हिन्दी की पहली बोलती फिल्म आलमआरा कैसे बनी!

दर्शकों की इतनी भीड़ उमड़ पड़ी थी कि पुलिस को बुलाना पड़ा

पंकज प्रसून
पंकज प्रसून

आलमआरा हिन्दी की पहली बोलती फिल्म थी । मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में वह 14 मार्च 1931 को रिलीज हुई थी। उसका निर्माण और निर्देशन किया था आर्देशिर ईरानी ने।र्देशिर ईरानी मुंबई में वाद्य यंत्रों की दुकान चलाते थे। उन्हें फिल्में देखने का जबरदस्त शौक था। सन् 1929 में एक बार उन्होंने अमेरिकी सवाक फिल्म शो बोट देखी तो उन्हें लगा कि हिंदी में भी सवाक फिल्म बननी चाहिए।किस्मत का खेल देखिये। सन् 1903 में उन्होंने लौटरी से 14,000 रुपये  की रकम जीती। उन दिनों वह एक बड़ी रकम थी। इस पैसे से वे टेंट सिनेमा घरों में फिल्में प्रदर्शित करने वाले वितरक बन गये।अब मूक फिल्मों की बजाय बोलने वाली फिल्म बनाने का उनका जुनून बढ़ गया।

आलमआरा से पहले सिर्फ मूक फिल्में बनती थीं जिनका विषय अमूमन धार्मिक किस्से होते थे। उन्होंने अपनी फिल्म में लीक से हटकर कहानी ली।

फिल्म की कहानी एक राजकुमार और जिप्सी लड़की की प्रेम कथा है। जिसे मुंबई में रहने वाले बग़दादी यहूदी नाटककार जोसेफ डेविड पेनकर ने लिखा था।

फिल्म की कहानी एक राजकुमार और जिप्सी लड़की की प्रेम कथा है। जिसे मुंबई में रहने वाले बग़दादी यहूदी नाटककार जोसेफ डेविड पेनकर ने लिखा था।

ईरानी ने मराठी या गुजराती की जगह हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग किया। यानी हिन्दी और उर्दू मिश्रित बोलचाल की भाषा।इसलिेए मुंशी ज़हीर से डायलॉग लिखवाये गये ।

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अब बात कलाकारों की। ईरानी ने उन कलाकारों को ढूंढना शुरू किया जो फर्राटे से हिंदुस्तानी बोल सकते हों। उन दिनों एंग्लो इंडियन अदाकाराओं को रखने का चलन था।जिनका उच्चारण सही नहीं था।उस परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने ज़ुबेदा को हीरोइन चुना।हीरो के रूप में मास्टर विट्ठल को लिया। लेकिन वे सही तरीके से उच्चारण नहीं कर पाते थे। अतः उनके पात्र को गूंगा रखा।

फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने जनरल आदिल खान की भूमिका की थी।एल वी प्रसाद भी थे जो बाद में मशहूर निर्माता-निर्देशक बने।

अब शूटिंग  के वक्त समस्या यह आई कि ज्योति स्टूडियो के पीछे रेलवे लाइन थी।इसलिेए रेलगाड़ी की आवाज से शूटिंग में परेशानी होती थी।उन दिनों स्टूडियो में साउंड प्रूफ सिस्टम नहीं होता था। तो इसका हल यह निकाला गया कि रात एक बजे से लेकर सुबह चार बजे तक शूटिंग होती थी। जब ट्रेन की आवाजाही बंद रहती थी।

कुल मिलाकर 78 कलाकारों ने फिल्म के लिये अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की थी।इसलिए उसका प्रचार वाक्य था 

‘ 78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गये,उनको बोलते देखो’

फिल्म में सात गाने थे और संगीत दिया था फ़ीरोज़शाह मिस्त्री और बेहराम ईरानी ने। हिन्दी फिल्मों में पहली बार पार्श्व गायन भी इसी फिल्म से शुरू हुआ।

एक गाना दे दे खुदा के नाम पर को वजीर मुहम्मद खान ने गाया था जो पेशे से सिक्योरिटी गार्ड थे।

फिल्म की कहानी राजकुमार आदिल जहांगीर ख़ान और एक जिप्सी लड़की आलम आरा की प्रेम कथा है। आलम आरा का मतलब होता है संसार का गहना। कहानी में महल में चलने वाले षड्यंत्रों को भी दिखाया गया था।

फिल्म की कहानी एक राजकुमार और जिप्सी लड़की की प्रेम कथा है। जिसे मुंबई में रहने वाले बग़दादी यहूदी नाटककार जोसेफ डेविड पेनकर ने लिखा था।

 फिल्म को देखने के लिये दर्शकों की इतनी भीड़ उमड़ पड़ी थी कि पुलिस को बुलाना पड़ा था। फिल्म आठ सप्ताह तक हाउसफुल चली थी। फिल्म का टिकट तो चार आने का था लेकिन ब्लैक में पांच रुपये तक चला गया।

दुर्भाग्यवश इस फिल्म का कोई प्रिंट उपलब्ध नहीं है। चांदी के चक्कर में लोलुप लोगों ने उसे गला कर खत्म कर दिया।उन दिनों जो रील होती थी उसमें चांदी का इस्तेमाल होता था।

विस्तृत विवरण के लिये पढ़ें:

https://www.livehistoryindia.com/forgotten-treasures/2018/04/12/alam-ara-remembering-a-pioneer

पंकज प्रसून

मोबाइल: 9811804096

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