इस नवरात्रि पहुंचें पश्चिम बंगाल के कालीघाट मंदिर, यहां गिरी थीं माता की अंगुलियां

कोलकाता का कालीघाट मंदिर

पश्चिम बंगाल को दुर्गा पूजा उत्सव के लिए खासतौर पर जाना जाता है. कालीघाट मंदिर में भी यह उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. नवरात्रि में इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है. देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान, खासकर अष्टमी पूजा के लिए यहां घंटों पंक्तियों में खड़े रहते हैं ताकि माँ काली का दर्शन कर सकें.

सुषमाश्री

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में कालीघाट एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है. मान्यता के अनुसार मां सती के दाएं पैर की कुछ अंगुलियां इसी जगह गिरी थीं. आज यह जगह काली भक्तों के लिए सबसे बड़ा मंदिर है. बंगाल ही नहीं, देश-दुनिया से लोग यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं. सामान्यत: मंगलवार और शानिवार को यहां विशेष पूजा होती है, लेकिन हर अष्टमी को कालीघाट मंदिर में विशेष पूजा की जाती है. नवरात्रि में तो इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है.

हिंदू धर्म पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए. ये बेहद पावन तीर्थस्थान कहलाए. ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हैं. देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है.

मंदिर में त्रिनयना माता रक्ताम्बरा, मुण्डमालिनी, मुक्तकेशी भी विराजमान हैं. पास ही में नकुलेश का भी मंदिर है. मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माँ काली की प्रतिमा अद्भुत और अद्वितीय है. इस प्रतिमा का निर्माण दो संतों आत्माराम ब्रह्मचारी और ब्रह्मानंद गिरी ने किया था. पत्थर को तराश कर बनाई गई माँ काली की इस प्रतिमा की तीन बड़ी आँखें हैं, साथ ही चार स्वर्ण भुजाएँ भी हैं. इसके अलावा माँ काली के हमेशा से पूज्य स्वरूप के अनुसार प्रतिमा की जीभ भी बाहर निकली हुई है, जो सोने की है.

मंदिर की खासियत

यहां सती के दाएं पांव की 4 अंगुलियां (अंगूठा छोड़कर) गिरे थे. मोनोशा ताल, जोर बांग्ला, नट मंदिर, हरकथ ताल और राधा कृष्ण मंदिर भी कालीघाट मंदिर का ही हिस्सा हैं. मंदिर परिसर में ही कुंडुपुकुर स्थित है, जो एक जलकुंड है. माता सती का दाहिना अँगूठा इसी कुंड से मिला था.

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कालीघाट मंदिर में देवी की प्रतिमा में मां काली का मस्तक और चार हाथ नजर आते हैं. यहां की शक्ति ‘कालिका’ व भैरव ‘नकुलेश’ हैं. इस पीठ में काली की भव्य प्रतिमा मौजूद है, जिनकी लंबी लाल जिह्वा मुख से बाहर निकली है.

पौरााणिक कथा

एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक भक्त ने भागीरथी नदी से प्रकाश की उज्ज्वल किरण देखी. उसने प्रकाश स्थित किया और एक मानव पैर की उंगली के रूप में पत्थर के टुकड़े की खोज की. इसके आसपास के क्षेत्र में उन्होंने नकुलेश्वर भैरव का एक स्वयंभू लिंगम पाया. इन छवियों को उसने छोटे से मंदिर में रखा और जंगल में इनकी पूजा करने लगा. मंदिर की लोकप्रियता समय के साथ बढ़ती गई और इस तरह कालीघाट मंदिर को मान्यता मिली.

कालीघाट मंदिर में देवी की प्रतिमा में मां काली का मस्तक और चार हाथ नजर आते हैं. यहां की शक्ति ‘कालिका’ व भैरव ‘नकुलेश’ हैं. इस पीठ में काली की भव्य प्रतिमा मौजूद है, जिनकी लंबी लाल जिह्वा मुख से बाहर निकली है.

कालीघाट मंदिर की स्थापना सन् 1809 में हुई थी. यह मंदिर कोलकाता के सबर्ण रॉय चौधरी नामक धनी व्यापारी के सहयोग से पूरा हुआ था. इसके अलावा 15वीं और 17वीं शताब्दी की कुछ रचनाओं में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है. कालीघाट मंदिर में गुप्त वंश के कुछ सिक्के मिलने के बाद यह पता चलता है कि गुप्त काल के दौरान भी इस मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना बना हुआ था.

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कोलकाता के कालीघाट मंदिर के बारे में सबसे खास बात यह है कि पहले यह मंदिर हुगली (जिसे भागीरथी भी कहा जाता था) के किनारे स्थित था. लेकिन समय के साथ भागीरथी, मंदिर से दूर होती चली गई. अब यह मंदिर आदिगंगा नाम की नहर के किनारे पर स्थित है, जो अंततः हुगली नदी से जाकर मिलती है.

कैसे पहुँचें?

कालीघाट मंदिर से कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की दूरी लगभग 25 किलोमीटर (किमी) है. प्रसिद्ध हावड़ा जंक्शन, कालीघाट मंदिर से मात्र 10 किमी दूर है. कोलकाता पहुँचने के बाद मंदिर पहुँचना काफी आसान है. माना जाता है कि कोलकाता जाकर भी अगर दक्षिणेश्वर काली माता मंदिर और कालीघाट की यात्रा न की तो यह यात्रा अधूरी मानी जाएगी.

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