आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या डिजिटल गुलामी? सैम पित्रोदा ने चेताया

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या डिजिटल गुलामी? सैम पित्रोदा ने चेताया—लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव को कुचल रहा है 'पावर और प्रॉफिट' का गठजोड़

( राम दत्त त्रिपाठी

आज पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की नई क्रांति को लेकर कौतूहल में है। तकनीक की इस चमक-दमक के बीच एक बड़ा और डरावना सवाल यह उठ रहा है कि क्या AI आम नागरिक को ज्यादा आजादी और ताकत देगा, या फिर यह चंद बड़ी टेक कंपनियों के एल्गोरिदम और अकूत पैसे वाली राजनीतिक पार्टियों के भंवरजाल में हमें ‘डिजिटल गुलाम’ बना देगा?

इसी गंभीर विषय पर भारत की टेलीकॉम क्रांति के जनक और तकनीकी विशेषज्ञ **सैम पित्रोदा (Sam Pitroda) ने अमेरिका के शिकागो शहर से ‘मीडिया स्वराज’ (Media Swaraj) के लिए हमसे खुलकर बात की। इस विशेष इंटरव्यू में उन्होंने AI के खतरों, चुनावी धांधलियों, ईवीएम (EVM) पर उठते सवालों और भारत की तकनीकी संप्रभुता को लेकर कई ऐसे चौंकाने वाले बिंदु उठाए हैं, जिन पर तुरंत बहस शुरू होना जरूरी है।

शॉर्ट रन में लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है AI

सैम पित्रोदा का मानना है कि लंबे समय में तो AI इंसानियत के भले के लिए काम आ सकता है, लेकिन मौजूदा दौर में यह बेहद खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है।

 “शॉर्ट रन (शुरुआती दौर) में AI लोकतंत्र के लिए बहुत क्रूर और कड़ा साबित होने जा रहा है। आज यह तकनीक उन लोगों के हाथों में सिमट चुकी है जो सिर्फ ‘पावर और प्रॉफिट’ (सत्ता और मुनाफे) के लिए काम कर रहे हैं। कोई भी AI के कैरेक्टर को अहिंसक और भरोसेमंद बनाने पर काम नहीं कर रहा।”

 सैम पित्रोदा

चुनावी राजनीति में AI के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि आज एल्गोरिदम के जरिए लोगों के बयानों को तोड़ना-मरोड़ना और नफरत फैलाना बेहद आसान हो गया है। ‘डीपफेक’ तकनीक के जरिए किसी भी नेता या नागरिक के मुंह से कुछ भी कहलवाया जा सकता है जो बिल्कुल सच दिखाई देगा। इसका सीधा इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए समाज में ध्रुवीकरण (Polarization) और झूठ फैलाने में किया जा रहा है।

“मेरा व्यवस्था से भरोसा उठ गया है, चुनाव में पेपर बैलेट पर वापस लौटना जरूरी”

इंटरव्यू का सबसे बड़ा और तीखा मोड़ तब आया जब पित्रोदा ने भारत की चुनाव प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली शर्त ‘भरोसा’ है, और आज वह भरोसा टूट चुका है।

पित्रोदा ने दो-टूक शब्दों में कहा:

 “व्यक्तिगत रूप से कहूं तो मेरा चुनाव प्रक्रिया और इलेक्शन कमीशन से भरोसा उठ चुका है। ईवीएम को लेकर देश की जनता और बुद्धिजीवियों के मन में इतने गहरे संदेह पैदा हो चुके हैं कि अब एक ‘रिसेट’ की जरूरत है। देश का खोया हुआ भरोसा वापस लाने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अगले चुनाव में दोबारा पेपर बैलेट (मतपत्र) पर लौट आएं। मुद्दा यह नहीं है कि कौन सही है या कौन गलत, मुद्दा जनता के विश्वास का है, भले ही इसके लिए वोटों की गिनती में 5 दिन ज्यादा क्यों न लग जाएं।”

  रैलियों और होर्डिंग्स पर लगे पाबंदी: “यह दौलत का भद्दा प्रदर्शन है”

भारत जैसे गरीब देश में चुनावों के दौरान पानी की तरह बहाए जा रहे हजारों करोड़ रुपयों पर कड़ा प्रहार करते हुए सैम पित्रोदा ने एक बड़े चुनावी सुधार की मांग की। उन्होंने कहा कि आज पैसे और सत्ता के दम पर चुनावों को हाईजैक किया जा रहा है।

विशाल जनसभाओं पर रोक:

 पित्रोदा ने पूछा कि देश के प्रधानमंत्री या बड़े नेताओं द्वारा चार्टर्ड प्लेन और हेलीकॉप्टरों से उड़कर लाखों की भीड़ जुटाने और एक ही भाषण को बार-बार दोहराने का क्या तुक है? चिलचिलाती धूप में गरीब जनता नेताओं का इंतजार करती है और नेता वहां जाकर सिर्फ एक-दूसरे को गालियां देते हैं। इसमें कोई स्वस्थ संवाद नहीं होता।

विकल्प क्या है?

उन्होंने सुझाव दिया कि सभी तरह के महंगे होर्डिंग्स, विज्ञापनों और बड़ी रैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उम्मीदवारों को सोशल मीडिया, अपने डिजिटल पोर्टल्स और स्थानीय स्तर पर घर-घर जाकर 10-20 लोगों के छोटे समूहों में सीधे संवाद करना चाहिए, जिससे चुनाव का खर्च न्यूनतम हो सके।

क्या अपनी ही कब्र खोद रहा है देश का मजदूर और युवा?

इंटरव्यू के दौरान हमने सैम साहब के सामने देश की जमीनी हकीकत रखी कि कैसे गुरुग्राम, नागपुर और तमिलनाडु की गारमेंट फैक्ट्रियों में दर्जी और सिलाई करने वाले मजदूरों के सिर पर कैमरे लगाकर उनके काम करने के तरीके (डेटा) को रिकॉर्ड किया जा रहा है। मकसद साफ है—इस डेटा से रोबोट तैयार करना और अंततः इन गरीब मजदूरों को नौकरी से निकाल देना। खुद मजदूर कह रहे हैं कि “हम अपनी ही कब्र खोद रहे हैं।”

इस पर सहमति जताते हुए पित्रोदा ने आगाह किया कि यह संकट सिर्फ शारीरिक श्रम करने वाले ‘ब्लू-कॉलर’ मजदूरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘व्हाइट-कॉलर’ (दफ्तरों में काम करने वाले उच्च शिक्षित) युवाओं पर गाज गिरने वाली है।

 खत्म हो रही हैं शुरुआती नौकरियां:

जो प्रेजेंटेशन, वित्तीय मॉडल या रिसर्च तैयार करने के लिए पहले कंपनियां तीन एमबीए (MBA) ग्रैजुएट्स को दो हफ्ते के लिए काम पर रखती थीं, आज AI वही काम उनसे बेहतर तरीके से सिर्फ 3 मिनट में कर देता है।

 सरकारों के दावे खोखले:

 पित्रोदा ने कहा कि सरकारों द्वारा बिना किसी ठोस योजना के प्रशासनिक पदों पर दी जा रही नौकरियां सिर्फ एक अस्थाई आर्थिक मदद (डोल-आउट) हैं, इनसे युवाओं को कोई सार्थक या लंबी उत्पादकता वाला रोजगार नहीं मिल रहा। देश का युवा आज खुद को बेआवाज और भविष्यहीन महसूस कर रहा है।

भारत की सबसे बड़ी तकनीकी कमजोरी: ‘अपना डेटा ही नहीं है’

एक और बेहद संवेदनशील तकनीकी और संप्रभुता से जुड़े मुद्दे पर बात करते हुए सैम पित्रोदा ने बताया कि आज जो भी बड़े AI मॉडल (जैसे ChatGPT या अन्य) काम कर रहे हैं, उनके बेस में सिर्फ पश्चिमी देशों या चीन का डेटा है।

 “जब तक हम अपना डेटा फीड नहीं करेंगे, तब तक हमारे फैसले दूसरों के लॉजिक पर तय होंगे। एआई के पास हमारी क्षेत्रीय भाषाओं—हिंदी, तमिल, बंगाली, गुजराती, तेलुगु का पर्याप्त डेटा नहीं है। कबीर जैसे हमारे महान सूफी-संतों, कवियों, हमारे अध्यात्म, कला, मंदिर और समृद्ध संस्कृति का डेटा वैश्विक एल्गोरिदम में गायब है। अगर आपके पास अपना डेटा और अपना लॉजिक नहीं है, तो आप वैचारिक रूप से भी दूसरों के गुलाम बन जाएंगे।”

 उम्मीद की किरण: भारतीय जनता की समझदारी

इतने निराशाजनक माहौल और संस्थाओं के पतन के बीच भी सैम पित्रोदा भारत के भविष्य को लेकर आशान्वित (Optimistic) हैं। जब हमने उनसे पूछा कि मीडिया, न्यायपालिका और चुनाव आयोग के इस मौजूदा रवैये के बीच वे इतने सकारात्मक कैसे रह लेते हैं, तो उन्होंने बेहद भावुक जवाब दिया:

 “मैं इसलिए आशान्वित हूँ क्योंकि भारत के गांवों में, यहाँ के शिक्षकों, महिलाओं, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और आम नागरिकों में गजब की बुद्धिमानी और टैलेंट है। भले ही आज बुरे लोगों का कब्जा दिख रहा हो या उनकी आवाज ज्यादा तेज हो, लेकिन अंततः भारत की जनता खड़ी होगी, अपनी आवाज उठाएगी और इस लोकतंत्र को बचाएगी।”

राम दत्त त्रिपाठी
राम दत्त त्रिपाठी

लेखक : राम दत्त त्रिपाठी भारत के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं जिनका पत्रकारिता में पाँच  दशकों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में 21 वर्षों तक कार्य किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के वे प्रत्यक्षदर्शी  गंगा रिवर बेसिन में प्रदूषण पर उनका लेखन 1988 से जारी है। अब वे स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं। वे आपातकाल में जेल में थे और उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ जर्मनी के गोटिंगेन विश्वविद्यालय में ‘आरडी त्रिपाठी पेपर्स’ के रूप में सुरक्षित हैं।

 यहाँ देखें सैम पित्रोदा से राम दत्त त्रिपाठी की बातचीत का पूरा वीडियो इंटरव्यू:

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