AI और रोजगार का संकट: क्या भारतीय मजदूर खुद ही अपनी कब्र खोद रहे हैं?

राम दत्त त्रिपाठी 

हमने सुना था कि  दो ढाई सौ साल पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों ने भारत के कपड़ा बुनकरों को अपने हाथ के अँगूठे काटने को मजबूर किया था ताकि वे अपने कारख़ानों में बना कपड़ा भारत में खपा सकें। पिछले दिनों मीडिया में कुछ ऐसी ही विचलित करने वाली ख़बरें आई हैं जिनसे पता चलता है कि अमेरिका की चंद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI  कंपनियां भारत के कारीगरों के कामकाज से ऐसा डेटा एकत्र रही हैं, जिनसे आगे चलकर रोबोट मशीनें उनका काम  करेंगी. आगे चलकर वही वर्कर बेरोजगार हो जायेंगे, यानी ये वर्कर अपनी ही क़ब्र खोद रहे हैं. 

जिस ‘मसल मेमोरी’ (शारीरिक कौशल और अनुभव) को हासिल करने में एक कारीगर को सालों लग जाते हैं, उसे अब डिजिटल कैमरों के जरिए चुपचाप रिकॉर्ड करके  रोबोटिक्स कंपनियों को बेचा जा रहा है। 

नागपुर और तमिलनाडु से ग्राउंड रिपोर्ट

अंग्रेजी दैनिक The Indian Express की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नागपुर के मशीन तकनीशियनों और तमिलनाडु के कपड़ा मिल श्रमिकों को ड्यूटी के दौरान  शरीर पर कैमरे (Body Cams), स्मार्ट ग्लास या सिर पर रिकॉर्डिंग डिवाइस पहनने को कहा गया।

कर्मचारियों को बताया गया कि यह सब सिर्फ ‘कार्यकुशलता बढ़ाने’ और ‘ऑपरेशन्स की निगरानी’ के लिए है। लेकिन असलियत में ये उपकरण श्रमिकों के ‘इगोसेंट्रिक डेटा’ (Egocentric Data) रिकॉर्ड कर रहे हैं। एक्सप्रेस की रिपोर्ट में नागपुर के एक बेबस तकनीशियन का बयान इस पूरी त्रासदी को बयां करता है:

“मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अपनी ही कब्र खोदने का काम कर रहा हूँ। हम जो डेटा दे रहे हैं, वह कल को हमारी ही छुट्टी कर देगा।”

Nagpur Factory women wearing glasses to teach their skills to robots

कैमरा लगाने वाली कंपनी किशोर  उद्यमियों की है। डेटा अमेरिका जाता है। मुनाफ़ा Silicon Valley को। नुकसान — नागपुर और इचलकरंजी के मज़दूरों को।

Tamil Nadu की तस्वीर में सब महिलाएँ हैं। भारत के textile sector में करोड़ों महिलाएँ काम करती हैं। यह उनकी रोज़ी का सवाल है।

 IT सेक्टर भी खतरे में

Infosys और Wipro जैसी IT कंपनियों के कर्मचारी जो workflow optimize करते हैं, वे दरअसल अपने उत्तराधिकारी AI agents को सिखा रहे हैं — जो 24 घंटे, 7 दिन काम करेंगे। 

महाराष्ट् के इचलकरंजी सत Ken India टेक्सटाइल फक्टरी में मार्च 2026 में ऐसे ही उपकरण इस्तेमाल हुए। इस डेटा  को इकट्ठा करने वाली कंपनी का नाम है Egolab.AI — जसे महाराष्ट्र के दो युवकों  ने जनवरी 2026 में बनाया। यह कंपनी खुद को “India’s largest first-person POV Data Aggregator” कहती है। यह डेटा Tesla, Boston Dynamics और Figure AI जसी कंपनियों को बेचा जाता है। बाद में इसे एक अमेरिकी कंपनी Build AI ने खरीद लिया — जिसके मालिक अमेरिकी हैं। 

 गुरुग्राम से लेकर ग्लोबल हब तक

यह संकट सिर्फ नागपुर या तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल ‘CNN’ और ग्लोबल लेबर वॉचडॉग्स ने गुरुग्राम की एक प्रमुख कपड़ा निर्यातक कंपनी ‘पर्ल ग्लोबल इंडस्ट्रीज’ (Pearl Global Industries) का एक वीडियो जारी किया, जिसमें दर्जनों दर्जी सिर पर कैमरे वाली सफेद पट्टियाँ बांधकर सिलाई मशीन चलाते दिखे।इस तरह के अनेक वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध हैं. 

इस समय दुनिया भर की AI लैब्स ‘ह्यूमनॉइड रोबोट्स’ बनाने में जुटी हैं। इसके लिए करोड़ों घंटों का ‘फर्स्ट-पर्सन’ वीडियो डेटा चाहिए। भारत में श्रम सस्ता है और नियम ढीले, इसलिए वैश्विक टेक कंपनियों के लिए भारतीय कारखाने डेटा निकालने की सबसे सस्ती प्रयोगशाला बन गए हैं।

Scale AI और Encord जैसी कंपनियाँ दुनियाभर में लोगों को घर पर रोबोट के लिए डेटा रिकॉर्ड करने के लिए भर्ती कर रही हैं। DoorDash अपने डिलीवरी ड्राइवरों को घर का काम सीखने के लिए पैसे दे रहा है — ताकि रबोट घरेलू काम सीख सकें। 

ह्वाइट कॉलर’ नौकरियां भी निशाने पर

‘एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू’ (MIT Technology Review) की एक  रिपोर्ट बताती है कि यही तरीका अब चीन और सिलिकॉन वेली में वाइट कॉलर प्रोफेशनल्स (सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा एनालिस्ट, कंटेंट क्रिएटर्स) के साथ भी अपनाया जा रहा है। कंपनियों में कर्मचारियों से उनके काम का एक-एक स्टेप ‘ओपनक्लॉ’ (OpenClaw) जैसे AI एजेंट्स में लॉग कराया जा रहा है, ताकि उनकी जगह पूरी तरह ऑटोमेटेड सिस्टम सॉफ्टवेयर ले सकें।

सीबीएस न्यूज'(CBS News) की एक आर्थिक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मर्कर’ (Mercor) जैसे प्लेटफॉर्म्स दुनिया भर के बेरोजगार या कम वेतन वाले विशेषज्ञों को 2 से 4 डॉलर प्रति घंटे की दर पर ‘डेटा एनोटेटर्स’ और ‘AI ट्रेनर्स’ के रूप में रख रहे हैं। वे अपनी बुद्धि और विशेषज्ञता को औने-पौने दामों में बेच रहे हैं, जिससे बनने वाले अरबों-खरबों के AI मॉडल्स का मालिकाना हक चुनिंदा वैश्विक टेक दिग्गजों की तिजोरियों में बंद हो रहा है।

‘स्क्रोल.इन’ की खोजी पड़ताल

वेबसाइट ‘स्क्रोल.इन’ (Scroll.in) की पड़ताल के मुताबिक, इस पूरे खेल के पीछे कुछ मध्यस्थ टेक स्टार्टअप्स (Data Aggregators) काम कर रहे हैं, जैसे महाराष्ट्र का ‘Egolab.AI’।

Camera headset on Factory workers

ये स्टार्टअप्स सीधे फैक्ट्री मालिकों के पास जाते हैं और उन्हें लालच देते हैं कि वे AI टूल्स के जरिए उनकी फैक्ट्री की ‘लेबर एफिशिएंसी रिपोर्ट’ मुफ्त में तैयार करके देंगे। बदले में, फैक्ट्री मालिक इन स्टार्टअप्स को अपने मजदूरों के सिर पर 32GB मेमोरी कार्ड वाले कैमरे बांधने की इजाजत दे देते हैं।

‘स्क्रोल’ की रिपोर्ट भारत के ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023’ की कमियों पर भी गंभीर सवाल उठाती है। कानून के बावजूद, जिन मजदूरों का शारीरिक कौशल डेटा के रूप में चुराया जा रहा है, उन्हें भनक तक नहीं है कि उनका यह डेटा कहाँ जा रहा है और न ही उनकी कोई वास्तविक या कानूनी सहमति (Informed Consent) ली जा रही है।

क्या है ‘इगोसेंट्रिक डेटा’ 

इस खेल में जिस ‘इगोसेंट्रिक डेटा’ (Egocentric Data) को इकट्ठा किया जा रहा है इसे ‘फर्स्ट-पर्सन पॉइंट ऑफ व्यू’ (POV) डेटा कहा जाता है।जब किसी मजदूर के सिर या चश्मे पर यह कैमरा लगाया जाता है, तो यह हूबहू वही देखता है जो मजदूर की आँखें देख रही होती हैं। 

 मसल मेमोरी (Muscle Memory) 

 एक अनुभवी कारीगर को यह सीखने में सालों लग जाते हैं कि किसी नाजुक धागे को टूटने से बचाने के लिए उंगलियों को किस कोण (angle) पर मोड़ना है, या किसी मशीन के पुर्जे को कितना दबाव देकर कसना है। कैमरा इस ‘अदृश्य हुनर’ और शारीरिक अनुभव को डिजिटल कोड में बदल देता है।

रोबोट का ‘दिमाग’ तैयार करना 

कंपनियाँ जो ‘ह्यूमनॉइड रोबोट्स’ (इंसान जैसे रोबोट) बना रही हैं, उन्हें ट्रेन करने के लिए इसी डेटा की जरूरत होती है। इसे तकनीकी भाषा में विज़न-लैंग्वेज-एक्शन (VLA) मॉडल्स कहते हैं। इसके जरिए रोबोट को सिखाया जाता है कि इंसान की तरह हाथों की नजाकत और सटीकता से काम कैसे किया जाए।

तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञ इसे सिर्फ डेटा की रिकॉर्डिंग नहीं मान रहे हैं। यह एक जीते-जागते मजदूर के जीवनभर की कमाई—उसका कौशल और उसका अनुभव —उससे  छीनकर एक सॉफ्टवेयर में कैद कर देने जैसा है, ताकि कल उसकी जरूरत ही खत्म की जा सके।

 ‘डिजिटल गुलामी’ और रोजगार विहीन विकास का खतरा

इन तमाम रिपोर्टों को मिलाकर देखें तो एक बेहद डरावनी तस्वीर उभरती है। जिस देश में रोजगार का संकट पहले से ही गहरा है, वहाँ तकनीक के नाम पर इंसानी हुनर और आजीविका का यह अनियंत्रित दोहन एक नए किस्म की ‘डिजिटल गुलामी’ की ओर इशारा करता है।

शारीरिक श्रम और दिमागी कौशल का डेटा देश से बाहर जा रहा है, जबकि देश के पास केवल ‘रोजगार विहीन विकास’ (Jobless Development) और बेरोजगारों की एक बड़ी फौज बच रही है।वह दिन दूर नहीं जब भारत के करोड़ों कामगार सचमुच तकनीक के इस कॉर्पोरेट जाल में अपनी आजीविका खो बैठेंगे।

मशीनें अब केवल आदेश नहीं मान रहीं, सीख भी रही हैं

औद्योगिक क्रांति के समय मशीनें मनुष्य की शारीरिक शक्ति का विस्तार थीं। कंप्यूटर युग में मशीनों ने गणना और सूचना प्रसंस्करण का काम संभाला। अब AI के युग में मशीनें मनुष्य के अनुभव, कौशल और निर्णय क्षमता को सीखने की कोशिश कर रही हैं।

एक अनुभवी बुनकर या मशीन ऑपरेटर वर्षों के अभ्यास से अनेक ऐसी बारीकियां सीखता है जिन्हें शब्दों में समझाना कठिन होता है। मशीन की आवाज सुनकर समस्या पहचानना, धागे के तनाव को महसूस करना, अचानक आई खराबी पर तत्काल प्रतिक्रिया देना—ये सब “टैसिट नॉलेज” (Tacit Knowledge) यानी अव्यक्त ज्ञान के उदाहरण हैं।

आज AI कंपनियाँ इसी अव्यक्त ज्ञान को डेटा में बदलने का प्रयास कर रही हैं।

डेटा का नया स्रोत: मनुष्य का अनुभव

सोशल मीडिया पर हमारी पसंद-नापसंद, मोबाइल फोन से हमारी गतिविधियाँ, और अब कारखानों में हमारे कौशल—सब कुछ डेटा में बदल रहा है। यह डेटा AI को प्रशिक्षित करता है और आगे चलकर आर्थिक मूल्य पैदा करता है।

प्रश्न यह है कि इस डेटा का मालिक कौन है। 

वह कंपनी जो डेटा एकत्र करती है? वह निवेशक जिसने AI मॉडल बनाया? या वह मजदूर जिसका अनुभव और कौशल इस पूरी प्रक्रिया की बुनियाद है?

काम के साथ ज्ञान का हस्तांतरण

पारंपरिक अर्थव्यवस्था में मजदूर अपना श्रम बेचता था। आज वह अनजाने में अपना ज्ञान भी दे रहा है।जब एक कामगार कैमरा पहनकर अपना काम करता है, तो वह केवल उत्पादन नहीं कर रहा होता। वह मशीन को सिखा भी रहा होता है कि यह काम कैसे किया जाए।

इतिहास में पहली बार बड़ी संख्या में लोग ऐसी तकनीकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं जो भविष्य में उन्हीं की आवश्यकता कम कर सकती हैं।यही कारण है कि कुछ श्रमिकों को यह प्रक्रिया असहज और भयावह लगती है।

पहली बार तकनीक केवल मांसपेशियों का नहीं, बल्कि मानवीय बुद्धि और अनुभव का भी विकल्प बनने की कोशिश कर रही है। इसलिए परिवर्तन की गति और दायरा दोनों अधिक व्यापक हो सकते हैं।

गांधी की चेतावनी और आज की चुनौती

महात्मा गांधी ऐसी तकनीक के विरोधी थे जो मनुष्य को अनावश्यक बना दे या आर्थिक शक्ति को कुछ हाथों में केंद्रित कर दे।उनका प्रश्न था—तकनीक किसके लिए और किस उद्देश्य से?

यदि AI उत्पादकता बढ़ाए, श्रमिक का श्रम कम करे और उसका जीवन बेहतर बनाए, तो उसका स्वागत किया जा सकता है। लेकिन यदि वही तकनीक करोड़ों लोगों को असुरक्षा और बेरोजगारी की ओर धकेल दे, तो समाज को उसके परिणामों पर विचार करना चाहिए ।

यदि मशीनें अधिकांश काम करने लगें और लोगों की आय घट जाए, तो उत्पादन तो बढ़ सकता है, लेकिन उपभोग कौन करेगा? इसीलिए भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में  mass production के बजाय  production by masses की बात कही जाती है। आज भारत, चीन, वियतनाम या अन्य  देशों में बड़े पैमाने पर सामान का उत्पादन किया जा रहा है. माल इधर से उधर ले जाने के लिए चारों तरफ़ एक्सप्रेसवे बनाए जा रहे हैं. ऑनलाइयाँ ख़रीद के लिए गांव – गांव ऑप्टिकल फाइबर बिछाया जा रहा है.लेकिन जब लोग बेरोजगार होंगे और उनकी जेब में पैसा नहीं होगा तो वह माल कौन ख़रीदेगा?  

लोकतंत्र के सामने चुनौती

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रश्न केवल रोजगार खात्मे का प्रश्न नहीं है।यह शक्ति, स्वामित्व और लोकतंत्र का भी प्रश्न है।

  • इस अनुभव जनित डेटा का स्वामित्व किसके पास होगा?
  • AI की मदद  और रोबोट्स से पैदा किए माल के लाभ का वितरण कैसे होगा?
  • श्रमिकों को उनके योगदान का हिस्सा मिलेगा या नहीं? क्या इसकी चिंता भी है? 
  • क्या AI और रोबोट्स विकास के नियम लोकतांत्रिक तरीके से तय होंगे? या चंद टेक कंपनियों के मालिक तय करेंगे।

प्रश्न यह है कि AI के युग में मनुष्य, श्रम और गरिमा की रक्षा के लिए हम कौन-से सामाजिक , कानूनी  और राजनीतिक ढाँचे विकसित करते हैं।

कुछ समय पहले टेक गुरु सैम पित्रोदा ने मीडिया स्वराज के यूट्यूब  चैनल @Mediaswarajnews इंटरव्यू में आगाह किया था कि कैसे मुट्ठी भर टेक कंपनियाँ दुनिया भर के संसाधनों और डेटा पर कब्ज़ा करके  ‘डिजिटल गुलामी’ की शुरुआत कर रही हैं.

यह नागपुर वाला मामला उसका सजीव और डरावना उदाहरण है। वहाँ डेटा सेंटर और एल्गोरिदम की बात थी, और यहाँ जमीन पर एक गरीब मजदूर की ‘मसल मेमोरी’ और शारीरिक हुनर को सीधे रिकार्ड करके विदेशी कंपनियों को बेंचा जा रहा है।

लेकिन क्या यह प्रश्न हमारे सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बनेगा। क्या भारत की संसद इस विषय पर विचार करेगी? क्या राजनीतिक दलों में इन सवालों पर कोई चिंतन हो रहा है. और क्या न्यायपालिका देश के नागरिकों और युवाओं के भविष्य और अधिकारों की रक्षा करेगी या वह केवल  बेरोजगार युवकों को आलसी काकरोच बताकर केवल उन्हें अपमानित ही करेगी? 

लेखक : राम दत्त त्रिपाठी भारत के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं जिनका पत्रकारिता में पाँच  दशकों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में 21 वर्षों तक कार्य किया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के वे प्रत्यक्षदर्शी  गंगा रिवर बेसिन में प्रदूषण पर उनका लेखन 1988 से जारी है। अब वे स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं। वे आपातकाल में जेल में थे और उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ जर्मनी के गोटिंगेन विश्वविद्यालय में ‘आरडी त्रिपाठी पेपर्स’ के रूप में सुरक्षित हैं।

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