आधुनिक खेती टिकाऊ क्यों नहीं!

रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ने से ज़मीन निष्प्राण हो रही है

जानकार लोगों का कहना है कि अधिक पानी और रासायनिक खादों पर निर्भर आधुनिक खेती टिकाऊ नहीं है . खेती ट्रैक्टर और मशीनों के ज़रिए हो रही है. खेती ट्रैक्टर और मशीनों के ज़रिए हो रही है . किसान जानवर नहीं पाल पा रहे हैं . गोबर की कम्पोस्ट खाद नहीं बनायी जा रही और न ही सनई , उड़द , मूँग , ढैंचा आदि बोया रहा है .

सरकार ने गोरक्षा के लिए जो क़ानून बनाए और जिस तरह गोवंश के आवागमन पर माब लिंचिंग की घटनाएँ हुईं उससे अब लोग दूध न देने वाले जानवर घरों पर रखने और पालने के बजाय छुट्टा छोड़ दे रहे हैं. ये जानवर फसलों का नुक़सान कर रहे हैं, जिससे की इलाक़ों में लोग खेती करना छोड़ भी रहे हैं.

रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ने से ज़मीन निष्प्राण हो रही है . गेहूं, धान और गन्ना आदि फसलों के लिए बहुत अधिक पानी का इस्तेमाल हो रहा है जिससे पानी का स्तर ज़मीन से नीचे गिरता जा रहा है . ऐसी आधुनिक खेती टिकाऊ नहीं होगी.

केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये नये कृषि क़ानूनों और किसान ऑंदोलन के चलते इन दिनों खेती चर्चा का विषय है . किसान कृषि उपज के लाभकारी मूल्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं .उचित होगा कि खेती के इन बुनियादी मसलों पर भी चर्चा की जाए, जिससे आधुनिक खेती टिकाऊ हो और अनाज, फल सब्ज़ी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हो.

आप अपने समाज और मित्रों में इस विषय पर चर्चा करें और लोगों को आधुनिक खेती के ख़तरों से आगाह करें तो उपयोगी होगा.

बीबीसी के पूर्व संवाददाता राम दत्त त्रिपाठी ने रिटायर्ड खंड विकास अधिकारी बीडीओ और किसान फूल सिंह से आधुनिक खेती पर मंडरा रहे इस ख़तरे पर बातचीत की . फूल सिंह ने इस तरह भारत में वर्तमान में खेती के भविष्य पर गहरी चिंता प्रकट की

कृपया आधुनिक खेती टिकाऊ नहीं विषय पर इस बातचीत पर अपनी प्रतिक्रिया भेजें . लाइक करें और मित्रों से शेयर भी करें .

राम दत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

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