पत्रकारिता : रवीश कुमार की किताब के बहाने —

मीडिया से असली मुद्दे नदारद

त्रकारिता पर रवीश कुमार की किताब कहती है कि एक डरा हुआ पत्रकार एक मरा नागरिक पैदा करता है. यह वाक्य आने वाले स्वतंत्रता दिवस से पहले बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है, जो हमें खुद से पूछने चाहिए।जिस बात के लिए भगत सिंह, महात्मा गांधी शहीद हुए थे क्या यह वैसा ही राष्ट्र है ! पत्रकारिता पर रवीश कुमार की यह किताब आज चौतरफ़ा भय के माहौल में और भी प्रासंगिक है. उत्तराखंड से हिमांशु जोशी की टिप्पणी.

हिमांशु जोशी

पिछले कुछ समय से पत्रकारिता में बोलना, सुनना और समझना बड़े ही संकट में जान पड़ रहा है।’लंकेश पत्रिका’ का संचालन करने वाली गौरी लंकेश 2017 में मार दी गई. भारतीय फ़ोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को अफगानिस्तान में एक रिपोर्टिंग के दौरान मार दिया गया. श्याम मीरा सिंह को सबसे तेज़ ‘आजतक’ ने तेज़ी के साथ सिर्फ इसलिए नौकरी से निकाल दिया, क्योंकि वह सोशल मीडिया पर ‘लोकतांत्रिक देश’ के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ लिख रहे थे, खुलकर लिख-बोल रहे थे. हाल ही में दैनिक भास्कर, भारत समाचार और अन्य मीडिया घरानों पर छापों अथवा दूसरे तरह के दबाव की बात तो सबको पता ही है।


कमी लोकतंत्र की नीति बनाने वालों में नहीं, कमी पत्रकारिता के रखवालों में जान पड़ती है। कहीं पत्रकारिता में शोध करने वाले को यह कह दिया जाता है कि शोध का माध्यम राष्ट्रभाषा हिन्दी में नही सिर्फ़ अंग्रेज़ी में होगा तो कहीं पत्रकारिता छात्रों के मन में इस बात पहले ही डाल दिया जाता है कि ‘तेरा तो भविष्य ही नही’. पत्रकारिता के वर्तमान हालातों को गहराई से समझाने वाली क़िताबें पत्रकारिता कोर्स से ग़ायब हैं। नेट परीक्षा में पत्रकारिता के छात्रों से वह सवाल पूछे जाते हैं जो ब्रिटिश छात्रों से पूछे जाने चाहिए।


पत्रकारिता अब दो धड़ों में बंट चुकी है गोदी पत्रकारिता और ‘लात मारो’ पत्रकारिता। गोदी पत्रकारिता का मतलब आप जानते ही हैं, खूब सारे पैसे और अवार्ड तो लात मारो पत्रकारिता मतलब तंत्र के खिलाफ़ लिखने वाले पत्रकारों को कभी भी अपशब्द बोल दो ,उनके साथ मारपीट कर लो या उन्हें कभी भी नौकरी से निकाल दो।


ख़ैर एक क़िताब है जो भारतीय पत्रकारिता को गहराई से समझाती है और पत्रकारिता कोर्स में जरूर शामिल की जानी चाहिए।पत्रकारिता पर रवीश कुमार की ‘बोलना ही है’, क़िताब है लोकतंत्र, संस्कृति और राष्ट्र के बारे में।


रवीश कुमार एनडीटीवी समाचार नेटवर्क के हिंदी समाचार चैनल एनडीटीवी में संपादक है और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, रेमन मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। ‘इश्क़ में शहर होना’ को मिला ‘बोलना ही है’ इनकी पांचवीं पुस्तक है।

जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं

क़िताब की भूमिका ही आपको हिलाने के लिए काफ़ी है, जिसमें रवीश लिखते हैं साम्प्रदायिक बातें अब राष्ट्रवादी बताई जाने लगी हैं।
2019 विश्व कप भारत मोदी की क़िस्मत के कारण जीतने वाला है पर बेरोज़गारी बढ़ना उनके कारण नही है, ठीक वैसे ही जैसे आज कोरोना से हुई मौतों के लिए वह जिम्मेदार नही थे पर मीराबाई चानू के सम्मान समारोह में मीराबाई से बड़ी तस्वीर प्रधानमंत्री की लगी है।
मीडिया में थ्योरी है ‘कल्टीवेशन थ्योरी’ जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं। हो भी यही रहा है मुझे अलग-अलग धर्मों के अपने दो दोस्त याद आते हैं, दोनों पिछले कुछ समय से एक-दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत भरे पोस्ट करने लगे, मेरे उनकी इस नफरत का कारण पूछने पर दोनों के एक ही जवाब थे।यूट्यूब पर देखी गई वीडियो।
भारत प्रेस की आज़ादी में इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि पाठक भी यही चाहते हैं। जो चैनल, अखबार सरकार की जितनी तारीफ़ करे उसकी उतनी अधिक रेटिंग।युवा पीढ़ी पर अज्ञानता का बोझ लाद, साम्प्रदायिकता का चश्मा पहना दिया गया है।


मीडिया से असली मुद्दे नदारद


लेखक चाहते हैं कि जब हम अपनी समस्याओं के लिए मीडिया का मुंह ताकें तो बिकी हुई मीडिया न मिले।
बेरोज़गारी जैसे आंकड़े बाहर न आएं इस डर से ‘वित्त मंत्रालय’ ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों को बगैर अप्वाइंटमेंट के अंदर आने से मना किया और इस पर कोई विरोध भी नही हुआ, लेखक इससे खासे नाराज़ दिखते हैं।
लेखक कहते हैं कि लोग उन्हें अपनी समस्याओं को उठाने के लिए फोन करते हैं पर देखते उन चैनलों को हैं जो उनकी समस्या कभी उठाते ही नही।
लेखक भूमिका में ही सब लिख देने का कारण बताते हैं कि भूमिका ही वह जगह है जहां किताबों को जला देने वाले लोगों की कम नज़र पड़ती है।
किताब कोरोना काल से पहले लिखी गई है और अब पत्रकारिता की हालत उससे बदतर हो चुकी है इसलिए मेरा प्रयास यह रहा है कि किताब की वर्तमान हालात से तुलना करते आगे बढूं।


लिखने के लिए हिम्मत जरूरी है

क़िताब लेखक की आत्मकथा ही सही पर पूरी भारतीय पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य की कहानी भी है। जज लोया की मौत पर प्राइम टाइम कर बोल पाने के बाद जो रवीश के अंदर आंतरिक द्वंद पैदा हुआ उसे वह पहले पाठ में बोल गए हैं।वह बताते हैं कि इतना बड़ा पत्रकार होने के बावजूद रोज़ सुबह उठने पर उनके अंदर नौकरी खोने का डर रहता है।
आईटी सेल की मदद से वाट्सएप यूनिवर्सिटी का जनता के बीच प्रभाव कितना बढ़ गया है, इसको लेकर वह युवाओं में नफ़रत का ज़हर किस कदर घुल गया है का उदाहरण देते हैं। इस ज़हर को मैं खुद एक दिन उत्तराखंड के किसी फ़ेसबुक पेज़ पर झेल चुका हूं जब एक युवा को उत्तराखंड के जाने माने पेज़ में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था पर अन्य युवा उसके धर्म विशेष से जुड़े होने पर उसे साक्षात्कार हेतु बुलाए जाने का विरोध करने लगे थे, जब मैंने इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई तो मुझे भी भला-बुरा कहा गया। मेरे समझ यह नही आया कि पहाड़ की शांत वादियों के युवाओं में आख़िर यह ज़हर आया कहां से!शायद ज़हर फैलाने के लिए सस्ते कर दिए गए इंटरनेट से!
लेखक द्वारा महिलाओं के द्वारा राजनीतिक मसलों पर न लिखने की बात कही गई है, जिसे मैंने ‘जनज्वार‘ की वीडियो समीक्षा में खुद महसूस किया है।किसी राजनीतिक वीडियो पर महिलाओं की टिप्पणी न के बराबर होती है।
लेखक लिखते हैं कि फोन करने पर अधिकारी, मंत्री फ़ोन पर नही अभी वाट्सएप कॉल करते हैं कहते हैं, उनका वह डर आज किताब आने के बाद पैग़ासुस के रुप में सच ही साबित हुआ है।
रवीश ने आजकल बहुत से बड़े अखबारों में लेख के न छपने की बात लिखी है, मैं खुद यह सब महसूस करता हूं। बस गिने-चुने वेब पोर्टल्स और अख़बार आजकल सच लिख भेजा छापते हैं नही तो अधिकतर को बस ‘कम चुभने वाले’ समाचार ही भाते हैं।जब आप सरकार पर सवाल करती ख़बर पढ़ेंगे ही नही तो उनका झूठ कैसे पकड़ेंगे और जब झूठ पकड़ेंगे ही नही तो वोट तो अपनी ‘सच्ची’ सरकार को ही देंगे।


फेक न्यूज़, समस्या बड़ी है

फेक न्यूज़’ से जनता पर पड़ रहे प्रभाव पर चर्चा करते वह गुजरात की एक घटना का उदाहरण देते हैं। फेक न्यूज़ सोची-समझी साजिश के तहत आपको नागरिक से रोबोट बना रही है।सुमित्रा महाजन की पत्रकारों को सलाह का उदाहरण पत्रकारों को सिर्फ़ जी हुजूरी करने का फ़रमान है।
फेक न्यूज़ से नफ़रत पालने वाली फ़ौज वर्चुअल नही हमारे बीच तैयार हो गई है पंक्तियां आने वाले खतरे से आगाह कराती हैं।

महान बनाने का सपना बहुत खतरनाक है, वही सपना जो महान अमरीका और फ्रांस को भी दिखाया गया है। पूरी दुनिया हिटलर के महान जर्मनी बनाने वाले सपने की ओर अग्रसर है। हिटलर ने जो नफ़रत के बीज बोए थे वह अब भी बोए जा रहे हैं, उसकी बदला लेने की राजनीति अब भी हो रही है।

कभी आप दीदी की मिमिक्री सुनते हैं तो कभी पप्पु वाले व्यंग्य।एक नेता की सोच पर लाखों यहूदियों को मारा गया था, उसमें मारने वाला सिर्फ़ हिटलर नही था उसकी सोच से प्रभावित नागरिक भी थे।

अमरीका, अफगानिस्तान, चीन, भारत , फ्रांस सहित पूरी दुनिया में भी आज वही हो रहा है। निर्दोषों को भीड़ द्वारा घेरकर मारे जाने की खबरों से आप अनजान नही हैं , नक्सलवाद हो या रंगभेद सब एक ही सोच का परिणाम होते हैं।
लेखक ने टीवी, वाट्सएप पर इतिहास को लेकर ज्ञान बढ़ाने से बेहतर लाइब्रेरी में बैठने को बताया है।वह लिखते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्यमन्त्रियों के खिलाफ़ लिखने भर से कितने ही लोगों को जेल डाल दिया गया है, क्या यही लोकतंत्र है!सच बोलने पर जेल के भय को समाप्त किया जाना चाहिए, महात्मा गांधी ने भी यही किया था। लिखने का गला घोंटने पर कानून बनाए जा रहे हैं पर लिखिए आप तंत्र से ऊपर हैं, यही लोकतंत्र है।


पत्रकारिता वो जो समाज सुधारे

मज़बूत नेता और नेता का अंतर भी किताब पढ़ने पर समझ आता है, महात्मा गांधी के चारों और अम्बेडकर, सभाष चन्द्र बोस, नेहरू और पटेल थे पर आज के ‘मज़बूत’ नेता के पास दूसरों की बुराइयां हैं। नेता वही है जो सबको साथ लेकर चले।
फिल्मों से समाज बहुत कुछ सीखता है पर भारतीय फिल्मों ने कभी ऐसे मुद्दों को छुआ ही नही जिससे जाति-धर्म की दूरियां खत्म हों, वह बस सुंदरता और अमीरी-गरीबी ही बेचने में रहे।पत्रकारिता पर रवीश की किताब इश्क़ जैसे अनछुए मुद्दे पर भी प्रकाश डालती है कि  इश्क़ के लिए हमारे समाज में जगह ही कितनी है। हमने लव पार्क कितने बनाए हैं!अंकित सक्सेना की मौत का जिम्मेदार हमारा समाज ही है। अंत में सब राजनीतिक रंग में रंग दिया जाता है।वह सब हत्यारें हैं जो इन मुद्दों पर इंटरनेट पर नफ़रत भरी टिप्पणी करते हैं, जोड़ों को पार्क में पीटते हैं, क्या यही आज़ादी थी!
24 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार बताया था। पैग़ासुस, ट्विटर विवाद, आरोग्य सेतु और आधार कार्ड अनिवार्यता! क्या हम उस अधिकार का प्रयोग कर पाए हैं! क्या सरकार हमारे मौलिक अधिकार की सुरक्षा करने में सक्षम हुई?किताब में लिखी पब्लिक स्पेस में निजता समाप्त नही होगी वाली बात गौर करने लायक है।


हम जागरूक नही होंगे तो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नही , राजनीतिक पार्टियों का पहला स्तम्भ बन जाएंगे।1949 में लिखी जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘1984’ की ‘विचार पुलिस’ जल्द हमारे ऊपर कब्ज़ा कर लेगी। इसका उदाहरण देते रवीश 2019 में फ़ेसबुक पर बने ‘क्लीन द नेशन’ पेज़ के बारे में बताते हैं, शायद किताब में इसके बारे में पढ़कर आपकी आंखें खुली रह जाएं।

खैरात में नही बंटता लोकतंत्र


लोकतंत्र के महत्व को समझना है तो हांगकांग के संघर्ष को देखिए, उस कश्मीर को देखिए जहां सूचनातंत्र बंद होने पर भी हम शांत थे ।मेनस्ट्रीम मीडिया लाठी खा रहे लोगों की खबरें नही दिखाता।इस मुख्यधारा मीडिया में पैग़ासुस का बाज़ार मंदा हो गया है जबकि ऐसी जासूसी पर मीडिया ने आरोपियों को बेनकाब करना चाहिए था, चंगा हो रहा है तो राज कुंद्रा की पोर्न का मामला। बन्दा मिला है ख़बर बनाने के लिए जमकर बनेगी, वरना सुना बहुत बार है कि सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाया है।एक बार गूगल पर ‘पोर्न’ लिख कर तो देखिए राज कुंद्रा को भूल जाएंगे।
 एक डरा हुआ पत्रकार एक मरा नागरिक पैदा करता है वाक्य आने वाले स्वतंत्रता दिवस से पहले बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है, जो हमें खुद से पूछने चाहिए।
जिस बात के लिए भगत सिंह, महात्मा गांधी शहीद हुए थे क्या यह वैसा ही राष्ट्र है ! यदि हां तो 15 अगस्त को मिठाई जरूर खाइए।


सही सूचना सुनें, देखें और पढ़ें

पत्रकारिता पर रवीश की किताब कहती है कि सूचनाओं की प्रमाणिकता जरूरी है और उसके लिए मुख्यधारा मीडिया से परे नागरिक पत्रकारिता का शुरू होना भी। फ़ेसबुक के एक पेज़ पर मुझे नफ़रत पाले युवाओं को देख दुख हुआ था तो कुछ पेज़ो पर नाज़ भी है, जहां कभी किसी युवा के स्वरोज़गार अपनाने की ख़बर को सकारात्मक रूप से दिखाया जाता है तो कभी जात-पात और धर्म से परे एक दूसरे की मदद वाली ख़बरों को फैला समाज़ में अच्छा सन्देश दिया जाता है।वहां समय-समय पर अपने शहर-गांव में ख़राब सड़क बनाने वालों के साथ बिन सड़क पूरी किए टोल वसूलने वालों को घेरा भी जाता है।यही तो नागरिक पत्रकारिता है।
गांधी जी का वक्तव्य इन टीवी चैनलों , अखबारों के लिए ठीक बैठता है “आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें।अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों।”

गांधी जी का वक्तव्य इन टीवी चैनलों , अखबारों के लिए ठीक बैठता है “आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें।अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों।”

पत्रकारिता पर रवीश कुमार की यह किताब प्रकाशित तो काफ़ी पहले प्रकाशित हुई है, लेकिन इस समय यह और भी प्रासंगिक हो गयी है.


पुस्तक- बोलना ही है।

लेखक- रवीश कुमार

प्रकाशक- राजकमल प्रकाशनलिंक- 

https://www.amazon.in/dp/9388933613/ref=cm_sw_r_cp_apa_glt_fabc_B71T4S966056FTSEZ7E6

मूल्य- 206रेटिंग- 4.5/5
हिमांशु जोशी , उत्तराखंड।
www.twitter.com/Himanshu28may

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