ठेका खेती से जीवन-जड़ें उखड़ने का ख़तरा

उदारीकरण में ठेका खेती की अवधारणा की अहमियत बढ़ रही है

ठेका खेती CONTRACT FARMING उन तीन क़ानूनों में से एक है, जिन नए क़ानूनों को लेकर किसानों का विरोध है . सरकार और उसके ख़ैरख्वाह दावा कर रहे हैं कि ठेका की खेती की व्यवस्था यानी, अनुबन्धित कृषि नये जमाने का वह प्रावधान है जिससे किसानों के लिए फ़ायदा ही फ़ायदा है। दूसरी तरफ़ इससे असहमत एक बड़ा तबका ठेका खेती CONTRACT FARMINGएवं अन्य नये प्रावधानों को किसानों की समस्याएँ बढ़ाने वाला मानता है।

 ठेका या अनुबन्ध पर खेती (कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग) का मतलब है कि किसान खेती तो अपनी जमीन पर करता है, मग़र अपने लिए नहीं, बल्कि किसी और के लिए जिसे ‘खेती करवाने वाला’ कह सकते हैं।

इस व्यवस्था में सुविधा यह होती है कि ठेका अथवा ‘कॉण्ट्रैक्ट’ पर खेती कर रहे किसान को ख़ुद का पैसा नहीं ख़र्च करना पड़ता। खेती पर लागत वह लगाता है जिसके लिए फ़सल उगाने का ठेका ‘भूस्वामी’ लेता है।

ठेका खेती की समस्याएँ

सारी समस्या ऐसी व्यवस्था में आशङ्कित पेचीदगियों से पैदा हुई है। इनमें सबसे अहम यह है कि अगर ठेका खेती मौसम की मार या किसी दैवीय आपदा का शिकार हुई तो उसकी भरपाई कौन करेगा क्योंकि वास्तविक किसान तो खेती करवाने वाले से प्रावधानों के तहत पहले ही धन लेकर कर्ज़दार बन चुका होगा?

इस तरह ठेका खेती करते हुए किसान केवल ‘आभासी’ (वर्चुअल) रह जाएगा! गरचे, खेती करवाने वाले की ओर से कृषि-फसलों के लिए बीमा वगैरह करवाया गया तो मिलने वाली क्षतिपूर्ति (मुआवज़ा) सरीखा लाभ पैसा लगाने वाला पाएगा। अहम सवाल यह कि फसल पैदा होने पर खेती करने वाले किसान को क्या मूल्य चुकाकर स्वयं के लिए अन्न नहीं खरीदने होंगे?

   लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता-समूह और विपक्ष दोनों राजनीतिक प्रणाली के अंग होते हैं। इस नाते दोनों ही व्यवस्था के लिए समान रूप से उत्तरदायी होते हैं। सत्तादल जो गलतियाँ करता है, विपक्ष उसे ठीक करता है। जन की अपेक्षा यह होती है कि अन्तर सोच में हो, समझ में नहीं। स्वार्थान्धता के चलते स्वतंत्रता की मान्य विधिक अवधारणा के प्रति अज्ञानता एवं नासमझी के कारण भारत में इसके दुरुपयोग की प्रवृत्तियाँ बढ़ती गयी हैं।

इसके फलस्वरूप ही कृषि कानूनों की उपादेयता और इसकी सार्थकता के प्रश्न पर हठधर्मिता क़रीब पाँच सप्ताहों से कायम है। इसका व्यावहारिक हल दोनों पक्षों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाने से समाधान में दिक्क़त हुई है।   

   वास्तव में आध्यात्मिक सोच वाले हमारे देश में विकास को लेकर अनेक अवधारणाएं प्रचलन में रही हैं परन्तु लगभग डेढ़-दो दशकों से अचानक गुजरात ‘विकास का मॉडल’ बन गया। दुर्भाग्य से इस पर गम्भीर चर्चा नहीं हुई लेकिन खलबली अवश्य हुई; और तब जबकि भारतीय  चिन्तन के मौलिक सोच की जड़ें हिलती हुई दिखीं। 

   भारत एक परम्परावादी देश है। इसे समय-अवधि की परिधि में समेटना व्यर्थ है। देश का बहुतायत समाज ढाई-तीन सौ सालों और लाखों परिवार उससे से भी पहले से एक ही स्थान का निवासी कहलाने के मानिन्द हैं।

वे काम-धन्धे, रोज़ी-रोज़गार के सिलसिले में भले कहीं गये हों परन्तु उनकी जड़ें आज भी गाँव से ही जुड़ी और वहीं पर खड़ी मिलती हैं। इससे सेवासमाप्ति यानी, वृद्धावस्था में वे अपना समय सुकून से अपने गाँव-परिवारों में ही गुज़ारना चाहते हैं।

और कुछ हो या, नहीं, ठेका खेती जन-जीवन और उसके पारम्परिक मूल्यों को उखाड़ फेंकेगी। जिन्होंने ‘मोहल्ला अस्सी’ फ़िल्म देखी होगी, वे इस बात को सहजता से समझ सकते हैं। 

  बहरहाल, प्रस्तावित ठेका खेती के सम्बन्ध में उदाहरण आवश्यक है कि भौतिक विकास के अन्य क्षेत्रों की भाँति गुजरात में बड़े पैमाने पर यह पहले से हो रही है। ‘विकास के खेतिहरों’ के मुताबिक़ महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस तरह की खेती के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। फ़िर भी इस मामले में राष्ट्रीय मन-मन्तव्य और सहमति का अभाव दिखता है। इसकी कुछ क़ुदरती वज़हें है। 

   अपने देश (भारत) में खेती पूरी तरह से प्राकृतिक स्थिति यानी, मौसम के भरोसे है। कभी सूखा, तो कभी ज्यादा बारिश, खेत में खड़ी फसल चौपट कर देती है। देश में अधिकतर छोटे किसान हैं। ऐसे किसान खेतों में कुछ ज़ियादा प्रयोग भी नहीं कर पाते।

इसके विपरीत क़ुदरती तथा दूसरे कारणों से हर साल अधिकाधिक लोग खेती-बारी छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यद्यपि खेती के घाटे को कम करने के लिए सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है, किन्तु विविधताओं से भरे हमारे देश में ये कोशिशें पर्याप्त साबित नहीं होती हैं।

सरकार किसानों को आधुनिक तरीके से खेती करने के लिए जागरूक करने के अभियान चलाती है फ़िर भी तंत्र में भ्रष्टाचार की अधिकता से अधिकतर नीतियाँ प्रचार और विज्ञापन के स्तर पर पहुँचकर सिकुड़ जाती हैं।

इससे अपेक्षित परिणाम दूर रहे। नतीज़तन सरकार को खेती की बेहतरी की ख़ातिर आधुनिकता के नाम पर ‘ठेका पर खेती’ ही उत्पादन बढ़ाने का तरीका दिखा। बेशक कह सकता हूँ कि इस मामले में पहल करने वालों से ‘बड़ी भूल’ हुई है।   

   ठेका या अनुबन्ध पर खेती के तहत कोई कम्पनी या, फिर कोई आदमी किसान के साथ अनुबन्ध करता है कि किसान के द्वारा उगायी गयी फसल विशेष को अनुबन्ध करने वाला एक तय दाम में खरीदेगा। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च अनुबन्ध करने वाले के होते हैं। वही किसान को खेती के तरीके बताता है। फसल की गुणवत्ता (क्वालिटी), मात्रा (क्वाण्टिटी) और उसकी डिलीवरी का समय फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है।

https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/farmers-income-is-beneficial-in-employment-generation-need-to-increase-the-bargaining-power-of-farmers-on-contract-farming/articleshow/80084676.cms

ठेका खेती के फायदे

  ‘कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एण्ड प्राइजेज’ (सीएसीपी) के प्रमुख पाशा पटेल कहते हैं, “अनुबन्ध पर खेती गुजरात में बड़े पैमाने पर हो रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों में ठेके पर खेती के अच्छे परिणाण मिले हैं। इससे खेती की दशा और दिशा भी सुधर रही है। वे कहते हैं, इससे

(1) खेती अधिक संगठित बनेगी।

(2) किसानों को बेहतर भाव मिलेंगे।

(3) बाजार भाव में उतार-चढ़ाव के जोखिम से किसान मुक्त।

(4) किसानों को बड़ा बाजार मिल जाता है। (5) किसान को सीखने का अवसर मिलता है। (6) खेती के तरीके में सुधार होगा।

(7) किसानों को बीज, खाद के फ़ैसले में मदद मिलेगी और

(9) फसल की क्वॉलिटी तथा मात्रा में सुधार होगा।

ठेका खेती के लिए ज़रूरी उपाय 

   ठेका खेती से किसान और कथित ‘कॉण्ट्रैद क्टर’ दोनों को फायदा हो, इसके लिए कुछ ज़ुरूरी उपाय करने चाहिए, जैसे

(1) दोनों पक्षों के बीच होने वाले करार का ‘ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन’ हो।

(2) किसान और कम्पनी के बीच करार पारदर्शी हो।

(3) कोई भी बात, नियम या शर्त छिपी हुई नहीं हो तथा

(4) सभी बातें स्पष्ट तौर पर की जाएँ। चूँकि ‘कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग’ किसानों के फ़ायदे का सौदा बतायी जा रही है

इसलिए इसे लेकर जागरूकता अभियान चलाने की ज़ुरूरत है। पहला ये कि

(1) सरकार किसानों को शिक्षित कर सकती है।

(2) कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम के दायरे से कॉण्ट्रैक्ट फार्मिंग को अलग रखा जाए। (3) किसानों का शोषण नहीं हो इसके लिए सख्त कानून होने चाहिए।

(4) ठेके के तहत सभी कृषि उत्पादों के ‘इंश्योरेंस कवर’’ होने चाहिए और

(5) किसान और कम्पनी के बीच अगर कोई विवाद होता है तो विवाद निपटाने के लिए उपयुक्त ‘अथॉरिटी’ बनायी जानी चाहिए। 

ठेका खेती की चुनौतियाँ

   यों, ठेका खेती में दूसरे ख़तरे भी हैं। जैसे कि,

(1) बड़े ख़रीददारों के एकाधिकार को बढ़ावा।

(2) कम कीमत देकर किसानों के शोषण का डर।

(3) सामान्य किसानों के लिए समझना मुश्किल एवं

(4) छोटे किसानों को इसका कम होगा फ़ायदा। फ़िलहाल, निर्वाह और वाणिज्यिक फसलों के लिए सदियों से

देश के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार की ठेका या अनुबन्ध कृषि की व्यवस्था प्रचलित है। गन्ना, कपास, चाय, कॉफी आदि वाणिज्यिक फसलों में हमेशा से अनुबन्ध कृषि या कुछ अन्य रूपों को शामिल किया जाता है।

यहाँ तक कि कुछ फलों. फ़सलों और मत्स्य पालन के मामले में अक्सर ‘अनुबन्ध कृषि समझौता’ किया जाता है, जो मुख्य रूप से इन वस्तुओं के सट्टा कारोबार से जुड़े होते हैं।

आर्थिक उदारीकरण के मद्देनज़र ठेका खेती की अवधारणा की अहमियत बढ़ रही है।

विभिन्न राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ औषधि और पूँजी उपलब्ध कर के द्वारा विभिन्न बागवानी उत्पादों के विपणन के लिए किसानों के साथ अनुबन्ध में प्रवेश कर रहे हैं।

राजनीतिक अदूरदर्शिता से नये कृषि कानूनों को लेकर देश में संशय की स्थिति है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के किसान महीने भर से अधिक समय से आन्दोलित हैं।

उन्हें मनाने के लिए कई दौर में हुईं वार्ताएँ असफल रही हैं। अधिक उम्मीदों के साथ एक और बातचीत 30 दिसम्बर को नयीदिल्ली के ‘विज्ञान भवन’ में होने जा रही है। इस बीच खेती-बारी की बदलती व्यवस्था के विरुद्ध बढ़ते विरोध को देखते हुए केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें तक उहापोह का शिकार हुई हैं।

उचित मार्गदर्शन के बज़ाय ‘लंगड़ी चाल’ वाली सियासी कबड्डी से देश में चिन्तनशील वर्ग का आम ‘जनमानस’ भ्रमित हुआ है।अच्छा यह हुआ है कि न सिर्फ़ बड़े एवं पेशेवर किसान बल्कि अब छोटे ‘गँवई किसान’ भी सरकार की रीति-नीति पर चर्चा कर रहे हैं।

इससे लगता है कि लोकतंत्र है क्योंकि चर्चा और संवाद वे प्रमुख व्यावहारिक गुण हैं जिनसे लोकतंत्र पहचाना जाता है।

प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में रीतियों को बदलने और नीतियाँ बनाने के लिए संवाद की बड़ी अहमियत होती है, और यही इसका उचित भी है। किसी प्रणाली के तहत सरकारी कामों में दृढ़ता आवश्यक है। लेकिन इसका मतलब मनमाने फैसले थोपना नहीं होता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा, संरक्षा और सम्प्रभुता के मसले अलग हो सकते हैं, कम से कम सीधे और व्यापक जनहित के मामलों में निर्णय थोपना अनुचित है, अलोकतांत्रिक लगता है।

लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई सरकार पहले अपने सोच को पहले जनता के बीच साझा कर जनमत परखती है, सहमति बनाती है तब निर्णय लेती है।   

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

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