भारत विभाजन और सरदार पटेल

मुसलमान और गांधी हत्या पर पटेल के विचार

15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वाधीन हुआ, तब भारत में 9 प्रांतों के अतिरिक्त 584 रियासतें थीं. इन 584 रियासतों में केवल हैदराबाद, कश्मीर और मैसूर यही तीन रियासतें थीं, जो आकार और आबादी के लिहाज से पृथक राज्यों का रूप धारण कर सकती थीं. अधिकांश रियासतें बहुत छोटी थीं और 202 रियासतें ऐसी थीं, जिनका क्षेत्रफल 10 वर्गमील से अधिक नहीं था. रियासतों का यह महकमा भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री श्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपा गया और दो वर्षों के भीतर ही उन्होंने संपूर्ण भारत को एक बना दिया.

डॉ.पुष्पेंद्र दुबे

आज देश में निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए हमारे तीन प्रमुख नेताओं महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल में वैचारिक मतभेदों को हवा देकर देश में ‘मनभेद’ फैलाने का कार्य किया जा रहा है. कभी-कभी यह जुमला भी दिया जाता है कि आजादी के बाद देश के प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल होते, तो देश का नक्शा कुछ और होता. एक तरह से सरदार वल्लभ भाई पटेल को गरम दल का सिपाही और सदैव नेहरू के विरोध में खड़े दिखाया जाता है. देश की आजादी के बाद से इस असत्य को अनेक बार दोहराया जाता रहा है कि भारत विभाजन के लिए महात्मा गांधी जिम्मेदार हैं.

प्रस्तुत आलेख में ‘भारत विभाजन, महात्मा गांधी, मुसलमान और गांधी हत्या पर सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचारों का प्रस्तुत किया गया है. सभी तथ्य भारत की एकता का निर्माण: सरदार वल्लभ भाई पटेल के 27 भाषण, पब्लिकेशंस डिविजन, ओल्ड सेक्रेटेरिएट, दिल्ली, लीडर प्रेस, इलाहबाद, प्रथम संस्करण नवंबर 1954 पुस्तक से लिए गए हैं.

भारत विभाजन और सरदार पटेल

भारत की आजादी के साथ ही उसका विभाजन भी हुआ. इसे दुनिया की सबसे त्रासद घटना के रूप में याद किया जाता है. अंग्रेजों ने इस देश को जितना हो सका नष्ट करने का भरसक प्रयत्न किया. उन्होंने हरेक स्तर पर विभेद की दीवारों को मजबूत किया. इसके लिए उन्होंने भारत की विविधता को हथियार बनाया. महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की चालों को बहुत गहराई से समझा था. इसलिए उन्होंने तुर्की के खलीफा को सत्ता सौंपने के लिए आंदोलन चलाया. उनका स्पष्ट मानना था कि बिना कौमी एकता स्थापित किए न तो भारत आजाद हो सकता है न इस क्षेत्र में शांति, सद्भाव कायम हो सकता है. इसलिए उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में कौमी एकता को पहले स्थान पर रखा.

जब भारत विभाजन की आहट गांधी जी को सुनाई दी, तब उन्होंने कहा था कि विभाजन मेरी लाश पर होगा, जबकि इसके पहले वे 125 साल जीवित रहने की इच्छा जाहिर कर चुके थे. जब गांधीजी बिहार में हिंदुओं और मुसलमानों के टूटे हुए दिलों को जोड़ने का प्रयत्न कर रहे थे तब उन्होंने पंजाब के विभाजन की मांग करने वाला कांग्रेस का प्रस्ताव अखबारों में देखा. उनसे इस विषय में न तो कोई सलाह ली गई थी और न कोई संकेत इस संबंध में पहले से उन्हें दिया गया था.

20 मार्च को गांधीजी ने नेहरू को लिखा, ‘‘मेरा खयाल है कि मुझे कार्यसमिति के प्रस्ताव के पीछे रहा कारण मालूम नहीं है. सरदार पटेल को उन्होंने लिखा, ‘‘मैं इस प्रस्ताव की भाषा समझ नहीं सकता.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 5)

20 मार्च को गांधीजी ने नेहरू को लिखा, ‘‘मेरा खयाल है कि मुझे कार्यसमिति के प्रस्ताव के पीछे रहा कारण मालूम नहीं है. सरदार पटेल को उन्होंने लिखा, ‘‘मैं इस प्रस्ताव की भाषा समझ नहीं सकता.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 5)

अप्रैल 1947 के पहले सप्ताह में दिल्ली पहुंचने के बाद गांधीजी ने एक पत्र में लिखा, ‘‘मुझे यहां आये 4 दिन हो गए, परंतु कुछ मिनट से अधिक मैं सरदार से नहीं मिल पाया हूं… कभी-कभी मुझे लगता है कि यहां सारी मंडली में शायद मैं ही ऐसा आदमी हूं, जिसके पास फुरसत का समय है.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 43)

पंजाब के विभाजन के प्रश्न को लेकर गांधी जी ने 20 मार्च 1947 को एक पत्र पं.नेहरू को लिखा तो उसी दिन दूसरा पत्र सरदार पटेल को भी लिखा. ‘‘हो सके तो आप मुझे अपना पंजाब-संबंधी प्रस्ताव समझाने की कोशिश कीजिए . मैं उसे समझ नहीं सकता.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 45)

इस पर सरदार पटेल ने जवाब दिया, ‘‘पंजाब-संबंधी प्रस्ताव आपको समझाना कठिन है. वह अत्यंत गहरे विचार-विमर्श के बाद पास किया गया है. जल्दबाजी में अथवा पूरे विचार के बिना कुछ भी नहीं किया गया है. हमें तो अखबारों से ही मालूम हुआ कि आपने ही उसके विरुद्ध अपने विचार प्रकट किए हैं. परंतु आपको जो ठीक लगे उसे कहने का अधिकार तो आपको है ही.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 45)

इसी प्रश्न को लेकर पं.नेहरू ने गांधी जी को लिखा, ‘‘पंजाब के विभाजन के बारे में हमारे प्रस्ताव की बात यह है कि वह हमारे पिछले निर्णयों का स्वाभाविक परिणाम है. पहले वे नकारात्मक हुआ करते थे, परंतु अब ठोस निर्णय का समय आ गया है… मेरा पक्का विश्वास है, और कार्यसमिति के अधिकांश सदस्यों का भी है कि हमें तुरंत इस विभाजन पर जोर देना चाहिए, ताकि वास्तविकता सामने आ जाए. असल में जिन्ना के मांगे हुए विभाजन का यही एकमात्र उत्तर है.’’ (पूर्णाहुति : प्यारेलाल: खण्ड तीन पृष्ठ 45)

गांधी जी पाकिस्तान की मांग के धुर विरोधी थे. उन्होंने जिन्ना को समझाने का अथक प्रयास सन् 1944 में किया था, किंतु वे इसमें असफल रहे. देश की आजादी के बाद सरदार पटेल ने भारतीय रियासतों के विलय का महान कार्य किया. इसके लिए उन्होंने देशभर में भ्रमण किया और सभाओं में भाषण दिए. इन भाषणों में उन्होंने भारत विभाजन का बार-बार उल्लेख किया. उनके कारणों को रेखांकित किया.

सरदार पटेल ने अपने भाषणों में बार-बार विभाजन का जिक्र करते समय ‘हम’ शब्द का प्रयोग किया है. भारत-विभाजन के लिए सरदार पटेल को कोई पश्चाताप नहीं है. बम्बई चौपाटी पर वे अपने भाषण में कहते हैं, ‘‘हमने हिंदुस्तान का टुकड़ा किया जाना कबूल कर लिया. कई लोग कहते हैं कि हमने ऐसा क्यों किया और यह गलती थी. मैं अभी तक नहीं मानता हूं कि हमने कोई गलती की और मैं यह भी मानता हूं कि यदि हमने हिंदुस्तान का टुकड़ा मंजूर नहीं किया होता, तो आज जो हालत है, उससे भी बुरी हालत होने वाली थी और हिंदुस्तान के दो टुकड़े नहीं बल्कि अनेक टुकड़े हो जाने वाले थे.’’(भारत की एकता का निर्माण: सरदार वल्लभ भाई पटेल के 27 भाषण, पब्लिकेशंस डिविजन, ओल्ड सेक्रेटेरिएट, दिल्ली, लीडर प्रेस, इलाहबाद, प्रथम संस्करण नवंबर 1954, पृष्ठ 53)

आगे वे कहते हैं कि, ‘‘लेकिन आप इतना विश्वास रखें कि जब मैंने और मेरे भाई पं.नेहरू (महात्मा गांधी नहीं) ने यह कबूल किया कि अच्छा ठीक है, यदि टुकड़ा जरूर करना है और इसके बिना मुसलमान नहीं मानते तो हम इसके लिए भी तैयार हैं. क्योंकि जब तक हम परदेशियों को न हटा दें, विदेशी हुकूमत न हटा दें, तब तक दिन-प्रतिदिन ऐसी हालत होती जाती थी कि हमें साफ तौर से दिखाई दिया कि हमारे हाथ में हिंदुस्तान का भविष्य नहीं रहेगा और परिस्थिति काबू से बाहर चली जाएगी. इसलिए हमने सोचा कि अभी तो दो टुकड़े करने से काम ठीक हो जाता है तो वैसा ही कर लो. हमने मान लिया कि ठीक है, अपना अलग घर ले कर अगर यह भाई शांत हो जाता है और अपना घर संभाल लेता है तो हम अपना घर संभाल लेंगे. टुकड़ा करने में हमारी गलती हुई, यह मैं नहीं कहता, लेकिन गलती इसमें हुई कि न करने का काम टुकड़ा करने के बाद हम लोगों ने किया.’’ (वही पृष्ठ 53)

सरदार पटेल अपने दूसरे भाषण में फिर विभाजन की बात को अलग ढंग से कहते हैं. इम्पीरियल होटल नई दिल्ली में उन्होंने सभा में कहा, ‘‘अब हमारे मुल्क का दो टुकड़ा हो गया है. अगर हमारे दिल में कोई चोरी होती, कोई अंदेशा होता या हमारी नीयत ठीक न होती, तो हम कभी वह चीज कबूल न करते. अब राजी-खुशी से हमने उसे कबूल किया …यदि हम यह चीज कबूल न करें तो मुल्क का दो टुकड़ा तो क्या सैकड़ों टुकड़ा होने वाला है. इस बात को कबूल करने का मुझे कोई पश्चाताप नहीं है.’’ (वही पृष्ठ 27)

3 जनवरी 1948 को सरदार पटेल ने कलकत्ता में कहा, ‘‘पंद्रह अगस्त के बाद दोनों देशों में जो काम हुआ है, वह इस प्रकार का काम हुआ है कि उससे दुनिया के सामने सिर झुकाना पड़ा, हमको शर्मिंदा होना पड़ा.’’9 (वही पृष्ठ 11)

भारत विभाजन के कारणों को सही ठहराने के लिए सरदार पटेल आगे कहते हैं, ‘‘हमने आज देश का दो टुकड़ा न किया होता, तो हिंदुस्तान का टुकड़ा-टुकड़ा हो जाने वाला था. पाकिस्तान तो हुआ, उससे भी बुरा राजस्थान हो जाने वाला था.’’ (वही पृष्ठ 27)

16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में डायरेक्ट एक्शन डे रखा गया था. तब कहा गया था कि सीधी चोट लगाएंगे. कोई काम नहीं करेंगे, जब तक हिंदुस्तान के टुकड़े न हो जाएं. इसका हवाला देते हुए सरदार पटेल ने 18 जनवरी 1948 को लखनऊ में कहा, ‘‘तब हमने सोचा कि इस तरह से सारे मुल्क का हाल हो जाए, उससे अच्छा है कि अलग कर दो. वह अपना घर संभालें और हम अपना संभाल लें. हमने सोच लिया कि अगर यही हाल रहा तो जो परदेसी हुकूमत हमारे बीच में पड़ी है, वह हटने वाली नहीं है. हमारा जिंदगी का काम ही यही था कि जिस किसी तरह से परदेसियों की हुकूमत को इधर से हटा दें, पीछे देखेंगे क्या होता है. तो हमने कबूल कर लिया कि ठीक है भाई, आप अलग अपना हिस्सा ले हो.’’ (वही पृष्ठ 31)

आगे वे कहते हैं कि, ‘‘ हम दिल से राजी नहीं थे. लेकिन हम समझ गए कि हिस्सा-बांट चाहे कितनी बुरी हो, लेकिन जब उनको समझाना मुश्किल है, तो उनको लेने दो. सो हमने दे दिया.’’ (वही पृष्ठ 31)

सरदार पटेल ने मुम्बई चौपाटी पर दिए अपने भाषण में भारत-विभाजन पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा, ‘‘जब मैंने हिंदुस्तान के दो टुकड़े मंजूर किए तब मेरा दिल दर्द से भरा हुआ था और मेरे साथियों की भी यही हालत थी. हम लोगों ने राजी-खुशी से इस चीज को स्वीकार नहीं किया. हमने लाचारी से इसे कबूल किया. हम चाहते थे कि हम जब साथ नहीं रह सकते, तो अलग ही हो जाना ठीक है. और हमने यह भी देखा कि अगर आज अलग नहीं होंगे तो हिंदुस्तान के दो टुकड़े तो क्या टुकड़े-टुकड़े होने जा रहे हैं, जिसका परिणाम बहुत बुरा होगा.’’ (वही 156)

भले ही आज हम इस बात की चर्चा करते हों कि भारत-पाकिस्तान के लोग तो मिलना चाहते हैं, परंतु राजनीतिज्ञ और राजनीति इसमें बाधा बनी हुई है. भारत विभाजन का आघात महात्मा गांधी को लगा था. उन्होंने जीवनभर हिंदू-मुसलमान की एकता के प्रयास किए और इसीमें अपना प्राणांत किया. लेकिन विभाजन की बात पर सरदार पटेल को कोई ग्लानि नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘इसलिए आज भी जबकि मैंने यह विभाजन स्वीकार किया था, उस समय का ख्याल करता हूं तो मेरे दिल में कोई पश्चाताप नहीं होता. पहले मेरा ख्याल कभी यह टुकड़े मंजूर करने का नहीं था. लेकिन गवर्नमेंट में आने के बाद जब मैंने तजुर्बा किया तो समझ आया कि अगर यही हालत रहे तो जिस तरह जो चीज है, वैसी ही चलती जाएगी, और हमारे साथ कुछ भी नहीं रहेगा. तब हमने सोच-विचारकर यह काम किया कि पाकिस्तान के नेता लोग ही जिस पाकिस्तान को चूहों का खाया हुआ पाकिस्तान कहते थे, उसी पाकिस्तान को हमने मंजूर कर लिया.’’ (वही पृष्ठ 157)

विभाजन का सबसे ज्यादा बोझ तो महात्मा गांधी पर आया. पं.नेहरू को कुछ हद जिम्मेदार बताया जाता है और सरदार पटेल को विभाजन से बरी कर दिया जाता है.

एक बार विभाजन का फैसला हो जाने के बाद लोगों ने उस पर टीका-टिप्पणी करना शुरू कर दी. विभाजन के लिए जिस-तिस को जिम्मेदार बताया जाने लगा. विभाजन का सबसे ज्यादा बोझ तो महात्मा गांधी पर आया. पं.नेहरू को कुछ हद जिम्मेदार बताया जाता है और सरदार पटेल को विभाजन से बरी कर दिया जाता है.

बम्बई में चौपाटी पर वे अपने भाषण में कहते हैं, ‘‘जब हमने दो टुकड़ा मंजूर किया, तब किसी ने नहीं कहा कि यह टुकड़ा न करो. सबने कहा कि दो टुकड़ा होना अच्छा है. तो जिन लोगों ने आज यह बात उभारी है, वह उसी मनोवृत्ति का उदाहरण है, जिस मनोवृत्ति का नतीजा यह हुआ कि गांधी जी का खून हुआ. उसमें कई आदमी ऐसे निकले, जिन्होंने हत्या में हिस्सा लिया. अगर फिर भी अभी तक हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं, तो उधर जाने में तो देश का नुकसान है ही. तो मैं इन लोगों को चेतावनी देना चाहता हूं कि उस रास्ते पर जाना मूर्ख लोगों का काम है. इसका परिणाम भयंकर होगा.’’ (वही पृष्ठ 297)

अंग्रेजों के बंगाल विभाजन पर भारतवासियों ने उसका पुरजोर विरोध किया था. उस विभाजन को रोक लिया था. ‘‘उसे रोकने के लिए काफी कुर्बानी भी आपने की थी. सारे हिंदुस्तान ने बंगाल का साथ दिया था. अब उसी बंगाल के दो हिस्से करने के लिए हमें खुद कहना पड़ा और हम सबने मान लिया कि उसके सिवाय कोई चारा नहीं है.’’
(वही पृष्ठ 308)

भारत विभाजन के बाद ही उसे एक करने की बातें भी चल रही थीं. ये बातें सरदार के कानों तक भी पहुंची. तब पटेल ने कहा, ‘‘कोई-कोई कहते हैं कि हिंदोस्तान और पाकिस्तान फिर एक हो जाएं. मैं कहता हूं कि अब वह सब कुछ नहीं हो सकता. उन्हें वहीं बैठा रहने दो. जो भाई पाकिस्तान चले गए हैं, उनको पाकिस्तान को अच्छा बनाने दो. पाकिस्तान जब स्वर्ग बन जाएगा, तब हमको भी उसकी ठंडी हवा लगेगी. यही ठीक है.’’ (वही पृष्ठ 24)

गांधी हत्या के पीछे एक तर्क यह भी काम करता है कि उन्होंने पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने के लिए उपवास किया. लेकिन सरदार पटेल अपने वक्तव्य में कहते हैं, ‘‘जब हमने उनको रुपया देने का किया, उस समय हमने कह दिया था कि आपको यदि पांच सौ करोड़ रुपया चाहिए और इतना हिस्सा लेने का आपका हक न हो, तो हम ज्यादा देने को तैयार हैं …जो आपका रुपया है, उसमें हम कोई दखल नहीं देंगे. हमने आपके साथ मिलकर जो फैसला किया, वह तो एक कन्सेण्ट रजामंदी का देना-पावना है डिक्री है.’’ (वही पृष्ठ 25)

मैसूर म्युनिसिपैलिटी के अभिनंदन समारोह में वे एक बार फिर विभाजन की बात को दोहराते हुए कहते हैं, ‘‘हमारे मुल्क के दो टुकड़े तो हुए ही थे, उससे और भी अनेक टुकड़े हो जाने का बड़ा खतरा था. और इस प्रकार के टुकड़े करने की पूरी कोशिश भी जारी थी.’’ (वही पृष्ठ 236)

इन वक्तव्यों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि सरदार पटेल ने विभाजन के लिए कहीं पर गांधी जी के नाम का उल्लेख नहीं किया है. गांधी जी ने तो 55 करोड़ रुपये देने के लिए उपवास किया, परंतु सरदार पटेल तो 500 करोड़ रुपये देने की बात कर रहे थे. सरदार पटेल के दिल में विभाजन का इतना दर्द था, जिसे उन्होंने करीब-करीब अपने प्रत्येक भाषण में स्वीकार किया है. सरदार पटेल को मुसलमान विरोधी और आरएसस का करीबी भी बताया जाता है. उनके भाषणों से इसे आसानी से समझा जा सकता है कि वे देशहित की बात करने वाले के साथ थे न कि हिन्दू, मुसलमान अथवा आरएसएस के.

मुसलमान-आरएसस और सरदार पटेल

सरदार पटेल को लौह पुरुष की उपाधि मिली. उनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा. वे स्वयं को मुसलमानों का परम मित्र मानते थे. वे कहते हैं कि ‘‘मैं साफ बात कहता हूं. मैं छिपाता नहीं हूं. मैं मुसलमानों का दोस्त हूं और दोस्त का काम है कि सच्ची बात कह दे और धोखेबाजी न करे. तो मैं कभी मुलसमानों के साथ गलत बात नहीं करूंगा. मैं साफ-साफ कहना चाहता हूं कि अब हिंदुस्तान के मुसलमानों की वफादारी का वक्त आया है.’’(वही पृष्ठ 36)

सरदार पटेल ही थे जो हिंदू और मुसलमान दोनों को खरी-खरी बात कहने का साहस रखते थे. लखनऊ की सभा में उन्होंने मुसलमानों से सीधे सवाल पूछा था. वे कहते हैं, ‘‘आप सब लोगों की अगर यह राय है कि पाकिस्तान कश्मीर में जो कुछ कर रहा है, वह गलत है, तो क्यों आपकी जबान खुलती नहीं है? आप क्यों बोलते नहीं हो कि यह रास्ता गलत है? जब तक मुसलमान हिंदुस्तान में इस तरह से नहीं बोलेंगे तब तक हमारा काम बिलकुल मुश्किल हो जाता रहेगा. जितने वहां बुरे काम होते हैं, उनके बारे में यदि हिंदुस्तान के मुसलमान नहीं बोलेंगे, खुले दिल से उसे बुरा नहीं कहेंगे, तो फिर उन्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि उनकी वफादारी की तरफ किसी को अंदेशा है. तब हमसे पूछने की कोई जरूरत नहीं है.’’ (वही पृष्ठ 35)

दूसरी ओर सरदार पटेल आरएसएस वालों को भी समझाते हुए कहते हैं, ‘‘हमारे यहां जो चार करोड़ मुसलमान पड़े हैं, उसके हम ट्रस्टी हैं. तो मैं हिंदू भाइयों से, जो हमारे आरएसएस वाले नौजवान भाई हैं, उनसे भी कहना चाहता हूं कि आप लोग कुछ दिमाग से काम लीजिए, अक्ल से काम लीजिए और समझ से काम लीजिए, जिससे हमारा भी काम हो जाए और दुनिया में हमारी बदनामी भी न हो, इस तरह से हमें काम करना चाहिए. यदि आपको लड़ाई की ख्वाहिष हो और आपको लड़ना ही हो तो उसके लिए लड़ाई का मैदान पसंद करना चाहिए, लड़ाई का मौका पसंद करना चाहिए और लड़ाई का सामान पूरा करना चाहिए. बेमौके से जो काम करता है, जो बेवकूफी से काम करता है, वह अपना सारा काम गंवा देता है. तो मैं यह कहना चाहता हूं कि जो चार करोड़ मुसलमान इधर पड़े हैं, उनके साथ छेड़खानी कभी न करो. जितनी छेड़खानी आप करेंगे, उतना ही हमारे उपर बोझ पड़ता जाएगा.’’ (वही पृष्ठ 37)

सरदार पटेल इस बात से वाकिफ थे कि आरएसएस वाले गलत रास्ते पर चल रहे हैं. ‘‘तो हमारे आरएसएस वाले जो नौजवान भाई हैं, जो गांवों में घूमते रहते हैं और बहुत-सी बातें करते हैं, वे लोग अगर गलत रास्ते पर चलते हों, तो उनको ठीक रास्ते पर लाना हमारा काम है. हमें उनको समझाना चाहिए कि उनका तरीका गलत है. यह काम आर्डिनेंस से नहीं हो सकता. उससे तो वे उलटे तरीके पर चलेंगे. इसलिए मैं उसके साथ कुछ-न-कुछ खामोशी से काम लेता हूं. हां, अगर वे अपनी मर्यादा छोड़ देंगे तो फिर हमें लाचारी से सख्ती करनी पड़ेगी.’’ (वही पृष्ठ 43)

वे साफ चेतावनी भी देते हैं कि, ‘‘आप ऐसा गुमान क्यों रखते हैं कि आप ही करोड़ों हिंदुओं को ठीक रखेंगे. इस तरह से हिंदू धर्म छोटा हो जाएगा . बहुत संकुचित हो जाएगा.’’ (वही पृष्ठ 44)

सरदार पटेल ने यह भी स्वीकार किया है कि आरएसएस वाले गुनाह करते हैं, परंतु उसे जायज भी ठहराया है. वे कहते हैं, ‘‘अगर आप कहें कि आरएसएस वाले गुनाह करते हैं तो मैं कबूल करूंगा कि वे गुनाह करते हैं. लेकिन इस गुनाह के पीछे उनका स्वार्थ नहीं है. तो उनके दिल में जो भाव है, वह ठीक भाव है. अगर हम उसको ठीक रास्ते पर ले जा सकते हों, तो क्यों न ले जाएं?’’ (वही पृष्ठ 45)

सरदार पटेल हिंदुओं के दिलों में छिपे डर को जानते थे. उन्हें इस बात का भी इल्म था कि हिंदुओं का डर मुसलमानों को लेकर है. नागपुर विद्यापीठ में अपरोक्ष रूप से आरएसएस के क्रिया-कलापों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हिन्दू तो यहां बहुत बड़ी ताकत में पड़े हुए हैं. उनको डर क्यों लगता है? वे क्यों डर कर नौजवान भाईयों को गलत रास्ते पर चलाने की कोशिश करें? जो कोई छिपे-छिपे अपने नौजवानों को ऐसी चीज सिखाता है, वह हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है. चाहे वह दिल में कितना ही समझता हो कि वह हिन्दू संस्कृति की रक्षा कर रहा है. आपको जो कुछ करना है, खुल्लमखुल्ला करो. जितना काम छिपाकर करोगे, उतनी ही एक प्रकार की भीरूता पैदा हो जाएगी. कायरों को छिपा काम करने की जरूरत होती है, बहादुर मर्दों को नहीं. सो आपको जो काम करना है, खुलकर करो.’’ (वही पृष्ठ 180)

यह सरदार पटेल में ही हिम्मत थी कि वे गलत बात करने पर वह अपने मित्र को भी जेल में डाल दें. वे कहते हैं, ‘‘मैंने अपने हाथ से मास्टर तारासिंह को जेल भेजा है. जिसका मुझे दुःख हुआ. इतनी शर्म जिंदगी में मुझे कभी नहीं आई थी. जो लोग कहते हैं कि हम जत्था भेजेंगे, वे सोचें कि इससे क्या होगा. मैं तो इस बोझ से छुटकारा चाहता हूं. लेकिन मेरी जगह पर जो कोई भी आएगा, वह भी यही करेगा. अगर वह ऐसा न करेगा, तो मुल्क तबाह हो जाएगा. मैंने संघवालों को भी जेल में भर दिया.’’ (वही पृष्ठ 250)

एक ओर तो सरदार पटेल ने मुसलमानों से देश के प्रति वफादार रहने को कहा है तो दूसरी ओर आरएसएस को भी देशहित में आपसी सद्भाव कायम रखने की जिम्मेदारी का अहसास कराया है. ‘नेशनलिस्ट मुसलमान’ शब्द सरदार पटेल का ही दिया हुआ है. एक स्थान पर उन्होंने अपना ‘चौकीदार’ ठीक रखने की बात भी कही है.

समाजवादी-पूंजीपति और सरदार पटेल

सरदार पटेल ने कभी अपने लिए संपत्ति जोड़ने का काम नहीं किया. उनके उपर पूंजीपतियों का साथ देने के अनेक आक्षेप लगाए गए. तब सरदार पटेल को कहना पड़ा, ‘‘जब से मैंने गांधी जी का साथ दिया, और आज इस बात को बहुत साल हो गए, तभी से मैंने फैसला किया था कि यदि पब्लिक लाइफ में काम करना हो, अपनी मिल्कियत नहीं रखना चाहिए. सोचिए जरा तब से आज तक मैंने कोई चीज नहीं रखी. न मेरा कोई बैंक अकाउंट है, न मेरे पास कोई जमीन है, और न मेरे पास कोई अपना मकान है. मैं यह कुछ रखना ही नहीं चाहता हूं. अगर मैं रखूं तो मैं इसे पाप समझता हूं. मुझे कोई सोषलिज्म का पाठ सिखाए तो फिर उसे सीखना पड़ेगा कि पब्लिक लाईफ किस तरह से चलानी है.’’ (वही पृष्ठ 91)

आजादी के पहले इस देश में अनेक राजा मौजूद थे. इनमें से अनेक अंग्रेजों के साथ थे. उनकी मदद से वे अपनी राजशाही कायम रखे हुए थे. इस बात की कल्पना की जा सकती है कि यदि उस वक्त धैर्य से काम नहीं लिया जाता और राजाओं के खिलाफ जनमानस की भावनाओं को हवा दी जाती तो देश की दशा और दिशा क्या होती, इसका अंदाज लगाया जा सकता है. लेकिन सरदार पटेल जैसे दृढ़प्रतिज्ञ नेता ने बड़ी खूबी से इन राजाओं की रियासतों का विलय भारत में कराया.

इस बारे में वे कहते हैं, ‘‘गांधीजी के पास रहकर मैंने यह सीख लिया कि न राजाओं से दुश्मनी करना, न कैपिटलिस्ट से दुश्मनी करना, न लैंडलार्ड से दुश्मनी करना, न किसी ओर से दुश्मनी करना. देश के हित के लिए सबसे काम लेना, यह मैंने बापू के पास से सीख लिया.’’ (वही पृष्ठ 135)

गांधी हत्या और सरदार पटेल

महात्मा गांधी की हत्या पर सरदार पटेल का दिल रो उठा. उनकी हत्या के पांच मिनट पहले ही सरदार पटेल उनसे मिलकर गए थे और एक व्यक्ति ने पटेल को सूचना दी कि गांधी जी पर गोली चलायी गई है. 2 फरवरी 1948 को गांधी जी की शोकसभा में सरदार पटेल ने कहा, ‘‘हमारे एक नौजवान ने उनके बदन पर गोली चलाने की हिम्मत की. यह कितनी शरम की बात है. उसने गोली किसके उपर चलाई. उसने एक बूढ़े बदन पर गोली नहीं चलाई, यह गोली तो हिंदुस्तान के मर्म स्थान पर चलाई गई है. और इससे हिंदुस्तान को जो भारी जख्म लगा है, उसके भरने में बहुत समय लगेगा …लेकिन इतनी शरम की बात होते हुए भी हमारे बदकिस्मत मुल्क में कई लोग ऐसे हैं, जो उसमें भी कोई बहादुरी समझते हैं. कोई खुशी की बात समझते हैं. जो ऐसे पागल लोग हैं, वे हमारे मुल्क में क्या नहीं करेंगे? और जब गांधीजी के तन पर गोली चल सकती है, तो आप सोचिए कि कौन सलामत है? और किस पर गोली नहीं चल सकती है? सारी दुनिया में हमारा मुंह काला हो गया है.’’ (वही पृष्ठ 101)

सरदार पटेल ने इन्दौर के मजदूरों की काफी तारीफ की थी. राष्ट्रीय मजदूर संघ के दूसरे अधिवेशन में जब वे इन्दौर आए थे तब उन्होंने कहा था कि यहां के मजदूरों ने अहमदाबाद के मजदूर संगठन से अपना पार्ट ले लिया है. उन्हें इस बात का जरूर दुःख था कि इन्दौर और ग्वालियर का नाम बदनाम हुआ. इस बारे में उन्होंने कहा, ‘‘इन्दौर के मजदूरों के बारे में तो मैं नहीं जानता, लेकिन यहां के कई लोग गांधी जी के खून से पहले, ऐसे आंदोलन में फंस गए, जिससे इन्दौर और ग्वालियर कुछ बदनाम हुए. आरएसएस वाले जो लोग कुछ इस तरह से गलत रास्ते पर पड़ गए कि जिससे मुल्क को बहुत नुकसान हुआ. मजदूरों को ऐसी चीजों में नहीं फंसना चाहिए.’’ (वही पृष्ठ 271)

हैदरबाद के स्वागत समारोह में गांधी हत्या के प्रश्न पर सरदार पटेल ने कहा, ‘‘जब गांधी जी का खून हुआ तो हिंदुस्तान में ऐसे हिन्दू भी थे, जिन्होंने खुशी मनाई थी. जब तक वह शैतानियत हम से नहीं निकल जाती, तब तक कौम-कौम का एका भी नहीं हो सकता. हम नहीं चाहते थे कि हिन्दोस्तान का टुकड़ा हो. लेकिन मजबूर होकर हमें टुकड़ा करना पड़ा.’’ (वही पृष्ठ 340)

सरदार पटेल एक बार फिर कहते हैं कि ‘‘हिंदुस्तान का टुकड़ा होना उन्हें (गांधी जी) को पसंद नहीं था. लेकिन इस तरह से वह टुकड़ा नहीं कराना चाहते थे और अब कराची जाना चाहते थे. वहां जाकर वह मुसलमानों को दिल से समझाना चाहते थे कि हिंदुओं को ठीक रखो. इधर यही बात वह हिंदुओं को समझाते थे. बिाहर में जाकर और जगह पर जाकर, दिल्ली में जाकर रात-दिन कोशिश करके भी वह सफल नहीं हुए.’’ (वही पृष्ठ 344)

सरदार पटेल और महात्मा गांधी

यह बात भी उल्लेखनीय है कि सरदार पटेल के 27 महत्वपूर्ण भाषणों में कहीं पर भी देश के क्रांतिकारियों का जिक्र नहीं आया है. वे बार-बार आजादी के लिए गांधीजी की तपस्या को श्रेय देते हैं. आम जनमानस में यह धारणा स्थापित कर दी गयी है कि सरदार पटेल, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू तीनों में बहुत गंभीर मतभेद थे. गुजरात-महाराष्ट्र के अभिनंदोत्सव में सरदार पटेल कहते हैं, ‘‘अकेले गांधीजी की तपश्चर्या, उनकी नैतिक शक्ति और आत्मशक्ति से हमारे गुलाम देश की इज्जत बढ़ गई. उनके तपोबल से हमारे देश का नैतिक स्तर भी ऊंचा उठा गया.’’ (वही पृष्ठ 141)

महात्मा गांधी के बारे में वे कहते हैं, ‘‘हमारा जो सबसे बड़ा नेता था, जिसने दुनिया में हमारी इज्जत बढ़ाई, वह महात्मा गांधी थे.’’ (वही पृष्ठ 174)

नागपुर विद्यपीठ में उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, ‘‘हमारी आजादी की जो लड़ाई थी, उस लड़ाई में त्याग, कुर्बानी, सत्य और अहिंसा आदि के तेजस्वी हथियार थे.’’ (वही पृष्ठ 177)

इलाहबाद यूनिवर्सिटी के कन्वोकेशन भाषण में विद्यार्थियों के सामने आजादी की लड़ाई को समझाते हुए सरदार पटेल ने कहा, ‘‘मैं आपको उस लड़ाई की कुछ खास बातें बताने लगा हूं, जिसके अंत में हमने वह अनमोल निधि पाई, जो आज हमारे पास है. मुझे आशा है, आप उन्हें धीरज से सुनेंगे.’’ इस वाक्य से यह आशय भी निकलता है कि उस वक्त के युवाओं में भी धैर्य की कमी थी. वे कहते हैं, ‘‘सत्य और अहिंसा उस लड़ाई के प्रधान गुण थे. आत्म बलिदान, दुःख और त्याग उन सिपाहियों के बैज थे, जिन्होंने यह लड़ाई लड़ी. सहिष्णुता और एकता हमारे संकेत शब्द थे और सेवाभाव हमारा पथ-प्रदर्शन करता था, स्वार्थ भावना नहीं. हमने घोर युद्ध किया, परंतु स्वच्छता के साथ.’’ (वही पृष्ठ 201)

सरदार पटेल शांतिप्रिय व्यक्ति थे. लेकिन जनता के चित्त में उनकी छवि कुछ और ही बनाई गई है. वे तो कहते हैं, ‘‘मैं तो हमेशा शांति चाहता हूं. अगर शांति नहीं चाहता तो जिंदगीभर गांधीजी के पास कैसे रहता.’’ (वही पृष्ठ 215)

एक बार फिर वे गांधी जी का स्मरण करते हुए कहते हैं, ‘‘हमारे देश में गांधी जी जैसी हस्ती पैदा हुई. दुनियाभर के लोग उनके रास्ते पर चल रहे हैं. और वही रास्ता सही है.’’ (वही पृष्ठ 253)

महात्मा गांधी का गुणगान करते हुए वे कहते हैं, ‘‘दुनिया में आखिर सबसे बड़ी चीज क्या है? धन कोई बड़ी चीज नहीं है, न सत्ता कोई बड़ी चीज है. दुनिया में सबसे बड़ी चीज इज्जत या कीर्ति है. आखिर महात्मा गांधी के पास और क्या चीज थी? उनके पास न कोई राजगद्दी थी, न उनके पास शमषेर थी, न उनके पास धन था. लेकिन उनके त्याग और उनके चरित्र की जो प्रतिष्ठा थी, वह और किसी के पास नहीं है. वही हमारे हिंदुस्तान की संस्कृति है.’’ (वही पृष्ठ 257)

इसका विस्तार करते हुए सरदार पटेल कहते हैं, ‘‘हमारे हिंदुस्तान की नीति तो गांधी जी के रास्ते पर चलने की है. हम सारी दुनिया में शांति चाहते हैं.’’ (वही पृष्ठ 277)

यद्यपि सरदार पटेल एकाधिक बार यह स्वीकार कर चुके थे कि हमें जमाने के हिसाब से चलना चाहिए. गांधीजी का विचार बहुत अच्छा है, परंतु हमें दुनिया के सामने टिके रहने के लिए सैन्य साजोसामान की जरूरत है.

यद्यपि सरदार पटेल एकाधिक बार यह स्वीकार कर चुके थे कि हमें जमाने के हिसाब से चलना चाहिए. गांधीजी का विचार बहुत अच्छा है, परंतु हमें दुनिया के सामने टिके रहने के लिए सैन्य साजोसामान की जरूरत है. इसके बाद भी आजादी आंदोलन का विश्लेषण करते हुए सरदार पटेल कहते हैं, ‘‘सच्चा स्वराज हमें पैदा करना हो, तो गांधीजी ने जो रास्ता हमें बताया था, शुरू से वही रास्ता हमें पकड़ना होगा. हमने जब हिंदुस्तान में स्वतंत्रता के लिए युद्ध शुरू किया, तब वह दो तरीकों से किया. एक तो परदेशी सल्तनत को इधर से हटाना. उसे हटाने के लिए गांधीजी के पास एक अद्भुत शस्त्र था असहयोग और सत्याग्रह. उन्होंने सत्य और अहिंसा द्वारा विदेशी सत्ता को इधर से हटाने के लिए तपस्या शुरू की …एक महान व्यक्ति की तपस्या से ही परदेसी सल्तनत यहां से हट गई.’’ (वही पृष्ठ 238)

भारत की आजादी के लिए सरदार पटेल एकमात्र श्रेय गांधी जी को देते हैं. दिल्ली प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर उन्होंने कहा, ‘‘अगर स्वराज्य के लिए किसी ने कष्ट उठाया तो गांधी जी ने उठाया और उनकी कृपा से और उनके आशीर्वाद से हमारे मुल्क का इतना बड़ा यह काम पूरा हुआ.’’ (वही पृष्ठ 326)

वे आगे कहते हैं, ‘‘यदि हमें सच्चा स्वराज चाहिए, तो हमें गांधीजी की बतायी हुई समाज-रचना करना पड़ेगी. इसलिए मैं पुकार-पुकार कर सब जगह कह रहा हूं कि आप गलत रास्ते पर चल रहे हैं. जिस प्रकार हम आज चल रहे हैं, इसी तरह से आगे भी चलते रहेंगे, तो कुछ दिनों के बाद लोग कहने लगेंगे कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था. तब कम-से-कम खाना तो मिलता था.’’ (वही पृष्ठ 239)

आजादी के एक साल बाद ही सरदार पटेल ने इसे नकली आजादी बताया. ‘‘गांधी जी ने हमें बताया था कि हमारा स्वराज्य तो सूत्र के तांत से जुड़ा हुआ है. हमें चरखा चलाना चाहिए, यह उन्होंने कहा था. वह तो हमने कुछ किया नहीं. अब यह स्वराज्य आया है, वह असली नहीं, नकली है. असल स्वराज्य तो तभी हो सकता है जब हम सब साथ मिलकर, जितनी चीजें हमें अपने मुल्क के लिए चाहिए, वे सब अपने मुल्क में पैदा कर लें. इसके लिए हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी. जो चीज हमें चाहिए, वह चीज अगर हमारे मुल्क में बनती हो, तो उसी को इस्तेमाल करना हमारा कर्तव्य है. सच्चे स्वराज्य की प्राप्ति के लिए हमें आज प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि 26 तारीख से या तो इसी महीने से कि हम परदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करेंगे.’’(वही पृष्ठ 329)

सरदार पटेल ने देश की इमारत को मजबूत बनाने के लिए आधारभूत उपाय बताए. गांधी जी भारत को गांवों का देश कहते थे और यही इस देश का मूल चरित्र भी है. सरदार पटेल ने भी गांवों को मजबूत बनाने की हिमायत की. देश के गुलामी में फंसने के लिए छुआछूत की भावना भी जिम्मेदार थी. इसे दूर करने के लिए गांधी जी ने कई आंदोलन चलाए. इस बारे में सरदार पटेल कहते हैं, ‘‘गांधी जी पुकार-पुकार कर कहते थे कि यदि सच्चा स्वराज्य आप लोगों को चाहिए, तो अस्पृश्यता को मिटा दीजिए. पहले हिन्दू और मुसलमानों को एक कर दो. अपनी आर्थिक स्थिति ठीक करनी हो तो हम अपना कपड़ा आप बनाए. पहनने का जो कपड़ा हमारे गांव में बने वही हम पहनें …हमारे मुल्क में एक भाषा होनी चाहिए. अंग्रेजी-वंग्रेजी छोड़ देनी चाहिए. राष्ट्रभाषा एक होनी चाहिए. इन चार इमारतों पर हिंदुस्तान का स्वराज्य बनाने की गांधी जी ने कोशिश की और वह कोशिश उन्होंने मरते दम तक नहीं छोड़ी थी. मैं उनका साक्षी हूं. मरने से सिर्फ पांच मिनट पहले एक घंटे तक मेरी उनसे बातचीत हुई और मैं जब चला गया तो तुरंत एक आदमी आया और उसने बताया कि एक पागल आदमी ने फाइरिंग किया तो बापू मर गए.’’ (वही पृष्ठ 344)

सरदार पटेल एक साल के भीतर ही निराश भी हो चले थे. एक कारण यह भी हो सकता है कि उनकी उम्र उनके सपनों के भारत को बनाने के खिलाफ थी. वे जीवनभर महात्मा गांधी के साथ में रहे और उनकी रहनुमाई में उन्होंने काम किया. सरदार पटेल ने विद्यार्थियों से कहा, ‘‘परंतु आज देश का जो नक्शा हमारे सामने है, वह उससे कितना भिन्न है. ऐसा लगता है, मानो एक बरस में ही हममें से वह भावना और वह गुण निकल गए हैं, जो उस लड़ाई में थे. जो भावना हमने उस महान गुरु की प्रेरणा से और उसकी रहनुमाई में पाई थी, खेद है कि हमारा वह नेता हमारे साथ नहीं. उसका चला जाना और उससे जो भारी चोट हमें लगी, वे दोनों स्वयं इस बात के फलस्वरूप थी कि हम उस मार्ग से हट गए थे, जो उसने हमारे लिए बनाया था और जिस पर एक वक्त हम ऐसी सफलता के साथ चले थे. अब तो ऐसा मालूम होता है कि हमें जालसाजियां करने में और सत्ता पाने के लिए दौड़-धूप करने में आनंद आता है. आज हमारे जो मुकाबले होते हैं, उनमें खेला के स्वस्थ नियमों को ध्यान में न रखकर हम उन्हें गंदा बना देते हैं. हम केवल चाल के रूप में सत्य को सराहते हैं, जबकि हमारे मिजाजों और दिलों पर हिंसा का राज है. हमारी बुद्धि और हमारे काम सिकुड़े मार्ग में ही चलते हैं. हमारे बड़े-बड़े उद्देश्य और देश के महान हित हमारी आंखों से ओझल होते जा रहे हैं. हमारे दिलों में गड़बड़ी और बेतरतीबी फैली हुई है. सिपाहियों का वह समस्त अनुशासन और जनता के प्रति अपने धर्म की भावना हम लोगों में कम होती जा रही है. मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इस चित्र में मैं कोई बात बढ़ा कर नहीं दिखा रहा हूं.’’ (वही पृष्ठ 201)

हमारे दिलों और मनों में जो काई गहरे दबी हुई थी, आजादी मिलते ही वह ऊपर आ गई. देश निर्माण के बदले हम सत्ताकांक्षी हो गए. आजादी के बाद ही हम धोखेबाजी और झूठ-फरेब में लग गए. आजादी के बाद इतनी स्पष्टता से अपनी बात रखने वाले अकेले सरदार पटेल ही थे. वे इस बात से भी व्यथित थे कि आजादी उच्छृंखलता में बदल गई है.

प्रांतीय भावना और सरदार पटेल

विभाजन के बाद देश में जो नफरत का जहर फैला था, उससे सरदार पटेल काफी चिंचित थे. वे एक स्थान पर कहते हैं, ‘‘कोई भी कौम जहर के प्रचार पर जिंदा नहीं रहती.’’ आजादी के तत्काल बाद ही देश में प्रांतीयता की आवाजें तीव्र हो गई थीं. इस खतरे की ओर आगाह करते हुए सरदार पटेल ने कहा, ‘‘आज हमारे देश में एक भावना पैदा हुई है, जो हमको बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है. यह भावना इस बात की है कि आज बंगाली सोचने लगे हैं कि बंगाल सिर्फ बंगालियों के लिए है.

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