विकास की वर्तमान स्थिति, स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव और आम आदमी की पीड़ा

विकास का प्रकाश एक बड़ी आबादी तक आज तक नहीं पहुंच सका है

डॉ. अमिताभ शुक्ल

स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद और विकास गाथा में कसीदे पढ़े जाने के बाद भी देश में विकास की वास्तविकता की स्थिति सोचनीय है. आजादी के 75 वर्ष कम नहीं होते. अनेकों पीढ़ियां देश को विकास की अवस्था के शिखर पर देखने के प्रयत्नों और अरमानों के साथ विदा हो गईं. अनेकों पीढ़ियां निर्धनता के स्याह अंधेरों में दुर्भाग्यजनक दशाओं में अभिशप्त जीवन बिता कर समाप्त हो गईं. लेकिन, विकास का प्रकाश एक बड़ी आबादी तक आज तक नहीं पहुंच सका है.

एक बड़ी जनसंख्या निर्धनता रेखा से नीचे :

अधिकृत रूप से और तयशुदा मापदंडों के अनुसार देश की 25 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है. भारत के 10 राज्यों की 30 प्रतिशत से अधिक आबादी “गरीबी रेखा के नीचे” है. इनमें से पांच राज्यों में यह सर्वाधिक है. राज्यों के अनुसार बिहार में 52 प्रतिशत, झारखंड में 42.2, उत्तरप्रदेश में 37.8, मेघालय में 37.2, मध्यप्रदेश में 36.7, असम में 32.2 प्रतिशत है. जबकि, छत्तीसगढ़ में 29.9, राजस्थान में 29.5, ओडिशा में 29.4 और बंगाल में राज्य की 21.4 प्रतिशत “गरीबी रेखा से नीचे” है.

रोजगार/श्रम भागीदारी दर में अभूतपूर्व ह्रास अर्थात् जीवन स्तर का ह्रास : पिछले वर्षों में देश में बेरोजगारी दर में वृद्धि अर्थात् श्रम भागीदारी दर ( एल पी आर) में भारी कमी आई है. रोजगार के ढांचे के हिसाब से केवल 20 प्रतिशत जनसंख्या वेतनभोगी श्रेणी में आती है. 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या स्वरोजगार में संलग्न है. शेष 30 प्रतिशत जनसंख्या दैनिक मजदूरी से जीवनयापन करती है. विगत वर्षों में श्रम भागीदारी दर में काफी गिरावट आई है.

वर्ष 2016 में यह 46.6 प्रतिशत से अधिक थी, जो वर्ष 2021 में कम होकर लगभग 40 प्रतिशत रह गई है. वर्ष 2016 से एल पी आर में गिरावट के साथ उन परिवारों की संख्या में भी कमी आई है, जिनमें एक से अधिक सदस्य रोजगार में लगे थे. जिन परिवारों में एक से अधिक सदस्य कमाने वाले सदस्य थे, उनका अनुपात वर्ष 2016 के 34.7 प्रतिशत से गिर कर वर्ष 2017 में 32.3 प्रतिशत रह गया और वर्ष 2018 में 30.1 प्रतिशत रह गया. वर्ष 2019 में ये और भी कम हो कर 28.4 प्रतिशत पर आ गया जबकि, वर्ष 2020 में ये अनुपात कम हो कर 24.2 प्रतिशत रह गया.

अप्रैल 2020 अर्थात् लॉकडाउन के समय में ये अनुपात और कम होकर 17.6 प्रतिशत रह गया. अर्थात् वर्ष 2016 से वर्ष 2020 के चार वर्षों में इसमें 10 प्रतिशत से अधिक की कमी आई, अन्य शब्दों में 10 प्रतिशत से अधिक परिवारों के सदस्यों ने रोजगार खोया. जबकि वर्ष 2016 की तुलना में लॉकडाउन के समय ये अनुपात आधा रह गया. इस अवधि में केवल एक कमाऊ सदस्य वाले परिवारों की संख्या वर्ष 2016 के 59 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2021 के नवंबर माह तक 68 प्रतिशत हो गई. रोजगार के ह्रास और परिवारों की आय में कमी से उन परिवारों के जीवन स्तर में ह्रास का सीधा संबंध है, जो हाल के नीति आयोग के “समग्र गरीबी स्तर” के सर्वेक्षण के निष्कर्षों से भी स्पष्ट होता है.

कोरोना काल की अवधि में अमीर परिवारों की आय में आश्चर्यजनक वृद्धि :

उपरोक्त गरीबी और बेरोजगारी के स्तर में कमी के विपरीत सबसे अधिक अमीर परिवारों की संख्या और आय में अभूतपूर्व वृद्धि चौंकाती है. पिछले डेढ़ वर्षों में शेयर मार्केट में उछाल और सार्वजनिक निर्गम ( आई पी ओ) की बाढ़ से अरबपति प्रवर्तकों की श्रेणी में कई नए प्रवर्तक शामिल हुए. एक अरब डॉलर (करीब 75,000 करोड़ रुपये) की हैसियत वाले प्रवर्तकों की संख्या वर्ष 2020 के 85 से बढ़कर वर्ष 2021 के प्रारंभ में 126 हो गई है. और इन अरबपति प्रवर्तकों की समेकित संपत्ति वर्ष 2020 के दिसंबर के 494 अरब डॉलर (लगभग 37 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर अब लगभग 729 अरब डॉलर (लगभग 55 लाख करोड़ रुपये) हो चुकी है.
क्या देश और इन राज्यों में विकास हो रहा है..? : क्या इन राज्यों और देश में विकास हो रहा है..? कौन सा विकास? कैसा..विकास? और किनका विकास ..? एक बड़ी आबादी के निर्धनता स्तर में वृद्धि, रोजगार और जीवन स्तर में कमी की स्थितियों को क्या विकास माना जाए..?

उपरोक्त गरीबी रेखा के आंकड़े सरकार द्वारा न्यूनतम आय, जो गरीबी रेखा के आकलन के लिए निर्धारित है, के आधार पर प्राप्त आंकड़े हैं। वास्तविक गरीबी अथवा विकास के लाभों से वंचित अथवा एक औसत निर्धारित मापदंड के अनुसार जीवन स्तर से तो बहुत बड़ी आबादी वंचित है, अर्थात वह आबादी जो गरीबी रेखा के अंतर्गत नहीं आती, लेकिन आवास, पौष्टिक भोजन, शिक्षा, स्वास्थ, दवाइयों तक से वंचित है। नीति आयोग का ताजा सर्वेक्षण इन तथ्यों की पुष्टि करता है.

वर्तमान विकास की पद्धति और परिणाम :

एक बड़ी आबादी के जीवन में कोई सुधार नहीं आने के बावजूद, खरबों रुपयों की लागत से हाईवेज, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण, मूर्तियों और मंदिरों का निर्माण जारी है. विकास के नाम पर खरबों रुपयों द्वारा देश की नौकरशाही की सुख सुविधाएं जारी हैं। खरबों रुपयों के भ्रष्टाचार जारी हैं।

आमजन के लिए न बुनियादी अनिवार्य आवश्यकताओं का प्रबंध है, न समुचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रबंध. रोजगार के अभाव की स्थिति से बड़ी आबादी पीड़ित है.

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अब तो सरकारी अस्पतालों में बड़े पैमाने पर मृत्यु का प्रबंध भी होने लगा है. लगातार उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार आदि राज्यों में अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती मरीजों और शिशुओं की दुर्घटनाओं और लापरवाहियों से आकस्मिक मृत्यों की घटनाओं में वृद्धि से जाहिर है.

विकास की परिभाषा और आशय?

आय की असमानताओं, भ्रष्टाचार, भीषण गरीबी, भुखमरी, कुपोषण में निरंतर वृद्धि और कीर्तिमान स्थापित करते देश में क्या विकास हो रहा है..?

अतः करोड़ों वंचितों और अधिक दुर्दशा की स्थितियों में पहुंचे इन करोड़ों अभागों के लिए जो विकास के दायरे में नहीं आते, स्वतंत्रता और आजादी के अमृत महोत्सव के क्या मायने और अर्थ हैं..?

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