ठाकरे सरकार गिराने की बाजी में फंसी भाजपा 

मुंबई से चंद्र प्रकाश झा * 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की तीन बरस पुरानी गठबंधन सरकार को गिराने की कोशिश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) फंस गई लगती है।

राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी  कोरोना कोविड संक्रमित होने से अस्पताल में भर्ती थे। पर अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही वह एक्शन में आ गए।उन्होंने ठाकरे सरकार से राजकाज के पिछले तीन दिन की फाइलों का हिसाब मांगा है। शिवसेना विद्रोही नेता एकनाथ शिंदे गुट की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 जुलाई तक उसके विधायकों की सदन की सदस्यता खत्म करने की विधान सभा उपाध्यक्ष की नोटिस पर आगे की कार्यवाही  पर 12 जुलाई तक रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर विधान सभा उपाध्यक्ष, उद्धव सरकार और महाराष्ट्र पुलिस को नोटिस जारी कर 12 जुलाई तक जवाब मांगा है। 

एकनाथ शिंदे के साथ के  विधायक भाजपा शासित असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के एक होटल में पिछले कई दिनों से ठहरे हुए हैं। वे मुंबई नहीं आ रहे हैं। उन्हें डर लगता है कि वे मुंबई आने पर सुरक्षित नहीं रहे सकेंगे। हकीकत यह है इन बागी विधायकों के मुंबई लौटे बगैर उद्धव सरकार के भविष्य का कोई ठोस फैसला नहीं हो सकता है।शिंदे जी ने उनकी संख्या शिवसेना के कुल विधायकों की करीब दो-तिहाई होने का दावा किया है।

शिव सेना के बाग़ी नेता शिंदे अपने साथियों के साथ

 सुप्रीम कोर्ट के कर्नाटक के एसआर बोम्मई सरकार के 1988 मामले में दिए निर्णय और उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार मामले में 1997 में बरकरार रखे उस निर्णय के अनुसार देश में किसी भी सरकार के पास विधायकों का बहुमत समर्थन होने या नहीं होने का निर्णय विधान सभा में ही हो सकता है। इस निर्णय में राज्यपालों को हिदायत दी गईं कि किसी भी राज्य सरकार को बहुमत हैं या नहीं हैं, इसका निर्णय राजभवन में नहीं विधानसभा में होना चाहिए’

शिंदे जी गुवाहाटी में आराम से होटल में बैठ राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी को पत्र भेज कर ठाकरे सरकार को नहीं गिरा नहीं सकते हैं। बागी गुट को भाजपा की शह पर यह सरकार गिराने राज्य विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित कराना  अनिवार्य है। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए  पहले इसकी नोटिस देनी होगी जिस पर वोटिंग कराने की स्थिति में  सदन के सभी विधायकों को अपना गुप्त वोट देना होगा। ठाकरे सरकार के पास सदन में अपनी पहल पर विश्वास मत प्रस्ताव पेश करने का विकल्प खुला है। विश्वास मत प्रस्ताव पर वोट देने विधायकों की सदन में शारीरिक उपस्थिति जरूरी है। शिंदे गुट के विधायक मुंबई नहीं लौटते है तो विश्वास मत प्रस्ताव के विरोध में भाजपा के ही विधायक वोट दे सकेंगे जिनकी संख्या अधिकतम 113 है।

महा विकास अघाड़ी (एमवीए) में उद्धव ठाकरे के साथ रह गए 127 शिवसेना विधायकों के अलावा एनसीपी के 53 , कांग्रेस के 44, बहुजन विकास अघाडी (बीवीए) के तीन , उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (सपा ) और पीजेपी के 2-2 , शेतकरी कामगार पक्ष (पीडब्ल्यूपीआई) के एक और 8 निर्दलीय हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे सरकार का सदन में विश्वास मत हासिल कर लेने में ज्यादा शंका नहीं है।

 भाजपा ने विगत में जिस तरह उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की निर्वाचित सरकारों को विधायकों की तोड़ फोड़ से गिराकर अपनी सरकार बना ली थी वह खेल महाराष्ट्र में सफल होना उतना आसान नहीं है। 

शिवसैनिक पूरे महाराष्ट्र में बागी विधायकों के दफ्तरों पर तोड़फोड़ कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं ने उस्मानाबाद के विधायक बालाजी कल्याणकर के घर पर हमला करने की कोशिश की. ठाणे , पालघर और रायगढ़ के इलाकों में शिंदे समर्थकों ने भी प्रदर्शन किया. शिवसेना के छह कार्यकर्ताओं को शिंदे जी के बेटे और कल्याण से लोकसभा सदस्य श्रीकांत शिंदे के उल्हासनगर कार्यालय पर पथराव करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. इन सबसे गुवाहाटी में बैठे बागी विधायकों का डर और बढ़ रहा है। उनमें मुंबई वापस आने का पर्याप्त साहस नहीं नजर आता है। बागी विधायक मुंबई आते हैं तो उन्हें मुंबई तो पुलिस सुरक्षा प्रदान कर देगी पर उद्धव ठाकरे के शिवसैनिकों को अपना ‘ काम ‘ करने का मौका भी रहेगा। 

इस बीच मोदी सरकार ने शिवसेना के 15 बाग़ी विधायकों को वाय प्लस श्रेणी की सुरक्षा प्रदान कर दी है। इनमें रमेश बोर्नारे, मंगेश कुदलकर, संजय शिरसत, लताबाई सोनवणे और प्रकाश सुर्वे शामिल हैं। इन विधायकों को केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल ( सीआरपीएफ) के जवानों का सुरक्षा घेरा प्रदान किया. गया है। केंद्र सरकार द्वारा महाराष्ट्र में भी इन सभी बागी विधायकों के परिवारों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी, क्योंकि सुरक्षा घेरे के तहत गृह सुरक्षा भी हैं. 

उद्धव ठाकरे के पुत्र और उनकी सरकार में पर्यावरण एवं वन मंत्री आदित्य ठाकरे ने कहा है बागी विधायकों को पार्टी में वापस नहीं लिया जाएगा.उन्होंने बागी विधायकों को फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती दी है और भाजपा का नाम लिए बगैर कहा उन्हें शर्म आती है कि जो पार्टी, केंद्र और असम में सत्ता में है उसने महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ दल के विधायकों को ले जाकर पूर्वोत्तर के एक ऐसे राज्य में रखा है जो बाढ़ की चपेट में है. उनके मुताबिक बागी विधायकों को कैदियों की तरह गुवाहाटी ले जाया गया है। उन्होंने ऐसे 14 बागी विधायकों के अब भी शिवसेना नेतृत्व के संपर्क में होने का दावा किया। उन्होंने जोर देकर कहा यह सच और झूठ  की लड़ाई है, सच हमारे साथ है और हम जीतेंगे। इस बीच, शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने बागियों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए उद्धव ठाकरे को अधिकृत कर दिया है। 

शिवसेना मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक और राज्यसभा के हाल में महाराष्ट्र से ही फिर निर्वाचित हुए सदस्य संजय राउत के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं का  बागियों के खिलाफ मुंबई, पुणे समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन जारी है। उन्होंने कहा हमने सबक सीख लिया है कि किस पर भरोसा किया जाना चाहिए. वे ( बागी विधायक ) ऐसे शरीर हैं, जिनकी आत्मा मर चुकी है. उनके शब्द हैं “। संजय राउत ने बागी विधायकों को विधानसभा की सदस्यता छोड़ नए सिरे से चुनाव लड़ने की चुनौती दी है। लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि जो वापस आना चाहते हैं, उनके लिए पार्टी के द्वार खुले हैं. 

राऊत  के मुताबिक अतीत में शिव सेना छोड़ने वाले छगन भुजबल, नारायण राणे और उनके समर्थकों ने अन्य दलों में शामिल होने के लिए शिवसेना विधायक के रूप में इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने उल्लेख किया कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस से भाजपा पाले में चले जाने वाले मोदी सरकार के मौजूदा नागरिक विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक कांग्रेस विधायकों ने मार्च 2020 में इस्तीफा दे दिया था.उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा : “ कब तक वे (विधायक) असम के गुवाहाटी में छिपे रहेंगे, आखिरकार उन्हें गिरगाम चौपाटी आना ही होगा ”. महाराष्ट्र विधान मण्डल परिसर , मुख्यमंत्री का आधिकारिक बंगला वर्षा, राज्य सरकार का मंत्रालय , सचिवालय, अधिकतर विधायकों के सरकारी आवास दक्षिण मुंबई में अरब सागर तटवर्ती के उस क्षेत्र में ही स्थित हैं, जिसे स्थानीय लोग गिरगाम चौपाटी कहते हैं। 

महाराष्ट्र पुलिस को नहीं पता है कि शिवसेना के बागी विधायक गुवाहाटी से मुंबई कब पहुंचेंगे। लेकिन राज्य के सभी हवाई अड्डों के आसपास सुरक्षा बालों को अलर्ट कर दिया गया है और एहतियातन बंदोबस्त की अन्य तैयारियां चल रही है। खबर है कि बागी विधायकों ने गुवाहाटी के एक लग्जरी होटल के प्रबंधन से वहां अपने ठहरने की अवधि बढ़ाने कहा है. 

उधर , असम सरकार में भाजपा के आवास और शहरी मामलों के मंत्री अशोक सिंघल और संसदीय कार्य मंत्री पीयूष हजारिका ने पिछले तीन दिनों में दूसरी बार रविवार को होटल जाकर बागी विधायकों से भेंट की। शिवसेना के एक अन्य नेता और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा उदय सामंत से संपर्क नहीं हो सका जो गुजरात के सूरत से गुवाहाटी जा रहे थे। 

शिवसेना के चीफ ह्विप (मुख्य सचेतक) सुनील प्रभु की अर्जी पर विधानसभा के प्रधान सचिव राजेंद्र भागवत द्वारा हस्ताक्षरित शनिवार को जारी नोटिस में लिखित जवाब मांगा गया है।अर्जी के मुताबिक गुवाहाटी में डेरा डाले इन सभी नामित 16 विधायकों  को मुंबई में बुधवार को पार्टी की बैठक में शामिल होने के लिए ह्विप जारी किया गया था पर उनमें से कोई भी बैठक में नहीं आए. शिवसेना ने विधानसभा सचिवालय को सौंपे पत्रों में शिंदे समेत इन सभी 16 विधायकों को सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की याचना की गई है.भागवत द्वारा शनिवार को जारी नोटिस में लिखा है कि सुनील प्रभु ने विधानसभा उपाध्यक्ष को सौंपे पत्र में महाराष्ट्र विधानसभा सदस्य (दलबदल  अयोग्यता) नियमावली, 1986 के तहत उनकी अयोग्यता की मांग की है. विधान सभा अध्यक्ष पद अभी रिक्त है। बागी गुट के प्रवक्ता दीपक केसरकर के मुताबिक उसके पास दो तिहाई बहुमत है। उन्होंने कहा शिवसेना प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से उनके मतभेद का मुख्य कारण पार्टी का 2019 में भाजपा के साथ गठबंधन समाप्त कर एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाने का निर्णय है। 

उन्होंने गुवाहाटी से एक ऑनलाइन प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि इन विधायकों ने शिवसेना नहीं छोड़ी है पर अपने समूह का नाम शिवसेना (बालासाहेब) रखा है. उन्होंने यह भी कहा कि यह गुट महाराष्ट्र विधानसभा उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल के आदेश को अदालत में चुनौती देगा..यह पूछे जाने पर कि क्या शिंदे गुट उद्धव ठाकरे सरकार से समर्थन वापस लेगा, उन्होंने कहा, ‘हमें समर्थन क्यों वापस लेना चाहिए? हम शिवसेना हैं. हमने पार्टी को हाईजैक नहीं किया है, एनसीपी और कांग्रेस ने इसे हाईजैक कर लिया है. हम शिवसेना नहीं तोड़ रहे हैं.हम तो उनसे (उद्धव से ) भाजपा से हाथ मिलाने कह रहे हैं.’

शरद पवार ने एमवीए के घटक दलों के नेताओं के साथ बैठक की है. उन्होंने एनसीपी नेताओं के साथ ही कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और वरीय नेता बालासाहेब थोराट और शिवसेना के अनिल परब और अनिल देसाई से चर्चा करने के बाद कहा कि सभी ठाकरे सरकार के साथ है।

इस बीच, मोदी सरकार में रेलवे, कोयला एवं खान राज्य मंत्री रावसाहेब दानवे ने दावा किया है कि ठाकरे सरकार दो-तीन दिन ही चलेगी. उन्होंने राज्य सरकार में एनसीपी के मंत्री राजेश टोपे की उपस्थिति में जालना में कृषि विभाग भवन के उद्घाटन समारोह में कहा कि इस सरकार को शेष विकास कार्य जल्द से जल्द पूरा करना चाहिए क्योंकि हम (भाजपा) राज्य में केवल दो-तीन दिन ही विपक्ष में हैं। वैसे उनका यह भी कहना था कि इस बगावत से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है. उनके मुताबिक शिवसेना के बागियों की मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से नाराजगी है. शिंदे गुट के भाजपा में विलय की संभावना के बारे में पूछने पर  उन्होंने कहा ऐसा प्रस्ताव नहीं है और अगर कोई प्रस्ताव मिलेगा तो भाजपा नेतृत्व फैसला करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की कोई संभावना नहीं है.

चुनावी इतिहास 

देश में लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटें उत्तर प्रदेश में और उसके बाद सबसे अधिक 48 महाराष्ट्र में ही हैं। लोक सभा के 2019 के पिछले चुनाव में महाराष्ट्र में शिवसेना -भाजपा की ‘ भगवा  युति ‘ कायम थी जिसने कुछेक अन्य दलों को साथ रख 48 में से 40 सीटें जीती थी। इनमें से 18 शिवसेना ने जीती जो उसकी सर्वश्रेष्ठ चुनावी सफलता है। इससे पहले उसने सबसे अधिक 15 सीटें 1996 के आम चुनाव में जीती थी। जब 2019 में ही विधान सभा चुनाव हुए तो युति टूट गई। शिवसेना ने उस चुनाव में भाजपा से विधानसभा की 288 सीटों में से बराबर का बँटवारा करने की मांग की थी जो नहीं मानी गयी। दोनों अलग -अलग चुनाव लड़े।  भाजपा 122 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। शिवसेना ने 63 सीटें जीती थी और उसने नई सरकार बनाने के लिए भाजपा को अपना समर्थन दे दिया।  राज्य में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा की बनी पहली सरकार में शिवसेना भी शामिल हो गई। तमाम अंतर्विरोध के बावजूद शिवसेना केंद्र की मोदी सरकार और महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार में  बहुत दिनों तक बनी रही ।लोकसभा चुनाव में इस युति में किसान नेता राजू शेट्टी का ‘ स्वाभिमानी पक्ष ‘ भी शामिल था जिसकी तरफ से एक सीट खुद शेट्टी ने हातकणंगले से जीती थी। बाद में स्वाभिमानी पक्ष ने मोदी सरकार पर किसान -विरोधी नीतियों पर चलने का आरोप लगा कर भाजपा का साथ छोड़ दिया।

राजनीति का आर्थिक पहलू

आर्थिक-वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट मुकेश असीम के अनुसार राज्य में हालिया सियासी टकराव को समझने के लिए संक्षिप्त ऐतिहासिक संदर्भ जरुरी है। मुंबई 19वीं सदी से ही पहले औद्योगिक और फिर वित्तीय पूंजी का बड़ा केंद्र रहा है, भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा आधार ही मुंबई की गुजराती व कलकत्ता की मारवाड़ी पूंजी का गठबंधन था जिसमें मद्रास और लाहौर की छोटी भूमिका थी.कानपुर के मारवाड़ियों को कलकत्ता का हिस्सा माना गया। इस राष्ट्रवाद का वैचारिक आधार पुरातन हिंदू गौरव था। मुंबई में प्रभुत्वशाली गुजराती पूंजी का द्वंद्व मराठी पूंजी से था जो छोटी थी और जिसका विकास मुख्यतः कृषि, सहकारिता, चीनी मिलों और अन्य छोटे उद्योग-व्यापार में ही हुआ था. 

मुंबई प्रांत का पहली  मई 1960 को पुनर्गठन होने पर उसे महाराष्ट्र और गुजरात के दो अलग राज्यों में बाँट दिए जाने के बाद  गुजराती पूंजी के विरोध के बावजूद मराठी पूंजी के स्वतंत्र’ विकास के लिए मुंबई को महाराष्ट्र में बनाए रखने के लिए सशक्त जनआंदोलन हुआ.अंततः मुंबई को महाराष्ट्र में ही रखा गया। मराठी मानुस  का नारा देने वाली शिवसेना के गुजराती विरोध का यही कारण है. 

जब तक बड़ी पूंजी की विश्वस्त पार्टी कांग्रेस थी और भाजपा विपक्ष में थी हिंदुत्व के आधार पर दोनों साथ चलते रहे. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भारत के पूंजीपति वर्ग में वर्चस्व कायम कर चुकी गुजराती पूंजी द्वारा हिंदी हिंदुत्व हिंदुस्तान के राष्ट्रवाद के नारे पर अपना दांव चलने के साथ ही शिवसेना के लिए दिक्कत खड़ी हो गई और भाजपा के साथ उसका अंतर्विरोध शुरू हो गया। 

महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़णवीस के नेतृत्व में भाजपा की पहली सरकार बनते ही उसने गुजराती पूंजी के प्रभुत्व को बढ़ाने कई फैसले लिए और  सत्ता के बल पर मराठी पूंजी के आधार सहकारी बैंकों और चीनी मिलों के प्रबंधन पर कब्जे का अभियान आरंभ किया। फड़णवीस ,  मुख्यमंत्री पद पर पहले कार्यकाल मे 31 अक्टूबर 2014 से 12 नवंबर . 2019 तक और दूसरे में 2019 के पिछले विधानसभा चुनाव के बाद जोड़ तोड़ से मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद सदन में बहुमत के अभाव में चंद दिन ही इस गद्दी पर टिक सके थे। लेकिन फड़णवीस राज में राजनीति में प्रभुत्वशाली मराठी परिवारों को भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे शिवसेना-एनसीपी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया. अंततः मराठी आधार वाले दलों को भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाना पड़ा। इस द्वंद्व की कटुता इतनी अधिक है कि भाजपा  ने केन्द्रीय सत्ता बल से महाराष्ट्र सरकार के हर फैसले को अटकाने की कोशिश की है. 

*सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाडी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता और पुस्तक लेखन करते हैं. इन दिनों वह भारत के विभिन्न राज्यों की यात्रा कर रहे हैं। 

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