नौकरी देने की बात की है, माना ये जा रहा था कि ऐसी कोई घोषणा समाजवादी पार्टी कर सकती है।

आज प्रियंका गांधी ने यह इशारा भी कर दिया है कि यूपी में कांग्रेस का चेहरा वो होंगी। माना जा रहा है कि यूपी की राजनीति को एक नई दिशा देने की कांग्रेस की कोशिश की सराहना तो अवश्य की जानी चाहिये लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि फिलहाल कांग्रेस का संगठन इतना मजबूत नहीं है कि वो जीत दिला सकती है। फिर, कांग्रेस ने खडे होने में देर भी बहुत कर दी है। ऐसे में लगता नहीं है कि कांग्रेस फिलहाल बहुत ज्यादा हलचल मचा पायेगी।

अंशू अवस्थी: हम चाहते हैं कि यूपी में पिछले कई वर्षों से जो जाति पति की राजनीति हो रही है, उसे दूर किया जा सके और प्रदेश की राजनीति जनता से जुडे मुद्दों पर वापस आये। यह सही है कि हमें सस्ती लोकप्रियता नहीं मिल पायेगी लेकिन हमें खुशी है कि कांग्रेस पार्टी ने युवाओं और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखकर घोषणा पत्र तैयार किया है।

कुमार भवेश चंद्र : कांग्रेस के मुद्दे सही हैं, वह अपनी बात भी अच्छी तरह से रख रही है। फिर भी क्या वजह है कि पार्टी बहुत बेहतर नहीं कर पा रही?

अंशू अवस्थी: यह भ्रामक प्रचार कांग्रेस के बारे में की गई है कि हमारा संगठन कमजोर है। मैं मानता हूं कि संगठन को बेहतर ढंग से व्य​वस्थित करने की जरूरत थी, जिसे प्रियंका गांधी ने बखूबी निभाया है। कम्यूनिकेशन की कमी थी, जिसे दूर किया गया है। हमने दो लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की एक फौज तैयार की है।

भवेश चंद्र : कांग्रेस की रैलियों में हमने भीड देखी है। पर फिर भी इसकी कमजोरी का कारण जानना चाहते हैं?

डॉ. उत्कर्ष सिन्हा : जबसे प्रियंका गांधी ने कांग्रेस महासचिव का पद संभाला है और यूपी प्रभारी बनी हैं, उसके बाद से ही वे बेहद सक्रिय हैं। हालांकि, इसके बाद से कोरोना काल में ही बहुत सारा वक्त चला गया। यूपी के करीब 150 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां कांग्रेस का संगठन बहुत अच्छा नीचे तक बन गया है। पंचायत चुनाव में भी एक करोड से ज्यादा वोट कांग्रेस के पक्ष में गिरे थे।
भीड जुट रही है। पॉलिसी अच्छी है। मुद्दे अच्छे हैं। संगठन अच्छा बन गया है। फिर भी कांग्रेस चूक कहां रही है? परसेप्शन बनाने में पार्टी इतना पीछे चली जा रही है कि ढंग से नरेशन नहीं कर पा रही तो नरेशन बनाना किसका काम है? वो भी तो पार्टी का ही काम है। यूपी में बीजेपी को अगर कोई टक्कर देगी तो वह समाजवादी पार्टी है, लोगों के अंदर यह विचार डालने के लिये अखिलेश ने मेहनत की है।

भवेश चंद्र : कांग्रेस ने कई बेहतरीन पहल की हैं। 117 नये उम्मीदवारों को भी मौका दिया गया है जो पहली बार चुनाव लडेंगे। यह भी एक रोचक प्रयोग है।

कांग्रेस का एक बडा वोट बैंक मुस्लिम वर्ग रहा है। लेकिन फिलहाल यूपी में कितने प्रतिशत मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिलने की उम्मीद है?

हिसाम सिद्दिकी : जैसा कि पहले भी कहा गया कि परसेप्शन का सवाल है। प्रियंका गांधी की एक रैली हुई मुरादाबाद में। रामपुर से बिजनौर तक उसका काफी असर दिखा। लगभग एक हफ्ते तक उसकी चर्चा भी रही। लेकिन एक हफ्ते बाद वही मुसलमान, जो कि दोबारा कांग्रेस की बात करने लगे थे, जो वहां बहुल संख्या में हैं और कभी यह कांग्रेसियों का गढ भी रहा है, ने कहना शुरू कर दिया कि वो तो ठीक है लेकिन हमारे अलावा और कौन? जैसे सपा, बसपा और बीजेपी का अपना एक वोट बैंक है, वैसा कांग्रेस का क्या है? कांग्रेस का अपना वोट बैंक कोई भी नहीं है।

प्रियंका चाहे कितनी भी मेहनत कर लें, लेकिन उत्तर प्रदेश में जाति की पोलिटिक्स को वे कुछ साल में तो नहीं हटा पायेंगी। हां, हो सकता है कि दस साल बाद उनकी मेहनत का असर दिखना शुरू हो। लल्लू के बजाय किसी ब्राह्मण चेहरे को अगर वे आगे करतीं तो शायद कुछ फायदा उन्हें मिल पाता। 2014, 2017 और 2019, तीनों ही चुनावों में बीजेपी ने बैकवर्ड वोट्स को पूरी तरह से पोलराइज कर दिया। ऐसे में कांग्रेस भी अगर बैकवर्ड में अपने वोट तलाशने जाये तो यह मुश्किल है।

माना कि कांग्रेस ने अच्छे लोगों को जोडा है लेकिन ये अच्छे लोग न तो अभी कांग्रेस को जानते हैं और न ही कांग्रेस उन्हें जानती है। इस तजुर्बे का फायदा कांग्रेस को अगले चुनावों में भले हो जाये पर इस बार होता नहीं दिखता। यहां तो राजभर जैसे लोग जो कुछ ही प्रतिशत हैं, वे भी कहते हैं कि हमारे साथ इतने लोग हैं और हम दूसरे लोगों को भी जोडेंगे।

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आज कांग्रेस की जो हालत है वो उनकी बदनीयती के कारण है। किसी जमाने में कांग्रेस के वोटर्स होते थे मुस्लिम, ब्राह्मण और दलित। दलित बीएसपी में चला गया, ब्राह्मण बीजेपी में चला गया और मुसलमान 30 साल से भटक रहा है। कभी इधर कभी उधर। इन्हें एकजुट करने की फिर कभी कोई बात ही नहीं हुई।

अब काम हो रहा है लेकिन इस बार बाइपोलर चुनाव हो गया है यूपी में। सपा और बीजेपी में। प्रियंका जिन लोगों को लेकर आयी हैं अगर उन्होंने कांग्रेस का साथ न छोडा तो आगे कांग्रेस का भविष्य यूपी में कुछ बेहतर देखने को मिल सकता है।

भवेश चंद्र : किसान आंदोलन के दौरान बीजेपी को हराने की जो बात हुई है उसके बाद लगता है कि कांग्रेस के लिये कुछ बचता है?

विश्वराज चौधरी : पश्चिम यूपी में ये सारी प्रॉब्लम और पोलराइजेशन 2013 के दंगों के बाद से ही शुरू हो गया था। उसके बाद भाजपा को उसका काफी फायदा मिला उन्होंने सबको साफ कर दिया। उसका फायदा इन्हें 2014, 2017 और 2019, हर बार हुआ। किसान आंदोलन में तो पूरे देश के किसान आये थे लेकिन जब पश्चिमी यूपी के लोग ज्यादा यहां पहुंचे तो उसे किसान नहीं बताया गया और कहा गया कि ये जाटिस्तान है। कहा गया कि वहां एक ही इलाके के ज्यादा लोग आकर बैठ गये हैं और कुछ भी नहीं। राकेश टिकैत के लिये भी काफी कुछ कहा गया। उस पर बीजेपी का जो परसेप्शन किसानों के प्रति रहा, उसे भी अच्छा नहीं कहा जा सकता। 28 जनवरी को बीजेपी आरएसएस के विधायक के साथ जो गुंडे आये। एक तरह पुलिस की फोर्स भी और दूसरी तरफ गुंडे थे। तो उसका एक प्रभाव जो जनता में गया कि जब आप सरकार से लड रहे हो तो अलग बात है लेकिन जहां विधायक और सांसद के आने के बाद जो घटना हुई, उसकी वजह से जो सामाजिक ध्रुवीकरण हुआ, उसका बीजेपी को वहां पर सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अब सवाल यह है कि इसमें कांग्रेस कहां आती है?

अब ये सामाजिक ध्रुवीकरण जो बना है, वो बीजेपी को रोकने के लिये बना है न कि कांग्रेस को रोकने के लिये। जब कैंडिडेड खडे किये जाते हैं तो देखा ये जाता है कि यहां से कौन जीत रहा है, हराना किसे है? सत्ता में कौन है और हटाना किसे है? अब वहां एक ओर बीजेपी है तो दूसरी ओर सपा और रालोद का गठबंधन।

2013 के दंगे के बाद जाट का पूरा वोट बीजेपी को जा रहा था क्योंकि सामाजिक ध्रुवीकरण में जाट को हिंदू बना दिया गया था। इससे पहले जाट मुस्लिम किसान कमेरा मिलकर रालोद को जिताते थे। कुछ प्रतिशत वोट बीएसपी और एसपी भी लेती थी लेकिन बीजेपी ने बडी ही चालाकी के साथ इस विनिंग कॉम्बीनेशन को बांट दिया। इसके बाद कई छोटी छोटी पार्टियों को मिलाकर एक विनिंग कॉम्बिनेशन बीजेपी के लिये बना दिया गया। लेकिन किसान आंदोलन के बाद धर्म का ध्रुवीकरण अब बदलकर सामाजिक और भाईचारे के ध्रुवीकरण में बदल गया है। इनका विनिंग कॉम्बिनेशन मिलकर अबकी बार बीजेपी को हराने के लिये काम करेगा।

भवेश चंद्र : कांग्रेस ने जिस तरह से अपनी लडाई को आगे बढाया है, उससे इस बार कांग्रेस यूपी में तीसरी नंबर की पार्टी बन जायेगी?

रामदत्त त्रिपाठी : कांग्रेस की तो सबसे बडी उपलब्धि यही होगी कि इस बार वो सभी 403 सीटों पर चुनाव लड ले। क्योंकि 1996 में जो बीएसपी के साथ तालमेल हुआ, करीब 300 सीटें बीएसपी को दे दिया और खुद लगभग 103 सीटें लडी थी। तो मतदान केंद्र में जब आपका बस्ता नहीं लगता है तो आपकी पार्टी का वर्कर कार्डर सब चला जाता है। इससे आपका आधार वहां से ऐसे ही खिसक जाता है। इसी तरह 2017 में इन्होंने सपा के साथ तालमेल कर लिया। तो कांग्रेस के लिये यही बडी बात होगी कि सभी विधानसभा सीटों पर लडे और कैंडिडेड कोई भी हो लेकिन उनके बहाने नीचे तक नेटवर्क पहुंच जाये। यह उनके लिये एक बडी उपलब्धि होगी।

दूसरी बात यह है कि इस समय कांग्रेस के पास खोने के लिये कुछ भी नहीं है। ये जिस तरह से लड रहे हैं या लडना चाहते हैं, हो सकता है कि इनका वोट पर्सेंटेज भी कुछ बढ जाये। क्या होगा ये एक अलग चीज है लेकिन इस पर कांग्रेस की प्रशंसा अवश्य की जानी चाहिये कि उन्होंने मैनिफेस्टो कम से कम यूथ की उम्मीदों पर फोकस किया। क्योंकि आज की सबसे बडी समस्या है या कहें कि मोदी सरकार के दौरान देश को जो सबसे बडा नुकसान हुआ है वो अर्थव्यवस्था और रोजगार के क्षेत्र में हुआ है। लेकिन बात यह है कि केवल कहने से रोजगार नहीं होगा न ही केवल सरकारी नौ​करियों पर फोकस करने से रोजगार होगा। कांग्रेस को और स्पष्ट करना होगा आर्थिक नीतियों में कि उदारीकरण के बाद जो समस्यायें पैदा हुई हैं और जिनकी वजह से वैश्वीकरण, उदारीकरण, मशीनीकरण जो हुये हैं, उन पर कांग्रेस का क्या स्टैंड है? मेरे ख्याल से स्टेट की ही बात नहीं बल्कि इन्हें अपना आल इंडिया विजन भी क्लीयर करना पडेगा कि रोजगार के लिये हम क्या करेंगे? स्वरोजगार कैसे हो लोगों का? खेती कैसे आगे बढेगी? व्यापार का डिजिटलाजेशन जो हो रहा है, सबकुछ आनलाइन हो रहा है तो इसमें छोटा व्यापारी कैसे बचेगा? जब पूरा आयेगा तो हम इस बारे में देखेंगे लेकिन ​फिलहाल जिस तरह की आइडेंटिटी पॉलिटिक्स यूपी में हो रही है, एक तरफ आरक्षण, जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय मुद्दा है, दूसरी तरफ हिंदुत्व या मंदिर मुद्दा है। वहीं, एक ओर यह सटल मैसेज जो जा रहा है कि मुसलमानों को बस दबाकर रखना है और मोदी योगी अगर इतना कर रहे हैं तो यही बहुत है। तो जहां इस तरह का राजनीतिक प्रचार और प्रोपेगेंडा चल रहा हो वैसे में मेरे खयाल से कांग्रेस ने एक सही पहल की है, भले जोखिम हो।

दिक्कत कहां है कि जब सोसायटी पोलराइज होती है तो मध्यममार्गी पीछे रह जाते हैं, जैसे कि कांग्रेस मध्यममार्गी पार्टी है, और कांग्रेस में उस तरह के चेहरे भी नहीं हैं, जो लोगों को ऐसे हालात में भी अपने साथ जोड पायें। अगर कांग्रेस को रिवाइव करना है यूपी में तो इन्हें लोकल लीडर उभारने होंगे। गांधी परिवार से ही राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हो, प्रधानमंत्री भी हो, यूपी का मुख्यमंत्री भी हो तो बाकी लोग काम क्यों करें?

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