मोहन राकेश एक सफल नाटककार…

मोहन राकेश
8 जनवरी को जिनकी 96 वीं जयंती है…

हिन्दी नाटक विधा को समसामयिक बनाने वाले नाटककार मोहन राकेश का नाम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद के बाद आदर से लिया जाता है। उनकी जन्म तिथि पर यह आलेख उनके रचना संसार पर विहंगम दृष्टि डालता है।

हिंदी में नाटक विधा को समसामयिक बनाने और नयी दिशा देने वाले प्रसिद्ध नाटककार , निबंधकार और कहानीकार मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी 1925 ई. को पंजाब के अमृतसर में हुआ था।

मोहन राकेश

उनके पिता श्री करमचन्‍द गुगलानी अधिवक्‍ता थे तथा साहित्य और कला प्रेमी थे। जिसका प्रभाव मोहन राकेश के जीवन पर पड़ा। उन्होंने लाहौर के ओरियण्‍टल कॉलेज से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी औार संस्‍कृत विषयों में एम्.ए. किया ।फिर मुम्‍बई, शिमला, जालन्‍धर तथा दिल्‍ली विश्‍वविद्यालयों में अध्‍यापन किया। किंतु अध्यापन में उनका दिल नहीं लगा।

सन् 1962-63 ई. मेंं टाइम्स औफ इंडिया की मासिक कहानी पत्रिका ‘सारिका’ के सम्‍पादक हुए । लेकिन कुछ समय बाद उसे भी छोड़कर स्‍वतन्‍त्र लेखन करने लगे ।

सन् 1963 से 1972 में मृत्युपर्यंत‍ स्वतंत्र लेखन ही करते रहे। ‘नाटक की भाषा’ पर शोधकार्य करने के लिए उन्‍हें नेहरू फैलोशिप मिली लेकिन 3 दिसम्‍बर 1972 को दिल्ली में असामयिक मृत्‍यु होने के कारण वह महत्वपूर्ण कार्य अधूरा् रह गया।

हालांकि मोहन राकेश एक उत्‍कृष्‍ट नाटककार के रूप में प्रसिद्ध हैं, लेकिन उन्‍होंने साहित्‍य की अन्‍य विधाओं-उपन्‍यास, कहानी, निबध, यात्रावृत्त और आत्‍मकथा और डायरी लेखन आदि पर भी बहुत अच्छा लिखा है। आधुनिक हिंदी गद्य को नयी दिशा प्रदान करने वाले साहित्‍यकारों में मोहन राकेश का नाम अग्रणी पंक्ति में लिया जाता है ‌‌।

मोहन राकेश की प्रमुख कृतियॉं


निबन्‍ध-संग्रह- परवेश, बकलमखुद
नाटक- आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस,आधे-अधूरे,पैैैर तले की जमीन (अधूरा, जिसे कमलेश्वर ने पूरा किया)
एकांकी- अण्‍डे के छिलके तथा अन्‍य एकांकी, बीज नाटक, दूध और दांत (अप्रकाशित)
रूपान्‍तर- संस्‍कृत के शाकुन्‍तलम् तथा मृच्‍छकटिकम् नाटकों का हिन्‍दी नाट्य रूपान्‍तर
उपन्‍यास- अँधेरे बन्‍द कमरे, न आने वाला कल, अन्‍तराल, नीली रोशनी की बाहें (अप्रकाशित)
कहानी-संग्रह- क्‍वार्टर, पहचान तथा वारिस नामक तीन कहानी-संग्रह हैं, जिनमें कुल 54 कहानियॉं हैं। यात्रावृत्त- आखिरी चट्टान तक
जीवनी-संकलन- समय सारथी
डायरी- मोहन राकेश की डायरी

आषाढ़ का एक दिन

मोहन राकेश एक सफल नाटककार थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद के बाद हिंदी नाटकों में मोहन राकेश का युग रहा।से यदि लीक से हटकर कोई नाम उभरता है तो वह है मोहन राकेश का। हालाँकि बीच में और नाटककार भी हुए जिन्होंने आधुनिक हिन्दी नाटक विधा को सुदृढ़ किया किन्तु मोहन राकेश का लेखन सबसे अलग है। उन्होंने हिन्दी नाटक को अँधेरे बन्द कमरों से बाहर निकाला और उसे युगों के रूमानी ऐन्द्रजालिक सम्मोहन से उबारकर एक नए दौर के साथ जोड़कर दिखाया।

उन्होंने हिंदी में नाटक लिखे हैं। किन्तु वे समकालीन भारतीय नाट्य प्रवृत्तियों को भी जताते हैं। उन्होंने हिन्दी नाटक को अखिल भारतीय स्तर ही नहीं प्रदान किया वरन् उसे को विश्व नाटक की सामान्य धारा से जोड़ा।

प्रमुख भारतीय निर्देशक जैसे इब्राहीम अलकाजी,ओम शिवपुरी, अरविन्द गौड़, श्यामानन्द जालान, राम गोपाल बजाज और दिनेश ठाकुर ने मोहन राकेश के नाटकों का निर्देशन किया।

मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन तथा लहरों के राजहंस में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद आधुनिक मनुष्य के अंतर्द्वंद और संशयों की गाथा कही गयी है। एक नाटक की पृष्ठभूमि जहां गुप्तकाल है तो दूसरा बौद्धकाल ।

युद्ध की विभीषिका राम, गांधी और आम आदमी(Opens in a new browser tab)

आषाढ़ का एक दिन में सफलता और प्रेम में एक को चुनने के द्वन्द्व से जूझते कालिदास के चरित्र के जरिये मोहन राकेश रचनाकार और आधुनिक मनुष्य के मन की पहेलियों को सामने रखते हैं ।

वहीँ प्रेम में टूटकर भी प्रेम को नहीं टूटने देनेवाली इस नाटक की नायिका के रूप में हिंदी साहित्य को एक अविस्मरणीय पात्र दिया है। राकेश के कालिदास विशिष्ट होकर भी खल की भांति दिखते हैं। आधे अधूरे की सावित्री बिन्न्नी किन्नी कभी स्वयं से खीझती है तो कभी आसपास की ज़िन्दगी से

लहरों के राजहंस में और भी जटिल प्रश्नों को उठाते हुए जीवन की सार्थकता, भौतिक जीवन और अध्यात्मिक जीवन के द्वन्द, दूसरों के द्वारा अपने मत को दुनिया पर थोपने का आग्रह जैसे विषय उठाये गए हैं। उनके नाटकों को रंगमंच पर मिली शानदार सफलता इस बात का गवाह है कि नाटक और रंगमंच के बीच कोई खाई नहीं है। उनका तीसरा और सबसे लोकप्रिय नाटक आधे अधूरे है । जिसमें नाटककार ने मध्यवर्गीय परिवार की दमित इच्छाओं कुंठाओं और विसंगतियो को द्दिखाया है ।

इस नाटक की पृष्ठभूमि आधुनिक मध्यवर्गीय समाज है । वर्तमान जीवन के टूटते हुए संबंधों ,मध्यवर्गीय परिवार के कलहपूर्ण वातावरण विघटन ,सन्त्रास ,व्यक्ति के आधे अधूरे व्यक्तित्व तथा अस्तित्व का सजीव चित्रण हुआ है । मोहन राकेश का यह नाटक , अनिता औलक की कहानी दिन से दिन का नाट्यरुपांतरण है ।

मोहन राकेश ने अपनी रचनाओं में सरल, सहज, व्‍यावहारिक, संस्‍कृतनिष्‍ठ एवं परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है। कहीं-कहीं दैनिक जीवन में प्रचलित उर्दू एवं अँग्रेजी के शब्‍दों का प्रयोग भी मिलता है। उनकी भााषा सजीव, रोचक और प्रवाहपूर्ण है।
इ्उनकी रचनाएं प्रमुखत: वर्णनात्‍म्‍क ,विवरणात्‍मक भावात्‍मक तथा चित्रात्‍मक शैलियों में हैं।

संगीत नाटक अकादमी ने सन् 1968 में उन्हें सम्मानित किया था…

पंकज प्रसून, वरिष्ठ पत्रकार

पंकज प्रसून
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