किस्सा मॉरिशस के बेताज बादशाह स्वामी कृष्णानंद सरस्वती का

त्रिलोक दीप

क्या आपने कभी स्वामी कृष्णानंद सरस्वती का नाम सुना है ?अगर नहीं सुना तो सुन लीजिये . वे मॉरिशस के’राष्ट्रपिता ‘ तुल्य हैं. यकीन नहीं होता तो यह पूरा वृतांत आपको पढ़ना होगा . तभी आप समझ पायेंगे कि उन्हें मॉरिशस का ‘राष्ट्रपिता’ क्यों कहा जाता है?

हुआ यों कि मेरे एक मित्र जयप्रकाश भारती का मेरे ऑफिस में फोन आया कि शाम को हमें पूसा रोड जाना है जहां स्वामी कृष्णानंद सरस्वती अपने कुछ शिष्यों के साथ विदेश से आये हैं.यह बात होगी 1963 की.उन दिनों मैं लोकसभा सचिवालय में काम करता था और भारती जी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान ‘ में. तय वक्त के मुताबिक हम लोग कनॉट प्लेस में मिले और वहां से गिरधारीलाल सराफ के गेस्ट हाउस पहुंचे.

लंबी ऊंची कदकाठी वाले भगवाधारी जिस सज्जन से हम मिले वही स्वामी कृष्णानंद सरस्वती थे. उनका सौम्य ,आभामय, तेजस्वी प्रफुल्लित चेहरा देखकर एकबारगी तो ऐसा लगा मानो हम किसी दिव्य शक्ति के समक्ष खड़े हैं .हमने जब अपना अपना परिचय देना चाहा तो बोले , ‘मैं आप दोनों के बारे में जानता हूं.’ हमें अचरज में पड़ा देख बोले, आप ही के किसी मित्र से पता चला है.

इससे पहले कि हम स्वामी जी से कुछ पूछते उन्होंने स्वयं ही अपने बारे में बताना शुरू किया . कहा कि ‘मैं शुद्ध भारतीय हूं, सन् 1937 में संन्यास लेने के बाद कुछ समय तक महात्मा गांधी के साथ वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभा में काम किया , उसके बाद हिमालय में भैरव घाटी की गुफा में साधना की,ऋषिकेश में अपने आप को कंचनमुक्त करते हुए गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करने का प्रण लेते हुए कुछ समय तक कुष्ठरोगियों की सेवा की . सन् 1947 में विभाजन के कारण विस्थापित होकर आये लोगों के पुनर्वास का काम किया , उसके बाद नेपाल की राजधानी काठमांडू में गरीब लोगों की आंखों के ऑपेरशन के लिये नेत्र शिविर लगाया जिस का उद्घाटन महाराजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह ने किया .

‘सेवा की शुरुआत मैंने नेत्र शिविरों से की. ये सब करने के उपरांत एशिया के कुछ देशों में भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों में जागृति की भावना पैदा की और आजकल यूरोप में गरीब और शोषित लोगों के सेवा कार्य में जुटा हूं.’ किसी संन्यासी की ऐसी बेबाक बात हमने पहली बार सुनी थी .

स्वामी जी फिर हंसकर बोले, ‘मैं यंत्र -तंत्र -मंत्र वाला संत नहीं हूं और न ही मैं किसी किस्म का गण्डा -तावीज़ देता हूं. मेरा काम है समाज में व्याप्त अमीर गरीब, ऊंच नीच, साक्षर निरक्षर, गुरबत, विषमताएं जैसी जो बीमारियां दुनिया में फैली हुई हैं उनसे लोगों को राहत दिलाने का . सामाजिक दूरियों औऱ दुश्वारियों को कैसे पाटा जाये औऱ दुनिया भर में फैली भ्रांतियों और भ्रमों का निराकरण कर विभाजनकारी तत्वों को एकसूत्र में किस तरह से बंधा जाये इनपर चिंतन मनन करने के बाद हम धरातल पर काम शुरू करते हैं. मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं तथा स्वस्थ समाज के विकास और उत्थान के लिए प्रतिबद्ध और समर्पित हूं., इस से ज़्यादा औऱ कुछ नहीं. ‘

स्वामी जी जिस तन्मयता से अपनी बात कह रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कोई सिद्धपुरुष अपनी दिनचर्या बयान कर रहा हो. उनके साथ उनकी दो विदेशी शिष्याएं भी थीं, एक अमेरिकी औऱ दूसरी शायद जर्मन. उनकी ओर संकेत करते हुए कहा कि ये लोग अपने अपने देश की गंदी और वंचित बस्तियों का निरीक्षण करती हैं और हम लोग मिलकर उनके उत्थान और उद्धार के कार्यक्रम बनाते हैं. हमारा काम शुद्ध मानव सेवा है। यही हमारा धर्म है और यही हमारा तीर्थ.’
हम लोगों ने स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से पहले संत देखे थे जो बेसाख्ता हंसते थे और अपने कार्यकलापों की जानकारी देते वक्त उनके चेहरे पर सदा मुस्कान रहती थी.

स्वामीजी ने हमें बताया था कि’ उनका मूलमंत्र है, ‘प्रभु की भक्ति करो और मानव सेवा में लीन रहो, इससे बड़ा न तो कोई धर्म है और न ही कोई पूजा -अर्चना- आराधना.’

यह भी पता चला कि स्वामीजी काफ़ी पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं. अजमेर के मेयो कॉलेज के बाद महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के निर्देशन में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की . उन का संबंध किसी जागीरदार घराने से था और बीकानेर राजपरिवार से उनकी खासी निकटता थी .राजस्थान और गुजरात बॉर्डर पर उनकी तैनाती आज के कलेक्टर के समकक्ष थी .

जब उन्होंने संन्यास लिया तो उनके बैंक खाते में एक लाख रुपये थे . उस वक़्त के एक लाख रुपये की आज क्या कीमत होगी उसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है . तब एक रुपये में एक मन गेहूं मिलता था और एक रुपये सेर ही देसी घी.

हिमालय की गुफा में अपनी साधना के बाद उन्हें अपना यह धन बोझ लगा . लिहाज़ा उन्होंने तीस हजार रुपये हरिद्वार के एक अस्पताल को और तीस हज़ार रुपये ऋषिकेश के ही कुष्ठरोगियों के एक आश्रम को दे दिये .बाकी के पैसे भी जनोपयोगी और कल्याणकारी संस्थाओं में वितरित कर अब वे पूरी तरह से कंचनमुक्त हो गये.

उन्होंने हंसते हुए बताया , ‘ इसके बाद मैंने अपने आपको बहुत हल्का महसूस किया था . अब एक ही उद्देश्य था, मुंह से राम का नाम लेना और शरीर से गरीबों, वंचितों, शोषित, ज़रूरतमंद लोगों की सेवा करना ‘उसके बाद आजतक मैंने किसी तरह की कमी महसूस नहीं की. आप देख लो मेरा थैला खाली है फिर भी मैं अपने आप को दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति समझता हूं .’

स्वामी जी के विविध सेवा कार्यक्रम थे और उनके लिए वे अक्सर शिविर लगाया करते थे जैसे नेत्र शिविर, बवासीर निर्मूलन, रोगोपचार शिविर आदि. उन शिविरों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं को वे स्वयं प्रशिक्षण दिया करते थे .

मील्स औन वील्स

स्वामीजी की बातचीत से यह भी पता चला कि यूरोपीय देशों में और ख़ास तौर से इंग्लैंड में उन्होंने बहुत काम किये थे. ब्रिटेन में जब उन्होंने भारतीय बुजुर्गों को उपेक्षित पाया तो स्वामीजी ने ऐसे लोगों के लिए लंदन के फिनचले क्ष्रेत्र में ‘मील्स ऑन व्हील्स’ योजना शुरू करायी जिसके तहत या तो बुजुर्गों को लेकर खाना खिलाया जाता था या बस में भोजन ले जाकर करवाया जाता था .

ऐसी ही किसी सेवा के एक प्रोग्राम में किसी ने तंज कसते हुए स्वामीजी से कहा था कि अगर सचमुच सेवा करनी है तो अफ्रीका में जाकर करो जहां बहुत गुरबत है और लोगों को आप जैसे संत की ज़रूरत है .

फिर पहुंच गये अफ्रीका

उलाहने के तौर पर कही गयी इस बात को स्वामीजी ने प्रभु का आदेश समझा और वे 1956 में केन्या की राजधानी नैरोबी पहुंच गये . तबसे अफ्रीका ही उनकी सेवा का प्रमुख महाद्वीप बन गया . हम लोगों से जब स्वामीजी मिले तो वे नैरोबी या उगांडा से आये थे , हमें यह भी पता चला कि वे साल में एक बार तीन चार महीने के लिए भारत आते हैं .

जब भी उनका दिल्ली आना होता था तो मैं और भारती जी साथ साथ और कभी अकेले भी उनसे मिला करते थे. भारत में उनके कार्यकलापों पर भी चर्चा होती .वे कभी भी एक स्थान पर नहीं ठहरते थे. कभी उनसे गीता भवन में मुलाकात हुई तो कभी तुली साहब के यहां . भारत में तब उनका कार्यक्षेत्र गुजरात के अहमदाबाद और वड़ोदरा थे जहां विश्व ज्योति आश्रम और भारतीय सेवा समाज स्वामीजी और उनके एक शिष्य दादू भाई पटेल की देखरेख में विभिन्न प्रकार के शिविर लगाया करते थे.

स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने नैरोबी पहुंच कर दीनबंधु समाज की स्थापना करते हुए लोगों से कहा कि भारतीय संस्कृति की शुरुआत प्रार्थना से होती है.प्रार्थना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि उन्हें गांधी जी की सायंकाल वाली प्रार्थना सही लगती है जिसे हमें एक आंदोलन के रूप में अपनाना चाहिये .उनका तर्क था कि प्रार्थना से सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है जो अंततः हमें सेवा की ओर ले जाती है.

स्वामी जी का कार्यक्षेत्र सिर्फ नैरोबी नहीं था .उन्होंने उन तमाम देशों की यात्रा का प्रोग्राम बनाया जिन्हें छठे और सातवें दशक में स्वतंत्रता मिलने वाली थी. पहले वे कांगो गये . बेल्जियम से उसे आज़ादी मिलने ही वाली थी .वहां के चुनाव में लुमुम्बा की सरकार बनते ही विद्रोह हो गया . उनकी हत्या कर दी गयी और उनके स्थान पर मोइश शोम्बे को राष्ट्रपति बनाया गया उन्होंने बहुत से विदेशियों को बंधक बना लिया जिस में भारतीय और अमेरिकी नागरिक भी शामिल थे .

आइज़नहावर ने अमरीका बुलाया

बंधकों का समाचार मिलते ही स्वामीजी ने संबंधित लोगों से संपर्क साधा .उनके भगवा वस्त्रों का सम्मान करते हुए न केवल भारतीय बल्कि अमेरिकी और यूरोपीय बंधकों को भी रिहा कर दिया गया. सारी दुनिया को स्वामीजी के इन प्रयासों का पता चल गया .अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने स्वामीजी को अमेरिका आने का न्योता दिया .अमेरिका पहुंच कर स्वामीजी ने राष्ट्रपति आइजनहावर को अपने मिशन के बारे में विस्तृत जानकारी दी जिससे खुश होकर उन्होंने भी उनसे अमेरिका में मानवीय एवं लोकोपकारी मिशन स्थापित करने का अनुरोध किया .

स्वामीजी ने न सिर्फ गरीब अमेरिकियों को बल्कि प्रवासी भारतीयों के बीच रहकर उन्हें अपने धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मिशन के बारे में बताया. दिल्ली में स्वामीजी के साथ अमेरिका की जो शिष्या कृष्णा मोरगन हमारे घर आयी थीं उन्हें ही स्वामीजी ने अमेरिकी यूनिट का हेड बनाया था .

अमेरिका से लौटकर स्वामी जी फिर से अफ्रीकी देशों के काम में जुट गये .घाना के राष्ट्रपति क्वामे नक्रूमा को भी भारतीय संस्क़ृति और संस्कारों से अवगत कराते हुए अपने सामाजिक सरोकारों की जानकारी दी. राजधानी अंकारा में पंजाबियों की संख्या खासी है . जिन्होंने अपने परिश्रम से घाना की बेहिसाब ज़मीन को उर्वरक और उपजाऊ बनाया था .

इतवार को एक गुरुद्वारे में पंजाबियों के साथ सभी प्रवासी भारतीयों को एकत्र कर धार्मिक ग्रंथों को आधार बना कर स्वामीजी ने प्रवचन दिये .उन्होंने गीता, बाइबल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब को उदधृत किया जिससे लोगों में यह संदेश गया कि यह स्वामी किसी एक धर्म या सम्प्रदाय का संत नहीं है बल्कि’विश्व संत’ या ‘ विश्व गुरु ‘ है .

उन्होंने एक अन्य सभा में कहा था कि ‘ सिख गुरु बहुत ही व्यवहारिक थे, उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास को दूर की कोशिश की, मेहनत को महत्व दिया, ईमानदारी से काम करने को मूल मंत्र बताया, यही वजह है कि दुनिया में आज सिख कामयाब हैं .’

स्वामीजी लोगों को योग की दीक्षा देते हुए कहते थे कि मनुष्य को श्वांस और जुबान पर हमेशा नियंत्रण रखना चाहिए, ध्यान, साधना और समाधि पर बल देते हुए कहते थे कि मानव का मानव से प्रेम और भाईचारा ही उनका मंत्र है .उन्होंने केवल घाना में रहने वाले सिखों को ही नहीं इथोपिया, उगांडा, ज़ाम्बिया, नाइजीरिया आदि देशों में भी पंजाबियों और सिखों की उल्लेखनीय और सराहनीय भूमिका भी भी चर्चा की .

स्वामीजी आनुष्ठानिक पूजा पाठ अर्चना और ग्रंथों के विरुद्ध नहीं थे, वे इस बात पर ज़ोर दिया करते थे कि जो आप पूजा पाठ आराधना करते हैं उनपर अमल भी करें, दिखावे से दूर रहें और अपने बच्चों को सामूहिक भक्ति गान में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करें . ईश्वर का उन्हें सदा शुकराना करना चाहिये .

अफ्रीका में उन्हें दूसरा गांधी कहा गया

अफ्रीकी देशों की व्यापक औऱ विस्तृत यात्रा करते हुए स्वामी कृष्णानंद सरस्वती के कई तरह के नामकरण हो गये .जैसे उन्हें नेपाल में ‘आंखें देने वाला संत’ कहा जाता था अफ्रीकी देशों में उनके तमाम तरह के नाम पड़ गये जैसे ‘काला स्वामी’, ‘अफ्रीका का स्वामी’, ‘अफ्रीका का दूसरा गांधी’आदि .

स्वामीजी अफ्रीका दर्शन की अपनी यात्रा में ज़ाम्बिया की राजधानी लुसाका, नाइजीरिया की तत्कालीन राजधानी लागोस, उगांडा की राजधानी कंपाला के अलावा औऱ भी कई देशों में गये . इन देशों में भारतीय राजदूतों और सांस्कृतिक सचिवों से मुलाकातों के साथ साथ ऐसे प्रवासी भारतीयों से भी उनकी भेंट हुआ करती थी जिन्होंने उन देशों में अपनी अच्छी खासी साख और पैठ बना रखी थी .

भारतीय राजदूत इंदु प्रकाश सिंह उनके कार्यों के न केवल प्रशंसक थे बल्कि वे उनके मुरीद भी बन गये थे .ज़ाम्बिया के अपने भ्रमण में स्वामी जी एक सरकारी अस्पताल देखने के लिये गये .

जिज्ञासु होने के कारण स्वामी जी ने वहां का शल्य चिकित्सा कक्ष देखने का इसरार किया . वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि शल्यक्रिया में लीन डॉक्टर भारतवंशी है . स्वामीजी को अस्पताल में देख डॉक्टर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें अपने घर पधारने का निवेदन किया .

डॉक्टर के घर पहुंच कर स्वामीजी ने उसकी मेज़ पर गीता खुली हुई रखी देख इसका सबब पूछा तो डॉक्टर साहब ने बताया कि उन्होंने जहां तक पढ़ा था वह पेज खुला रह गया . डॉक्टर साहब ने स्वामी जी को बताया कि यही गीता तो हमारा जीवन आधार है .

इन साहब का नाम था डॉक्टर कृष्णानंद चितानिया। उनकी पत्नी भी डॉक्टर थी। डॉक्टर चितानिया ने स्वामीजी को बताया कि अब हमें धन की ज़रूरत नहीं, हम लोग तो यहां दीन दुखियों की सेवासुश्रुषा में लगे रहते हैं.

बाद में ये डॉक्टर दम्पति गुजरात आकर स्वामी जी के शिविरों में सेवा देने लगे . उगांडा में भी भारतीयों की संख्या अच्छी खासी है और वे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं . डॉ गुरुदयाल सिंह तब स्वामीजी के सान्निध्य में आये जिनकी प्रवासी भारतीयों के साथ साथ उगांडा सरकार में भी अच्छी पैठ थी. उनके माध्यम से स्वामी जी प्रवासी भारतीयों से मिलते और उनके बीच धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मसलों और मुद्दों पर चर्चा होती।

यही वे डॉ गुरुदयाल सिंह हैं जो भारत में पहले अफ्रीकी सिख राजदूत बने. स्वामीजी कहा करते थे कि हमारा जन्म प्रेम करने के लिए हुआ है, घृणा करने के लिए नहीं .उनका कहना था कि अगर हम पूरे समर्पित भाव से मानव सेवा करेंगे तो इससे न केवल मानसिक सुकून ही मिलेगा बल्कि यह मार्ग हमें परम पिता परमेश्वर की ओर ले जायेगा . इसीलिये मैं कहता हूं कि ‘ मानव सेवा ही प्रभु सेवा है .इससे बढ़ कर न कोई सेवा है और न ही कोई पुण्य .’ इन देशों के अतिरिक्त स्वामी जी ने बहुत से अफ्रीकी देश देखे .ये तो कुछ नमूने के तौर पर पेश किये गये हैं?

और पहुंच गये मॉरिशस

कई अफ्रीकी देशों की यात्रा के बाद स्वामी जी नैरोबी लौट आये थे . एक मंदिर में स्वामीजी भागवत गीता पर प्रवचन दे रहे थे तो उन्हें सूचित किया गया कि मॉरिशस से कबीरपंथी आये हए हैं और वे आपसे मिलना चाहते है.उन कबीरपंथियों ने स्वामीजी को बताया कि इस समय मॉरीशस में जिस तरह के हालात हैं वह दिन दूर नहीं जब वहां के प्रवासी भारतीय अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को बिसार दें .उनपर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ता जा रहा है. समय रहते वहां कोई संत या आध्यात्मिक गुरु पहुंच जाये तो उनका उद्धार हो सकता है .

उन्होंने इस विकट समस्या के समाधान के लिये चिंतन और मनन शुरू ही किया था कि एक दिन मॉरीशस में लेबर पार्टी के नेता सर शिव सागर रामगुलाम स्वामीजी से मिलने के लिए आये . रामगुलाम ने स्वामी जी से करबद्ध होकर कहा कि ‘ इस समय आपके नैतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व की आवश्यकता है. आप कृपया मॉरीशस आकर भटकते हुए नौजवानों को बचा लीजिए. ‘ रामगुलाम ने आगे कहा कि मॉरिशस में अप्रवासी भारतीयों की संख्या 70 प्रतिशत के करीब है, जिन्हें भारतीय संस्कारों और संस्कृति से शिक्षित औऱ प्रशिक्षित करने की बहुत जरूरत है .

स्वामीजीने उन्हें भरोसा दिलाया कि मॉरिशस की स्वाधीनता से पहले वह वहां पहुंच जायेंगे,आप लोग अपने स्वतंत्रता संग्राम को जारी रखें .1967 में स्वामीजी मॉरिशस पहुंचे. उनकी अगुवानी के लिये हजारों लोग एयरपोर्ट पर मौजूद थे. स्वामी जी के साथ खुली कार में खड़े रामगुलाम जैसे अपने लोगों से कह रहे हों ‘अब चिंता की कोई बात नहीं हम भारतवंशियों का रखवाला आ गया है. ‘

स्वामी जी से हम लोग अक्सर मॉरिशस के प्रवासी भारतीयों की परेशानी के बारे में जब पूछते तो वे कहते थे कि युवा अपनी संस्कृति, आचार व्यवहार, परंपराओं से लगातार विमुख होते जा रहे हैं और उन लोगों को न तो अपने धार्मिक ग्रंथों औऱ देवी देवताओं के बारे में जानकारी है और न उन तीज त्योहारों की पृष्ठभूमि का उन्हें ज्ञान है जिसे वे रोबोट की तरह मनाते चले आ रहे हैं .अपनी भाषा उसकी लिपि और भारतीय दर्शनशास्त्र से वे अनभिज्ञ हैं.उनके आसपास ‘क्रीओळ ‘का मायाजाल खासा घना है .आज हालत यह हो गयी है कि युवा भारतवंशियों के बीच हिंदी और भोजपुरी की जगह ‘क्रीओळ’ ज़्यादा लोकप्रिय होती जा रही है .

स्वामीजी को बताया गया कि ‘क्रीओळ’ अफ्रीकी दासों तथा फ्रांसीसी ज़मींदारों के बीच बातचीत और घनिष्ठ संबंधों के आदान प्रदान की भाषा है. कुछ लोग इसे भ्रष्ट अथवा अपभ्रंश फ्रांसीसी भाषा भी कहते हैं .

यह भी माना जाता है कि क्रीओळ काफी लचीली भाषा है और इसमें दूसरी कई भाषाओं के अंश समाहित होकर इसमें रस बस गये हैं. इस में व्याकरण आदि का कोई झंझट नहीं .यह एक सीमित भाषा मानी जाती है जिसमें फ्रांसीसी के अलावा अंग्रेज़ी, हिंदी, भोजपुरी, तमिल मराठी, चीनी भाषाओं के शब्द भी जुड़ते चले गये हैं. सभी बोलियों का इसमें समावेश होने से यह मॉरीशस की आम भाषा बनती जा रही है. लेकिन गांवों में भोजपुरी अधिक बोली जाती है .कहा जा सकता हैं कि मॉरिशस के लोग बहुभाषाविद हैं और उन पर कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रभाव है .

अपने कुछ दिनों के प्रवास में स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने कुछ पढ़े लिखे लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में जानना चाहा .साथ ही यह भी पूछा कि उनसे किस तरह के योगदान की अपेक्षा की जाती है . इसके जवाब में डॉ. शिव सागर रामगुलाम ने निवेदन किया कि 1968 में स्वाधीन होने से पहले मॉरिशस में भारतीयता का परचम लहराये और जितने भी कार्यक्रम यहां आयोजित हों उनमें समृद्ध और संपन्न भारतीयता के दर्शन हों और उनमें भारत की सुगंध आये.

कुछ दिनों के बाद स्वामीजी ने दो ढाई दर्जन लोगों से मीटिंग करने का निर्णय लेते हुए रामगुलाम से कहा कि उस मीटिंग में वैसे ही सोच वाले नेता, विद्वान, अध्यापक और छात्र नेता शामिल हों .इस मीटिंग से पहले स्वामीजी राजधानी पोर्ट लुई और उसके आसपास के क्षेत्रों को देखना चाहते थे .ज़मीनी हक़ीक़त के साथ साथ स्वामी जी मॉरिशस का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक तानाबाना समझना चाहते थे .

हिन्दी को लोकप्रिय बनाया

वे यह भी जानना चाह रहे थे कि कितने लोगों को देवनागरी हिंदी लिपि का ज्ञान है और कितने लोग रोमन में हिंदी पढ़ लिख सकते हैं .मॉरीशस को देखने और समझने में स्वामीजी ने दो दिन लगाये .

रास्ते में कहीं स्वामीजी किसी भारतीय दुकान में चले जाते तो उनसे हिंदी में बातचीत करते . अपने पास स्वामीजी को देखकर वे इसलिए भौचक्के हो जाया करते थे कि वे उन्हें टीवी पर देख चुके थे और अब रूबरू देख रहे हैं .स्वामीजी जिनसे हिंदी में बात करते उन्हें उत्तर भी हिंदी में मिलता .इससे उत्साहित होकर स्वामीजी उनके परिवार के बारे में पूछते, उनके पूजा पाठ और त्योहारों की जानकारी लेते .

ये भी पूछते कि क्या कभी उपवास व्रत रखते हैं, अपने दीनहीन भाइयों की मदद करते हैं . स्वामीजी महिलाओं से भी इससे मिलेजुले सवाल पूछते, उनकी शिक्षा और सुरक्षा बाबत जानकारी लेते, तीज त्योहारों, व्रत उपवासों, नवरात्र आदि पर भी उनसे चर्चा करते. कुछ लोगों से स्वामीजी को सकारात्मक उत्तर मिलता लेकिन अधिसंख्य लोग उनके प्रश्नों का सटीक उत्तर देने में सफल नहीं होते थे .

स्वामीजी ने ग्रामीण जनजीवन देखने की जब इच्छा जतायी तब रामगुलाम और उनके साथी उन्हें उस ओर ले चले .स्वामीजी को यह देखकर हैरत हुई कि मॉरिशस के गांव सभी तरह की आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण हैं . वहां के लोग खेतीबाड़ी करते हैं या खेतों में मजदूरी तो कुछ व्यापारी और नौकरीपेशा लोग बसों या कारों से अपने काम पर शहर भी जाते हैं .

गांव में बहुमत भारतीय मूल के लोगों का है .उन लोगों की सबसे महत्वपूर्ण संस्था ‘बैठका’ यानी बैठक है जहां वे गांव के मसलों पर बातचीत करते हैं. ऐसी ही एक ‘बैठका ‘ में स्वामीजी जा पहुंचे .

स्वामीजी ने उन लोगों से भारतीय संस्कृति, परंपराओं, तीज त्योहारों आदि के बारे में पूछा . यह भी जानना चाहा कि कीर्तन या प्रवचन कौन करता है, क्या यहां कोई विधिवत पुजारी या पंडित है? क्या उसके पास कोई धार्मिक ग्रंथ है ? क्या वे देवनागरी लिपि में हिंदी पढ़ लेते हैं या रोमन लिपि से काम चलाते हैं ?यहां की पंचायत का क्या काम है, सिर्फ साफ सफाई, बिजली पानी की देखभाल करना अथवा धार्मिक या आध्यात्मिक विषयों पर भी कोई आयोजन करना ?

भारतीय मूल की महिलाओं की क्या भूमिका है, घरेलू काम या पुरुषों के साथ कामों में हाथ बंटाना ? गैरभारतीय लोगों के साथ भारतवंशियों के कैसे संबंध हैं ? क्या सभी समुदाय और सम्प्रदाय मिलकर तीज त्योहार औऱ उत्सव मनाते हैं ? क्या वक़्त ज़रूरत पर वे एक दूसरे के काम आते हैं कि नहीं ? आपसी भाईचारा कैसा है ?

स्वामीजी के तमाम प्रश्न लोगों ने गौर से सुना . उनके लिये यह नया अनुभव था . उन ग्रामीणों में से कुछ ने बताया कि देवनागरी लिपि में हिंदी जानने वाले लोग हैं तो सही लेकिन उनकी तादाद बहुत कम है .

हरेक गांव में एक समाज कल्याण केंद्र है जो गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन करता है . जहां तक महिलाओं का संबंध है वे घर के कामकाज के साथ दस्तकारी भी सीखती हैं .

गांव के बाजार ज़्यादा बड़े नहीं होते लेकिन रोजमर्रा की सभी चीज़ें मिल जाती हैं, अधिसंख्य दुकानदार चीनी हैं .स्वामीजी ने आलीशान मकानों के अलावा झोपड़ियां भी देखीं जहां गन्ना खेतों और चीनी मिलों में काम करने वाले मजदूर रहते हैं .इनमें से कुछ की हालत स्वामीजी ने बदतर और खस्ताहाल पायी .

दो दिन की इस टोही यात्रा और मॉरिशस की खूबसूरती का अवलोकन करने के बाद स्वामीजी ने रामगुलाम के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित किया .पूरे देश का भ्रमण करने के बाद स्वामीजी ने कुछ सुझाव रखे .स्वामीजी चाहते थे कि 1968 में स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले देश में कुछ ऐसा माहौल बने कि विदेशी शासक अपने पीछे किसी तरह का संशय, कटुता, मतभेद और विभाजनकारी तत्वों को छोड़कर न जा सकें .

ऐसा तो लगता नहीं कि भारत जैसी बंटवारे की स्थिति पैदा हो बावजूद इसके भारतवंशियों और विशेषकर युवाओं को विभाजनकारी तत्वों से सचेत, सतर्क और सावधान रहने की सीख देनी होगी .दूसरे हमें ऐसे स्कूलों की स्थापना करनी होगी जहां देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रारंभिक और वृहद शिक्षा की व्यवस्था हो . ज़रूरत पड़ने पर भारत का सहयोग लिया जा सकता है.

.ऐसा होने पर हम अपने बच्चों को अपने संस्कार, संस्कृति और सामाजिक संस्कारों से छुटपन से अवगत करा सकेंगे .बेशक़ दुनिया में अनूदित धार्मिक ग्रंथों की कमी नहीं है लेकिन मूल तो मूल ही होता है .मेरे पास देवनागरी और रोमन लिपि दोनों में हनुमान चालीसा, रामायण और गीता के छोटे गुटके हैं लेकिन मैं चाहता हूं कि सभी लोग मूल ग्रंथों का अध्ययन करें . रामगुलाम को स्वामीजी ने चौकस किया कि उनके और उनके समर्थकों की तरफ से ऐसी कोई हरक़त नहीं होनी चाहिये जिससे विदेशी हुक्मरानों को आज़ादी प्रदान में विलंब करने का कोई बहाना मिले .

उन्होंने किसी इतवार को भारतीय मूल के लोगों को एकत्र करने की सलाह दी ताकि सभी से रूबरू बातचीत हो सके . एक इतवार को स्वामी कृष्णानंद सरस्वती को सुनने और देखने को पूरा मॉरिशस उमड़ गया सा लगता था .उस जनसमूह में केवल भारतवंशी ही नहीं, दूसरे समुदायों औऱ संप्रदायों के लोग भी शामिल थे .

स्वामीजी ने भारत में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मॉरिशस में गन्ना खेतों में काम करने के लिये अंग्रेजों की नीतियों का ज़िक्र किया .उन्होंने कहा कि मॉरिशस के लिये भी यह मुश्किल समय है .वे जाते जाते कोई खुराफात कर सकते हैं, दंगे भड़का सकते हैं, कुछ लोग जो इस वक़्त आज़ादी के हक़ में नहीं उनके सामने टुकड़े फेंक सकते हैं लेकिन आप लोग यकीन जानो कि जब आप का देश पूरी तरह से स्वतंत्र हो जायेगा तो अलग तरह की ही सुगंध आप महसूस करेंगे, आज़ादी की सुगंध, लोकतंत्र की आन, बान और शान .

आपको लगेगा कि गुलामी की बेड़ियां और जंजीरें टूट गयीं . आप सचमुच इंसान हैं, आपके भी कुछ अरमान हैं, विचार हैं, सोच है . अगर प्रशासनिक दिक्कतें पेश आयीं भी तो अब फैसले अपने हितों को ध्यान में रखते हुए करोगे . मॉरिशस के पास काबिल लोगों की कमी नहीं है स्वामीजी के उत्साहजनक भाषण से रामगुलाम फूले नहीं समा रहे थे .स्वामीजी के मॉरीशस आ जाने से उनका आत्मविश्वास बढ़ गया था . अब वे अपनी जीत यकीनी मानकर चल रहे थे .

उस ओजस्वी भाषण के बाद स्वामीजी से मिलने वालों का तांता लग गया लोगों को सम्भालने के लिए कुछ युवा स्वतःस्फूर्त मैदान में आ गये . कोई स्वामी जी का सचिव बन बैठा तो कोई कतार लगवाकर स्वामीजी से मिलवाने वाला .मॉरीशस के लोगों को अब पता चल चुका था कि वह किस किस्म के संत हैं .स्वामीजी ने अब युवाओं की सेवाएं लेने के लिये धार्मिक सेवा शिविरों का आयोजन किया .

इस काम के लिए उन्होंने रामकृष्ण आश्रम का सहयोग भी लिया . सभी युवाओं को एक साथ रहने को कहा गया . जिस हाल में इन युवाओं को सुलाया जाता, स्वामीजी भी वहीं सोते .लिहाज़ा युवाओं का स्वामीजी के प्रति आदर सम्मान की भावना और बढ़ने लगी .

अब 40 स्वयंसेवक स्वामीजी के साथ सदा रहने लगे .स्वामीजी उन्हें अपनी संस्कृति और संस्कारों की गहन जानकारी दिया करते थे .उन शिविरार्थियों को गहन दीक्षा देने के बाद स्वामीजी ने उनसे कहा कि ‘अब आप लोग अपने अपने गांव और घर चले जाओ और जो कुछ भी यहां सीखा है अपने गांव और घर वालों के साथ शेयर करो. इस प्रकार भारतीय संस्कृति और उसकी महता के बारे में नयी सोच का अभ्युदय होगा .’

गुरु नानक से प्रेरित

कुछ लोग स्वामी जी को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे . इस पर उन्होंने सिखों के पहले गुरु नानक का उदाहरण देते हए कहा कि एक बार उनसे सज्जन और दुर्जन दोनों मिलने के लिए आये .

गुरु जी ने दोनों को सुनने के बाद सज्जन लोगों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जाओ तुम बिखर जाओ और दुर्जनों से कहा कि जाओ तुम एकजुट होकर रहो . इसका मतलब तुम समझते हो .सज्जन जहां जहां जायेंगे उनके गुण भी उनके साथ जायेंगे औऱ इससे समाज की तरक्की होगी .और दुर्जन अगर एक जगह रहेंगे तो तरक्की में बाधक नहीं बन पायेंगे . इस समय मॉरीशस में जागरूकता की बहुत जरूरत है . स्वामीजी के उन चालीस स्वयंसेवकों ने क्रांति कर दी और मॉरिशस का चेहरा मोहरा ही बदल गया .

सर शिव सागर रामगुलाम की ब्रितानी प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन से मॉरिशस की स्वाधीनता पर जब चर्चा हुई तो उन्हें कहा गया कि अगर जनमत इसके हक़ में है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं .

स्वदेश लौटने के बाद रामगुलाम चुनावी तैयारी में जुट गये .मॉरीशस के करीब चार सौ गांव लेबर पार्टी के पक्ष में थे . रामगुलाम ने उन गांवों के साथ पूरे देश का सघन दौरा किया . मतदान के दिन स्वामीजी सुबह ही देशदर्शन के लिए निकल गये .उन्होंने देखा कि धार्मिक सेवा शिविर के युवक देश की स्वतंत्रता के लिये पूर्णरूपेण समर्पित हैं और लोगों को उनके घरों से निकालकर मतदान केंद्रों पर ला रहे हैं .

स्वामीजी का जादू चल गया था .स्वामीजी के अनुमानानुसार लेबर पार्टी विजयी घोषित हुई . अपनी जीत की खबर सुनने के बाद रामगुलाम ने स्वामीजी के पांव छूकर प्रणाम किया . रामगुलाम की एक सिफत रही कि जब कभी भी स्वामीजी उनसे मिलने आते तो वे उन्हें बाहर कार तक छोड़ने के लिए आते, उनकी कार का दरवाजा खोलते और प्रणाम करने के बाद ही अपनी गाड़ी में सवार होते .प्रधानमंत्री के बाद जब वे देश के गवर्नर जनरल भी बन गये फिर भी स्वामीजी के प्रति उनका भक्तिभाव बरकरार रहा .

मॉरीशस की हालत अब ऐसी हो गयी थी कि स्वामीजी की सलाह बिना वहां पत्ता भी नहीं हिल सकता था . उन्हीं के परामर्श पर 12 मार्च को मॉरीशस के स्वतंत्रता दिवस के तौर पर चुना गया .

ऐसा क्यों? जवाब था क्योंकि 12 मार्च के दिन ही महात्मा गांधी ने अपने सत्याग्रह आश्रम से कुछ सत्याग्रहियों के साथ नमक कानून तोड़ने के लिये दांडी मार्च किया था .घुड़दौड़ मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह हुआ .

स्वमीजी रामगुलाम के साथ उनकी कार में सवार होकर गये .लोग ‘चचा, चचा ‘के नारे लगाने लगे और उनकी गाड़ी को आगे बढ़ने से जब रोका तो वहां फिर स्वामीजी को ही उनकी सहायता के लिये आगे आना पड़ा .स्वामीजी गवर्नर के बंगले की छत पर चढ़ गये और माइक हाथ में पकड़ कर लोगों को संबोधित करते हुए तीन बार कहा, ‘जो जहां खड़ा है वहीं रहे , शपथ ग्रहण समारोह के बाद ‘ चचा’ सबसे व्यक्तिगत तौर पर मिलेंगे .’

भारत से डॉ. शंकर दयाल शर्मा, कृष्णा मेनन, ब्रिटिश गयाना से छेदी जगन तथा विभिन्न देशों के राजदूत शपथ समारोह में शामिल थे . स्वामीजी की अपील का माकूल असर पड़ा, जो जहां खड़ा था वहीं बुत बनकर खड़ा हो गया .स्वामीजी के प्रति मॉरीशस की जनता की यह आस्था देख रामगुलाम भावविभोर हो गये और उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े.

अतिथियों के सम्मान में स्वामीजी ने अंग्रेज़ी में संक्षिप्त भाषण दिया ताकि कृष्णा मेनन सहित उपस्थित राजदूत समारोह की गरिमा समझ सकें .वहां के लोगों ने भी पहली बार स्वामीजी को अंग्रेज़ी में बोलते हुए सुना था .

स्वामीजी का बोलबाला देख लोगों को यह समझने में शायद ही देर लगी हो कि जनता की नब्ज किस के हाथ में है .बेशक़ स्वामीजी मॉरीशस के बेताज बादशाह थे.

मॉरीशस की स्वतंत्रता की कहानी स्वामी कृष्णानंद सरस्वती ने हमें कभी चटखारे लेते हुए तो कभी विनोदी अंदाज़ में सुनायी . बीच बीच में वे गंभीर हो जाया करते थे . बात को कहने की शैली, अंदाज़ और बुनावट सहज औऱ सरल होने के साथ साथ अर्थपूर्ण भी होती थी . क्योंकि वह वाचक थे, प्रवचन करने में उन्हें महारत हासिल थी, विद्वान थे, भाषाविद थे, सभी प्रमुख धार्मिक ग्रंथों के अध्येता थे . लिहाज़ा उनके शब्दों की गहराई का आकलन कर पाना हम जैसे करीबियों के लिये भी आसान नहीं होता था .उनकी मंद मंद मुस्कान आपको कभी असहज नहीं होने देती थी .

मॉरीशस की स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कुछ अन्य अफ्रीकी देशों में अपने लंबित कार्य पूरा करने का निश्चय किया .लेकिन प्रधानमंत्री रामगुलाम को स्वामीजी की अनुपस्थिति खल रही थी .आज़ादी के बाद ब्रिटेन ने मॉरीशस से अपने हाथ खींच लिये थे, और दूसरे बड़े देशों की निगाह मॉरीशस पर थी .

भीतर से क्रीओळ तो खुंदक खाये बैठे ही थे. उन्हें लग रहा था स्वामीजी ने मॉरीशस आकर उनका खेल बिगाड़ दिया.फ्रांस की भी नवस्वाधीन देश में दिलचस्पी थी, जबकि रूस उसे अपने लाल रंग में रंगना चाहता था.मॉरीशस की बड़ी विकट स्थिति थी, उसके पास सामरिक शक्ति थी नहीं,धन का अभाव था और लोगों की हैसियत भी गरीबी जैसी ही थी.

स्वामीजी ने हालात समझ कर मॉरीशस का रुख भारत की ओर इसलिए घुमाया कि ऐसा होने पर ही वहां के भारतवंशियों की संस्कृति और धर्म को जीवित रखा जा सकता है.

पहले स्वयं दिल्ली जाकर सत्ताधारियों से मिले, भारत मॉरिशस मैत्री संघ की स्थापना की, अपने पुराने शिष्य और सहयोगी डॉ इंदुप्रकाश सिंह की सहायता से विदेशमंत्री राजा दिनेश सिंह से भी मिले .सभी नेताओं और मंत्रियों का उन्हें मौखिक समर्थन प्राप्त हुआ.

इंदुप्रकाश सिंह ने स्वामीजी को मशविरा देते हुए कहा कि बेहतर होगा कि उनकी बजाय मॉरिशस का कोई मंत्री या खुद प्रधानमंत्री डॉ शिव सागर रामगुलाम भारतीय नेतृत्व से संपर्क साधें.

ऐसी बातें और फैसले एक सरकार और दूसरी सरकार की आपसी बातचीत के बाद लिये जाते हैं . फलस्वरूप मॉरीशस की सरकार ने अपनी एक योजना भारत सरकार के विचारार्थ भेजी जिसके परिणाम स्वरूप भारत सरकार ने प्रधानमंत्री डॉ रामगुलाम को भारत आने का निमंत्रण भेजा.

भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने डॉ रामगुलाम का गर्मजोशी से स्वागत किया और पोर्ट लुई में महात्मा गांधी सांस्कृतिक संस्थान स्थापित करने की योजना पर सहमति बनी.

योजना पूरी होने के बाद उसका उद्घाटन करने के लिये खुद इंदिरा गांधी पोर्ट लुई पधारीं .उनका स्वागत करने के लिये भारतवंशी उमड़ पड़े .

एयरपोर्ट पर हजारों की तादाद में नवयुवक और नवयुवतियां मौजूद थीं. स्वामीजी के सेवा शिविर के कार्यकर्ताओं ने इस तरह का जाल बिछा रखा था कि जहां जहां भी इंदिरा गांधी जातीं उनके स्वागत के लिये युवा शक्ति हाज़िर रहती .

पूरा देश इंदिरा गांधी के प्रवास के दौरान छुट्टी मनाता हुआ दीख रहा था . इंदिरा गांधी का अपना प्रभाव और व्यक्तित्व भी प्रभावी और दिलकश था .लोगों को चमत्कृत करने के लिये वे अपने भाषणों में धड़ल्ले से फ्रांसीसी, अंग्रेज़ी और भोजपुरी शब्दों का प्रयोग कर रही थीं .

क्रीओळ यह सोच कर परेशान थे कि भारतीय प्रधानमंत्री उनसे अच्छी फ्रेंच कैसे बोल रही हैं., अपने इस तरह के स्वागत का राज़ जानने के लिये इंदिरा गांधी ने जब डॉ रामगुलाम से पूछा तो उन्होंने स्वामी कृष्णानंद सरस्वती की तरफ इशारा करते हुए कहा ‘दरअसल, मॉरिशस के निर्माता और रक्षक तो यही स्वामीजी हैं. इनके बिना न तो हम रहना सोच सकते हैं और न ही जीना. ‘ स्वामीजी ने विनम्रता से हाथ जोड़ दिये.

इसपर इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘आप जैसे समर्पित स्वामी की तो भारत को दरकार है, हमें भी अपनी सेवाएं दीजिये. ‘ इस प्रस्ताव पर स्वामी जी ने बड़ी ही विनयशीलता से कहा कि ‘ मैं एक साधारण सा संन्यासी हूं और मुझे इस छोटे देश में बहुत काम करना है और यहां के लोगों को मेरी बहुत आवश्यकता है भारत एक विशाल देश है जहां मेरे जैसे लाखों संन्यासी हैं! ‘ स्वामी जी का उत्तर सुनकर इंदिरा गांधी मुस्करा दी थीं.

स्वामीजी के ही परिश्रम से मॉरिशस में अफ्रीकी देशों के राज्याध्यक्षों का सम्मेलन हुआ जिन्हें इस नवस्वाधीन देश की महती शक्ति का आभास हुआ. इसके बाद अफ्रीकी देशों में रहने वाले भारतवंशियों का एक सम्मेलन भी आयोजित किया गया वैसे ही जैसे भारत में प्रवासी भारतीयों का सम्मेलन हर वर्ष होता है.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं तो नहीं आ सकीं लेकिन उन्होंने सम्मेलन की सफलता की कामना करते हुए एक बेहतरीन संदेश भेजा .भारत से भी वेदांत सम्मेलन के अध्यक्ष हरिकिशनदास अग्रवाल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल आया . रोडेसिया (अब ज़िम्बाब्वे) और दक्षिण अफ्रीका के शासकों ने ज़रूर अड़ंगा लगाया लेकिन स्वामीजी के प्रयासों से सब कुछ सुलट गया .इन आयोजनों के बाद मॉरिशस में सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के निरंतर सम्मेलन होने लगे .

अब तो स्वामी जी घर घर का नाम बन गये थे .लोगों को लगने लगा था कि स्वामीजी के बिना इस देश की गति नहीं . स्वामीजी ने युवानशक्ति को संगठित किया, पुरुषों के अलावा महिला आश्रम की स्थापना की, घर घर में रामायण और गीता के ग्रंथ पहुंचाये, भगवान राम के चित्र, मूर्तियां पहुँचायीं , महात्मा गांधी के चित्रों का वितरण उनके सिपहसालार और रामगुलाम की सरकार में मंत्री जगदीश गोवर्धन (भारत में मॉरीशस के वर्तमान उच्चायुक्त) ने बड़ी शिद्दत के साथ किया . स्वामीजी ने अफ्रीकी देशों में जाकर भारतवंशियों में भारतीय संस्कृति की लौ जगायी थी, उन्हें भजन गान के तौर तरीके सिखाये थे और धार्मिक ग्रंथ भी उपलब्ध कराये थे उन लोगो की भी सहायता की जिन्हें अफ्रिकीकरण के नाम पर देश निकाला दिया जा रहा था .

देश का पहला प्रधानमंत्री होने के नाते सर शिव सागर रामगुलाम ने मॉरीशस को अपने पैरों पर खड़ा करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली थी . लेकिन एक बार चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने पुनःचुनाव नहीं लड़ा उनके स्थान पर अनिरुद्ध जगन्नाथ देश के प्रधानमंत्री बने . स्वामीजी के परामर्श पर प्रधानमंत्री जगन्नाथ ने सर शिव सागर रामगुलाम को देश का गवर्नर जनरल बनाकर सम्मानित किया .

रामगुलाम वृद्ध हो चले थे, शरीर भी जर्जर हो गया था, अब तो उठने बैठने में भी दिक्कत होने लगी थी . वे जीवन त्यागने से पहले अपने मन की एक इच्छा की पूर्ति करना चाहते थे .

उन्होंने देश के कुछ नामी गिरामी लोगों को कालवासिस आश्रम के एक समारोह में आमंत्रित किया . डॉ रामगुलाम को उनके अंगरक्षकों ने सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया .समारोह में प्रार्थना हुई, भजन गाये गये .इसके बाद जब रामगुलाम बोलने के लिए खड़े हुए तो उनका गला अवरुद्ध हो गया और बोलते वक़्त उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी तथा आंखों में आंसू थे .

डॉ शिव सागर रामगुलाम ने कहा कि ‘स्वामीजी हमारे बुलावे पर इस देश में आये औऱ उन्होंने हमारी बहुत सेवा की लेकिन हम उनके लिए कुछ भी नहीं कर सके . आज इस अवसर पर इस आश्रम को स्वामीजी की महान सेवाओं के उपलक्ष्य में, स्वामी कृष्णानंद आश्रम का नाम दे रहा हूं .’

फिर वे खड़े होकर एक चक्रनुमा विशाल शिलाखंड की ओर बढ़े और उसपर लगे पर्दे को एक ओर से उन्होंने और दूसरी तरफ से प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने उठाया . पर्दा हटते ही उसके पीछे एक सफेद संगमरमर का शिलापट्ट खुल गया जिस पर लिखा था ‘स्वामी कृष्णानंद सेवा आश्रम .’

सभी उपस्थित गणमान्य लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच यह कार्यक्रम संपन्न हुआ .स्वामीजी के बारे में मॉरिशस सहित सभी अफ्रीकी देशों में मशहूर था कि उन्होंने जितने ट्रस्ट या सेवा केंद्र स्थापित किये हैं, उन्होंने कहीं भी अपना नाम लिखने की अनुमति नहीं दी थी .

यह बात डॉ रामगुलाम को भी मालूम थी इसलिये बिना उनकी जानकारी के यह कार्यक्रम रखा गया .अब तो वहां स्वामीजी के नाम पर कॉलेज तथा अनेक संस्थाएं हैं .स्वामीजी ने सत्तर से अधिक देशों में भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, योग और मानवीय सेवा का खूब प्रचार किया .इन कार्यों को अंजाम देने के लिये कुछ देशों में न्यास आज भी काम कर रहे हैं, जहां न्यास नहीं हैं वहां सेवा केंद्र कार्यरत हैं . इन सब का उदघोष है ‘मानव सेवा ही प्रभु सेवा है. ‘

स्वामीजी ज़्यादातर वक़्त मॉरिशस में ही बिताते थे . सभी जातियों, वर्गों , समुदायों और राजनीतिक पार्टियों के लोग उनसे मार्गदर्शन लिया करते थे. साल में चार पांच माह भारत में भी सेवा शिविर लगाया करते थे मुख्यतया गुजरात और राजस्थान में .

बहरहाल, 12 मार्च, 1992 को मॉरिशस को गणतंत्र घोषित किया गया . इस अवसर पर जिन दो हस्तियों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया उनमें प्रथम थे स्वामी कृष्णानंद सरस्वती और द्वितीय थे भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव . मॉरिशस में स्वामीजी के सेवा कार्यों के पच्चीसवें वर्ष औऱ जन्माष्टमी पर उनके जन्मदिन के अवसर पर एक विशेष डाक टिकट तथा स्मरण पत्रिका जारी की गयी .

एक भारतीय संन्यासी पर किसी विदेशी सरकार द्वारा उसके सेवा कार्यों के लिये विशेष डाक टिकट जारी कर सम्मानित करना बेशक़ एक सराहनीय एवं प्रशंसनीय कदम था .इस अवसर को देशव्यापी जश्न में तबदील करने के मंसूबे व कार्य धरे के धरे रह गये जब 23 अगस्त, 1992 में स्वामीजी के ब्रह्मलीन होने की खबर दुनिया ने सुनी .

मॉरिशस गम में डूब गया. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर देश के सभी वर्गों के लोग स्वामीजी के अंतिम दर्शन करने के लिये उनके आश्रम की तरफ दौड़ पड़े .लोगों की लंबी कतार लग गयी . वहीं स्वामीजी को समाधि दी गयी .जिस तरह की मॉरिशस में स्वामीजी की हैसियत थी वह उनके ‘राष्टपिता ‘होने की ही थी . आज भी उनकी समाधि पर लोग अपनी श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने के लिए रोजाना जाते हैं .

स्वामीजी के ब्रह्मलीन होने का समाचार मुझे श्री संजय डालमिया ने दिया अपने प्रधान संपादक कन्हैया लाल नंदन से विचार विमर्श करने के बाद हम लोगों ने अपने सांध्य दैनिक ‘समाचार मेल ‘ की लीड स्टोरी बनायी और स्वामी कृष्णानंद सरस्वती के सेवा कार्यों के बारे में विस्तार से लिखा गया बाद में ‘संडे मेल’ में भी खबर के साथ साथ मैंने अपने अनुभवों पर आधारित एक विस्तृत लेख लिखकर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि स्वामीजी को अर्पित की .आज भी स्वामीजी बहुत याद आते हैं, आखिर हमारा तीस बरसों का साथ जो था.

त्रिलोक दीप
त्रिलोक दीप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और संडे मेल के कार्यकारी संपादक हैं)

One Comment

  1. पढ़कर आनन्द आ गया । धन्यवाद त्रलोक दीप जी । आपके ना के त्र पर इ की मात्र आ साॅफ्टवेयर की कमजोरी से नहीं लग रही, माफ करियेगा।

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