संकुचित देह-बुद्धि स्वधर्म में बाधक

गीता प्रवचन दूसरा अध्याय

संकुचित

स्वधर्म हमें इतना सहज प्राप्त है कि हमसे अपने-आप उसका पालन होना चाहिए।

परंतु अनेक प्रकार के मोहों के कारण ऐसा नहीं होता, अथवा बड़ी कठिनाई से होता है और हुआ भी, तो उसमें विष – अनेक प्रकार के दोष –मिल जाते हैं।

स्वधर्म के मार्ग में काँटे बिखरने वाले मोहों के बाहरी रूपों की तो कोई गिनती ही नहीं है।

फिर भी जब हम उनकी छानबीन करते हैं, तो उन सब के तह में एक मुख्य बात दिखायी देती है – संकुचित और छिछली देह-बुद्धि।

मैं और मेरे शरीरसे संबंध रखने वाले व्यक्ति, बस इतनी ही मेरी व्याप्ति – फैलाव है; इस दायरे के बाहर जो हैं, वे सब मेरे लिए गैर अथवा दुश्मन है –भेद की ऐसी दीवार यह देह-बुद्धि खडी कर देती है।

और तारीफ यह है कि जिन्हें मैंने ‘मैं’ अथवा ‘मेरे’ मान लिया, उनके भी केवल शरीर ही वह देखती है।

देह-बुद्धि के इस दुहरे पेच में पड़कर हम तरह-तरह के छोटे डबरे बनाने लगते हैं।

प्राय: सब लोग इसी कार्यक्रम में लगे रहते है।  इनमें किसी का डबरा बड़ा, तो किसी का छोटा; परंतु है आखिर डबरा ही।

इस शरीर की चमड़ी के जितनी ही उसकी गहराई। कोई कुटुंबाभिमान का डबरा बनाकर रहता है, तो कोई देशाभिमान का।

ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर नामक एक डबरा, हिन्दू-मुसलमान नाम का दूसरा।

ऐसे एक-दो नहीं, अनेक डबरे बने हुए हैं। जिधर देखिये, उधर यह डबरे-ही-डबरे।

हमारी इस जेल में भी तो राजनैतिक कैदी और दूसरे कैदी, इस तरहके डबरे बने ही हैं, मानो इसके बिना हम जी ही नहीं सकते।

परंतु इस का नतीजा? यही कि जिन विचारों के कीड़ों की और रोगाणुओं की बाढ़ आती है और स्वधर्म रूपी आरोग्य का नाश होता है।

जीवन-सिद्धांत : देहातीत आत्मा का भान

ऐसी दशा में स्वधर्म निष्ठा अकेली पर्याय नहीं होती। उसके लिए दूसरे दो और सिद्धांत जागृत रखने पड़ते है।

एक तो यह कि मैं यह मरियल देह नहीं हूँ, देह तो केवल ऊपर की क्षुद्र पपड़ी है; और दूसरा यह कि मैं कभी न मरने वाली अखंड और व्यापक आत्मा हूँ।

इन दोनों को मिलाकर एक पूर्ण तत्त्वज्ञान होता है।

यह तत्त्वज्ञान गीता को इतना आवश्यक जान पड़ता है कि गीता उसी का पहले आवाहन करती है और स्वधर्म का अवतार बादमें करती है।

कुछ लोग पूछते हैं कि तत्त्वज्ञान संबंधी ये श्लोक प्रारंभ में ही क्यों?

परंतु मुझे लगता है कि गीता में यदि कोई श्लोक ऐसे है, जिनकी जगह बिलकुल नहीं बदली जा सकती, तो वे ये ही श्लोक हैं।

इतना तत्त्वज्ञान यदि मन में अंकित हो जाये, तो फिर स्वधर्म बिलकुल भारी नहीं पड़ेगा।

यही नहीं, स्वधर्म के अतिरिक्त और कुछ करना भारी मालूम पड़ेगा।

आत्मतत्त्व की अखंडता और देह की क्षुद्रता, इन बातों को समझ लेना कोई कठिन नहीं है; क्योंकि ये दोनों सत्य वस्तुएँ हैं।

परंतु हमें उनका विचार करना होगा। बार-बार मन में उनका मंथन करना होगा।

इस चाम के महत्त्व को घटाकर हमें आत्मा को महत्त्व देना सीखना होगा। *क्रमश*

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