सरपंचों ने बदल दी गाँव की तस्वीर

दिनेश कुमार गर्ग। सरपंचों को बदलाव करते देखे हैं आपने?

आपराधिक तत्वों, स्वार्थी-संकीर्ण मनोवृत्ति के लोगों के आने से राजनीति बिजनेस नहीं बल्कि सेवा है, यह अब भूली-बिसरी बात हो चली है।

राजनीति में गांधी, बिनोबा, जेपी का युग बीते दिनों की बात हो गयी है।

बाहुबलियों और बिना किसी दृष्टि के जमीन से कटे हुए संकीर्ण-स्वार्थी तत्वों को जनप्रतिनिधि के रूप में प्रकट होते देख हम विवशता के आंसू बहाते रहे हैं।

पर समय करवट लेता है और अब सरपंचों के स्तर पर यत्र-तत्र ऐसे लोग दिखने लगे हैं जो सेवा और सिर्फ सेवा को ही राजनीति का उद्देश्य मानते हैं।

इस संबन्ध में दो उदाहरण यह बताने को काफी हैं कि हवा अब बदलने लगी है। 

हरियाणा के कैथल जिले की ग्राम पंचायत ककराला कुचिया और उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के हंसुरी औसानपुर ग्राम पंचायत का नाम सर्वप्रमुख है।

कैथल के ककराला कुचिया की सरपंच प्रवीण कौर

ककराला-कुचिया पंचायत दो गांवों से मिलकर बनी है। इस पंचायत में करीब 1200 लोग रहते हैं।

भ्रष्ट सरपंचों से ऊबे ग्रामवासियों ने तय किया था कि उसी को ग्राम का सरपंच बनायेंगे जो पढा़-लिखा होगा।

तो ग्रामवासियों ने अशिक्षित सरपंचों की बजाय इंजीनियर डिग्रीधारी प्रवीण कौर को चुना। 

ग्रामीण अशिक्षित समाज के बीच की महिला होते हुए भी प्रवीण ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी।

प्रवीण कौर हरियाणा की सबसे कम उम्र की सरपंच हैं जिन्हें 2017 में वीमेंस डे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  सम्मानित किया। 

इस बेटी प्रवीण कौर  ने सरपंच बनने के बाद  गांव की तस्वीर बदल दी।

अब यहां गली-गली में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, सोलर लाइट्स हैं, वाटर कूलर है, लाइब्रेरी है।

इतना ही नहीं, इस ग्राम पंचायत के बच्चे हिंदी, अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत भी बोलते हैं।

प्रवीण कौर ने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग  की, लेकिन किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने की बजाय गांव के लिए काम करने का फैसला लिया।

2016 में जब वह सरपंच बनीं थीं, तब उनकी उम्र महज 21 साल थी।

प्रवीण कहती हैं कि मैं शहर में जरूर पली-बढ़ी हूं, लेकिन गांव से मेरा लगाव शुरू से रहा है।

बचपन में जब मैं गांव आती थी, तब यहां सड़कें नहीं थीं, अच्छे स्कूल नहीं थे।

पीने के लिए पानी की भी दिक्कत थी। गांव की महिलाओं को दूर से पानी भरकर लाना पड़ता था।

इन दिक्कतों को देखकर मैंने उसी समय तय कर लिया था कि पढ़-लिखकर कुछ बनूंगी, तो गांव के लिए जरूर काम करूंगी।

साल 2016 की बात है। तब मैं इंजीनियरिंग कर रही थी।

गांव के कुछ लोग पापा से मिलने आए और मुझे सरपंच बनाने का प्रस्ताव रखा।

तब सरकार ने यह नियम बना दिया था कि पढ़े-लिखे लोग ही सरपंच बनेंगे और मेरे गांव में कोई और पढ़ा-लिखा नहीं था। 

महिलाओं की समस्याओं के लिए अलग समिति

सरपंच बनने के बाद मैंने गांव में घूमना शुरू किया, लोगों से मिलना और उनकी दिक्कतों को समझना शुरू किया।

कुछ दिन बाद मैंने मोटे तौर पर एक लिस्ट तैयार कर ली कि मुझे क्या-क्या करना है।

सबसे पहले मैंने सड़कें ठीक करवाईं, लोगों को पानी की दिक्कत न हो, इसलिए जगह- जगह वाटर कूलर लगवाया।

प्रवीण बतातीं हैं कि जब मैं सरपंच बनी थी, तब गांव की महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी।

प्रवीण के साथ 4 और महिलाएं उनके काम में सहयोग करती हैं।

उन्होंने महिलाओं के लिए अलग से एक कमेटी भी बनाई है, जिसमें गांव की महिलाएं अपनी समस्याँ रखती हैं।

ज्यादातर लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं, उनके लिए सुरक्षा बड़ा इश्यू था।

उन्हें डर लगता था कि कहीं उनके साथ कोई गलत काम न कर दे।

इसलिए मैंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए गांव में सीसीटीवी कैमरे लगवाए।

बिजली थी, लेकिन बहुत कम समय के लिए आती थी। तो मैंने सोलर लाइट की व्यवस्था की।

अब महिलाएं और लड़कियां बिना किसी डर के कहीं भी जा सकती हैं, रात में भी और दिन में भी।

शिक्षा पर दिया ध्यान

पहले गांव में 10वीं तक स्कूल था, अब अपग्रेड होकर 12वीं तक हो गया है।

इस पंचायत की सबसे बड़ी खूबी है कि यहां के बच्चे संस्कृत बोलते हैं, छोटे-बड़े सभी। 

प्रवीण बताती हैं कि हमने इसकी शुरुआत इसी साल फरवरी में की।

तब महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति हमारे गांव आए थे।

उन्होंने कहा कि हम आपके गांव को संस्कृत ग्राम बनाना चाहते हैं।

मैंने कहा कि इससे अच्छी क्या बात होगी, फिर संस्कृत के टीचर रखे गए और पढ़ाई शुरू हो गई।

अगले साल पंचायत का चुनाव होना है।

हमने जब उनके फिर से चुनाव लड़ने को लेकर सवाल किया, तो उन्होंने कहा कि अब मैं चाहती हूं कि दूसरे किसी योग्य युवा को मौका मिले।

एक ही व्यक्ति को बार- बार मौका मिलना ठीक नहीं है।

मैं बदलाव का इरादा करके आई थी और मुझे खुशी है कि काफी हद तक इसमें सफल रही।

प्रवीण ने पूर्व सरपंचों को बता दिया कि काम कैसे होता है।

सिद्धार्थनगर के हंसुरी औसानपुर गाँव के प्रधान दिलीप त्रिपाठी

यही कहानी उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के ग्राम हंसुरी औसानपुर का है।

वहां के निवासी दिलीप त्रिपाठी की मां को सांप ने काट लिया।

तब गांव से शहर तक इलाज के लिए ले जाने को एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती थी, क्योंकि सड़क नहीं थी। इस कारण मां मर गयीं।

अस्पताल नहीं, सड़क नहीं, शिक्षक नहीं, सार्वजनिक मार्ग अतिक्रमण के कारण खेत बने।

विकास का पैसा नाली, सड़क, खडंजा, पेयजल की बजाय कहीं और जा रहा था।

दिलीप त्रिपाठी गांव से बाहर जनपद मुख्यालय में सोलर लाइट का बिजनेस कर रहे थे।

उन्होंने तय किया कि गांव को भ्रष्ट प्रधानों से मुक्त कराना है।

इसके लिए उन्होंने प्रधानी का चुनाव लडा़, जीता और गांव का कायाकल्प कर दिया।

आज उनका गांव सड़क, पुल से जुडा़ है, स्ट्रीट लाइट लगी है, प्राइमरी स्कूल भवन पूरी तरह एयर कण्डीशण्ड है।

नाली, खड़ंजे  से गांव  सुसज्जित हो चुका है। गांव में सीसीटीवी कैमरे और पब्लिक एड्रेस सिस्टम लग गया है।

मन्दिर व चकरोड अब कब्जा मुक्त हो चुके हैं। गांव को अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं।

दिलीप त्रिपाठी को मुख्ममंत्री से सम्मान, प्रधानमंत्री से सम्मान सहित मालदीव में उत्कृष्ट जन प्रतिनिधि का सम्मान प्राप्त हो चुका है।

अब उनका नाम पद्मश्री के सम्मान के लिए प्रस्तावित करने की चर्चा चल रही है।

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