स्वधर्म
स्वधर्म पालन अत्यंत आवश्यक
संत विनोबा गीता प्रवचन में कहते हैं कि भाइयो, पिछले अध्याय में हमने निष्काम कर्मयोग का विवेचन किया। स्वधर्म को…
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अध्यात्म

कर्म वही, परंतु भावना-भेद से आता है अँतर
संत विनोबा गीता प्रवचन करते हुए कहते हैं कि कर्म वही, परंतु भावना-भेद से उसमें अंतर पड़ जाता है। परमार्थी…
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अध्यात्म

संकुचित देह-बुद्धि स्वधर्म में बाधक
स्वधर्म हमें इतना सहज प्राप्त है कि हमसे अपने-आप उसका पालन होना चाहिए। परंतु अनेक प्रकार के मोहों के कारण…
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अध्यात्म

स्वधर्म के सहारे ही उन्नति की राह
*गीता प्रवचन दूसरा अध्याय* विनोबा का गीता प्रवचन प्रस्तुति : रमेश भैया स्वधर्म के सिलसिले में उपनिषद् में एक सुंदर…
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