बगावती चाहें तो एक और ‘कांग्रेस’ भी बना सकते हैं!

श्रवण गर्ग

कांग्रेस के भविष्य को लेकर इस समय सबसे ज़्यादा चिंता व्याप्त है। यह चिंता भाजपा भी कर रही है और कांग्रेस के भीतर ही नेताओं का एक समूह भी कर रहा है। दोनों ही चिंताएं ऊपरी तौर पर भिन्न दिखाई देते हुए भी अपने अंतिम उद्देश्य में एक ही हैं। सारांश में यह कि पार्टी की कमान गांधी परिवार के हाथों से कैसे मुक्त हो? आज की परिस्थिति में कांग्रेस को बचाने का आभास देते हुए उसे ख़त्म करने का सबसे अच्छा प्रजातांत्रिक तरीक़ा भी यही हो सकता है। जहां भाजपा की राष्ट्रीय मांग देश को कांग्रेस से मुक्त करने की है। कांग्रेस पार्टी के एक प्रभावशाली तबके की मांग फ़ैसलों की ज़िम्मेदारी किसी व्यक्ति (परिवार) विशेष के हाथों में होने के बजाय सामूहिक नेतृत्व के हवाले किए जाने की है। सामूहिक फ़ैसलों की मांग में मुख्य रूप से यही तय होना शामिल माना जा सकता है कि विभिन्न पदों पर नियुक्ति और राज्य सभा के रिक्त स्थानों की पूर्ति के अधिकार अंततः किसके पास होने चाहिए!

एक सौ पैंतीस साल पुरानी कांग्रेस को ‘प्रजातांत्रिक’ बनाने की लड़ाई एक ऐसे समय खड़ी की गई है कि वह न सिर्फ़ ‘प्रायोजित’ प्रतीत होती है ,उसके पीछे के इरादे भी संदेहास्पद नज़र आते हैं। कांग्रेस-मुक्त भारत की स्थापना की दिशा में इसे पार्टी के कुछ विचारवान नेताओं का सत्तारूढ़ दल को ‘गुप्तदान’ भी माना जा सकता है। राजनीति में ऐसा होता ही रहता है। बेरोज़गार बेटों को मां-बाप से शिकायतें हो ही सकती है कि वे कमाकर नहीं ला रहे हैं इसीलिए घर में ग़रीबी है।

क्या किसी प्रकार का शक नहीं होता कि बंगाल चुनाव के ठीक पहले बिहार में उम्मीदवारों की हार को मुद्दा बनाकर जिस समय वरिष्ठ नेता कांग्रेस नेतृत्व को घेर रहे हैं,भाजपा के निशाने पर भी वही एक दल है? दो विपरीत ध्रुवों वाली शक्तियों के निशाने पर एक ही समय पर एक टार्गेट कैसे हो सकता है? इसी कांग्रेस के नेतृत्व में जब दो साल पहले तीन राज्यों में चुनाव जीतकर सरकारें बन गईं थीं तब तो वैसी आवाज़ें नहीं उठीं थीं जैसी आज सुनाई दे रही हैं!

एक देश,एक संविधान और एक चुनाव की पक्षधर भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर केवल एकमात्र राजनीतिक दल के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस को एक क्षेत्रीय पार्टी की हैसियत तक सीमित और दिल्ली की तरफ़ खुलने वाली राज्यों की खिड़कियों को पूरी तरह से सील कर दिया जाए। जो प्रकट हो रहा है वह यही है कि सोनिया गांधी की अस्वस्थता को देखते हुए उनकी उपस्थिति में ही पार्टी-नेतृत्व का बँटवारा कर लेने की मांग उठाई जा रही है। राहुल गांधी ने सवाल भी किया था कि तेईस लोगों ने चिट्ठी उस वक्त ही क्यों लिखी जब सोनिया गांधी का अस्पताल में इलाज चल रहा था?

स्पष्ट है कि जिस समय कांग्रेस को ही अपनी कमजोरी से निपटने के लिए इलाज की ज़रूरत है, नेतृत्व से जवाब-तलबी की जा रही है कि वह भाजपा की टक्कर में दौड़ क्यों नहीं लगा पा रही है! सारे सवाल कांग्रेस को लेकर ही हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त छह और भी हैं पर उनकी कहीं कोई चर्चा नहीं है! वे सभी दल क्षेत्रीय पार्टियाँ बन कर रह गए हैं।

इसमें शक नहीं कि एक मरणासन्न विपक्ष को इस समय जिस तरह के नेतृत्व की कांग्रेस से दरकार है वह अनुपस्थित है। ऐसा होने के कई कारणों में एक यह भी है कि कोरोना प्रबंधन के पर्दे में न सिर्फ़ नागरिकों की गतिविधियों को सीमित कर दिया गया है, विपक्षी दलों और उनकी सरकारों की चिंताओं की सीमाएँ भी तय कर दी गईं हैं। किसान आंदोलन के रूप में जो प्रतिरोध व्यक्त हो रहा है उसे बजाय किसानों की वास्तविक समस्याओं को लेकर फूटे आक्रोश के रूप में देखने के केंद्र के ख़िलाफ पंजाब की अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा समर्थित राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह सही है तो फिर कांग्रेस के बगावती नेता इसे पार्टी के जनता के साथ जुड़ने की ओर कदम भी मान सकते हैं जिसकी कि शिकायत उन्हें वर्तमान नेतृत्व से है।

भारतीय जनता पार्टी के एकछत्र शासन के मुक़ाबले देश में एक सशक्त (या कमज़ोर भी) राष्ट्रीय विपक्ष की ज़रूरत के कठिन समय में कांग्रेस नेतृत्व को अंदर से ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें कई सवालों को जन्म देती हैं। चूंकि इस तरह की परिस्थितियाँ कांग्रेस के लिए पहला अनुभव नहीं है,लोग यह अनुमान भी लगाना चाहते हैं कि इंदिरा गांधी आज अगर होतीं तो मौजूदा संकट से कैसे निपटतीं और उनकी बहू होने के नाते सोनिया गांधी को ऐसा क्या करना चाहिए जो वे नहीं कर पा रही हैं? क्या उनके द्वारा तमाम बग़ावती नेताओं को यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे भी ममता, शरद पवार और संगमा की तरह ही विद्रोही कांग्रेसियों की एक और पृथक ‘कांग्रेस’ बना लें? बाक़ी छह राष्ट्रीय दलों में तीन तो इन्हीं लोगों की बनाई हुई ‘कांग्रेस’ ही हैं। बाकी तीन में दो साम्यवादी दल और बसपा है। इनमें किसी की भी हालत देश से छुपी हुई नहीं है।

और अंत में: कांग्रेस के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा प्रधानमंत्री की इस बात के लिए आलोचना किए जाने कि दिल्ली में किसानों के आंदोलन के वक्त वे कोरोना वैक्सीन के प्रयोग स्थलों की यात्रा पर थे अगले ही दिन पार्टी के दूसरे प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने मोदी की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया कि उनका (प्रधानमंत्री का) यह कदम भारतीय वैज्ञानिकों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है। इससे अग्रिम पंक्ति के कोरोना योद्धाओं का मनोबल बढ़ेगा। आनंद शर्मा का नाम उन तेईस लोगों में शामिल है जो कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालांकि शर्मा ने बाद में अपना फैलाया हुआ रायता समेटने की कोशिश भी की पर तब तक देर हो चुकी थी।

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