डग्गामार टैंपो में सफ़र कराने के बाद भी बड़ा सन्देश देती ‘छोरी’

फ़िल्म की कहानी और उद्देश्य की बात करें तो निर्देशक इसी बात में भ्रमित लगते हैं कि वह दर्शकों को डराना चाहते हैं या भ्रूण हत्या पर बात करना चाहते हैं. दोनों साथ करने के प्रयास में फ़िल्म शुरू से आखिर तक एक डग्गामार टैंपो की तरह खिंचती चली जाती है.

हिमांशु जोशी

सबसे पहले तो ये बात जान लें कि Chhori साल 2017 में आई एक मराठी फ़िल्म लपाछपी की रीमेक है. गन्ने के खेत में बदहवास हालत में भागती औरत के साथ फ़िल्म की शुरुआत होती है, यह दर्शकों को फ़िल्म के साथ बांधने की अच्छी कोशिश है.

कहानी में साक्षी बनी नुसरत भरुचा की एंट्री होती है, जिन्होंने गर्भवती महिला का किरदार निभाया है और वह उसे जीती हुई भी लगी हैं. भानो देवी बनी मीता वशिष्ट का अभिनय उनकी एंट्री के बाद से उतार चढ़ाव भरा लगता है, उन्होंने अभिनय में निरन्तरता नही रखी. सौरभ गोयल और राजेश जैस ठीकठाक हैं.

फ़िल्म की शूटिंग मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद जिले में हुई है और वहां के गांव की गन्ने के खेत वाली लोकेशन मात्र भी दर्शकों को डराने में कामयाब हुई है. कैमरा वर्क इतना बेहतरीन है कि पुतले, बच्चों की झलक और रोशनदान भर से ही डरावना माहौल पैदा कर दिया गया है.

फ़िल्म की कहानी और उद्देश्य की बात करें तो निर्देशक इसी बात में भ्रमित लगते हैं कि वह दर्शकों को डराना चाहते हैं या भ्रूण हत्या पर बात करना चाहते हैं. दोनों साथ करने के प्रयास में फ़िल्म शुरू से आखिर तक एक डग्गामार टैंपो की तरह खिंचती चली जाती है. एक ड्राइवर पर भरोसा कर उसके घर पहुंच जाना, तंत्र-मंत्र, डायन वाला खेल और भी बहुत कुछ आजकल के दर्शकों को पचना बंद हो गया है.

फ़िल्म का ध्वनि विभाग बेहतरीन है. कहानी कुछ खास न होने के बाद भी पानी की टप-टप या लकड़ी काटने की आवाज़ मात्र से ही डराने का सफ़ल प्रयास किया गया है. बैकग्राउंड म्यूज़िक इसका साथ बख़ूबी निभाता है, ‘ओ री चिरैया नन्ही सी चिड़िया अंगना में फिर आजा रे’ सुनने में हमेशा की तरह दर्दभरा है.

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‘हर छोरी में एक मां होती है और मां से बड़ा न किसी का ओहदा है न किसी की औक़ात’ ,जैसे संवाद ठीक हैं तथा महिलाओं की स्थिति पर विमर्श कराने का प्रयास करते हैं.

फ़िल्म का कॉस्ट्यूम डिज़ाइन अच्छा है, नुसरत भरुचा हों या मीता सभी कपड़ों के डिजाइन भर से ही गांव का दर्शन करा देते हैं.

एक कुंए में बच्चियों की लाशों के ढेर वाला दृश्य बहुत कुछ कहता है और फ़िल्म के आख़िर में एक जानकारी भी मिलती है कि जब तक आपने फ़िल्म देखी तब तक 113 भ्रूण हत्या हो गई होंगी.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि फ़िल्म का विषय तो बहुत अच्छा था पर वह वैसी बन नही पाई जैसी बन सकती थी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो
निर्देशक- विशाल फुरिया

लेखक- विशाल फुरिया, विशाल कपूर
छायांकन- अंशुल चौबे
पार्श्व संगीत- केतन सोढा
कॉस्ट्यूम डिज़ाइन- विशाखा कुल्लरवर
कलाकार- नुसरत भरुचा, मीता वशिष्ट, सौरभ गोयल, राजेश जैस
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may
रेटिंग- 2.5/5

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