अपराध नियंत्रण: पुलिस सुधार के साथ ईमानदार जॉंच आवश्यक

आई बी सिंह , सीनियर एडवोकेट, हाईकोर्ट, लखनऊ

इन्काम्पिटेंट एवं डिसआनेस्ट इन्वेस्टीगेशन अर्थात अक्षम व् बेईमानी का अन्वेषण तथा वैज्ञानिक अन्वेषण के अभाव ने भारत जैसे देश के अपराधिक न्याय प्रणाली को लगभग बर्बाद कर दिया है । ऐसा लगता है जैसे आम नागरिक ने भी इस व्यवस्था को विधि का विधान मान कर, इसे स्वीकार कर लिया है ।

​इन्काम्पिटेंट या अक्षम अन्वेषण की श्रेणी में वो अन्वेषण आते हैं जो अन्वेषण कर्ता के लापरवाही या उचित बुद्धि का प्रयोग न कर, अन्वेषण में उपलब्ध साक्ष्य को एकत्रित न करके, उसमें कमी छोड़ दी जाती है । इसके उदाहरण बहुत से आरोप पत्रों में आये दिन देखने को मिलता है । इसी प्रकार से दूसरी श्रेणी के अन्वेषण यानि कि डिसआनेस्ट या बेईमानी के कारण किए गए अन्वेषण में अन्वेषण कर्ता जान बूझ कर, या तो मुलजिम को झूठा फ़साने के नियत से या शिकायतकर्ता को लाभ पहुँचाने के लिए, या फिर किसी अपराधी को बचाने के नीयत से, अन्वेषण करता है । इसके उदहारण प्रत्येक दूसरे आरोप पत्र में मिल जाते हैं ।

​आज तक इन दोनों श्रेणी के अन्वेषण कर्ताओं को,न्यायालय या शासन द्वारा, अन्वेषण में कमियां पकड़ लिए जाने के बावजूद, कभी किसी को किसी प्रकार की सजा नहीं दी गयी है, जिसके कारण ऐसे त्रुटिपूर्ण अन्वेषण, अन्वेषण कर्ताओं द्वारा बेधड़क किया जा रहा है । ऐसा प्रतीत होता है जैसे सरकार और न्यायालयों ने ऐसे त्रुटिपूर्ण अन्वेषण के लिए अन्वेषण कर्ताओं को खुली छूट दे दी हो । अपराधिक न्याय का पूरा महल इन्ही अपूर्ण, त्रुटिपूर्ण व बेईमानी से किये अन्वेषण के नीव पर खड़ा होता है । ऐसे गैर जिम्मेदाराना अन्वेषण के वजह से नब्बे प्रतिशत अपराधिक वादों में या तो बेगुनाह लोगों को सज़ा हो जाती है या गुनाह करने वाले साफ़ बच जाते हैं, या फिर कुछ गुनाहगारों के साथ, बहुत से बेगुनाह भी सजा पा जाते हैं ।

​न्यायालय का काम होता है साक्ष्य के आधार पर न्याय करना । यदि साक्ष्य झूठा हो या कुछ झूठा हो और कुछ सही हो, या अधितर झूठा हो और थोडा सत्य हो तो ऐसे में न्यायालय को न्याय करने में बहुत दिक्कत होती है । ज़रा सोचिये कि गुनाह करने वाला साफ़ साफ़ बच गया हो और उसके विरुद्ध आरोपपत्र भी न प्रस्तुत किया गया हो और अन्य कोई निरपराध ब्यक्ति के विरुद्ध आरोपपत्र गलत साक्ष्यों पर प्रस्तुत कर दिया गया हो तो ऐसे में निरपराध व्यक्ति के मन में क्या क्या विचार उठते होंगे जबकि वह व्यक्ति जिसने वास्तव में अपराध किया है, वह निरपराध को मुस्कुराते हुए देखता रहता होगा ।

​तीसरी श्रेणी है अवैज्ञानिक ढंग से अन्वेषण का । आज भी पुलिस एक्ट अट्ठारह सौ इकसठ और उसी के अनुसार पुराने पडचुके, पुलिस रेगुलेशन के अनुसार ही उसी घिसी पिटी, फटे हुए पन्ने को पढ़ कर गंभीर से गंभीर अपराधों का अन्वेशण किया जाता है जब कि अपराधियों के अपराध करने के तरीके तमाम नए वैज्ञानिक उपकरणों और तरीकों का प्रयोग कर होने लगे हैं। यही नहीं, अपराधियों को पकड़ने और उनके विरुध्ध साक्ष्य एकत्रित करने के भी तमाम नए नए वैज्ञानिक तरीके आ चुके हैं, परन्तु आज भी पुलिस का वही तरीका, एंटी टाइम ऍफ़ आई आर, पंचनामा भरना, फोटो लाश बनाना, पुराने ढंग से पोस्ट मार्टम और गवाहों का बयान न लिखते हुए भी लिखा दिखाना, चल रहा है ।

​बस लोगों और न्यायाधीशों को डराने के लिए पुराने पड चुके पुलिस के दरोगा को बिना किसी विशेषज्ञता का प्रशिक्षण दिए हुए, एस टी एफ, ए टी एस, एस आई टी आदि आदि नाम दे दिया जाता है, और फिर सरकारी अधिवक्ताओं का न्यायालय में खड़े होकर गर्व से कहना कि इस अपराध की जांच एस टी एफ ने या ए टी एस ने या एस आई टी ने किया है,जिससे न्यायालय पर अभियुक्त के विरुद्ध दबाव बनाया जा सके । ऐसा लगता है जैसे इन संगठनों के नाम ले लेने से इस संगठन के लोग बहुत ईमानदार मान लिए जायेंगे या बहुत विशेषज्ञ अन्वेषणकर्ता हो जायेंगे ।

केंद्रीय जांच एजेंसी के भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं है। अब तो सी बी आई के जांच में यह भी देखने को मिलता है कि प्रमुख व्यापारिक कंपनियों द्वारा लाखों करोड़ो के घुटालों में किसी छोटे कर्मचारी या मैनेजर के पद पर काम करने वालों को अभियुक्त बना दिया जाता है और कम्पनी का प्रबंध निदेशक या निदेशक या मुख्य अधिशासी अधिकारी, जो वास्तव में उस अपराध का लाभार्थी होता है, उसके विरुद्ध तो आरोप पत्र भी नहीं प्रस्तुत किया जाता है । उसे जांच प्रारंभ करने के पहले ही निर्दोष मान लिया जाता है ।

यही हाल बैंको के बड़े बड़े घोटालो में भी हो रहा है ।हजारों करोड़ों के घुटालो में बैंक का सबसे छोटे अधिकारी को दोषी मान कर, उसके विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर जांच एजेंसी अपना हाथ झाड़ लेते हैं, जब कि बैंक के उच्चतम अधिकारीयों के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध रहता है परन्तु उन्हें निर्दोष मान कर गवाहों की श्रेणी में डाल दिया जाता है ।

   आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में आर्थिक अपराधों की बाढ़ सी आ गयी है जिसके कारण अब और भी बेईमानी के अन्वेषण और अक्षम अन्वेषण का कोई स्थान नहीं रह गया है ।इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड्स व इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के प्रयोग और उपलब्धता से किसी भी अपराध के साक्ष्य आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं, बस जरूरत है नीयत, बुद्धि, विवेक, प्रक्षिक्षण और लगन की ।  

साथ ही साथ जरूरत है जांच एजेंसियों को अनुशासित करने की । यह जिम्मेदारी अदालतों पर भी डालनी चाहिए कि मुक़दमे का फैसला देते समय जांच कर्ता के आचरण पर भी अपनी राय रखे जिससे यदि जांचकर्ता के आचरण के कारण कोई मुकदमा छूटता है या किसी बेगुनाह को फंसाया गया है या कोई अपराधी, जिसे अभियुक्त बनाना हो और न बनाया गया हो तो जांच कर्ता के विरुद्ध आवश्यक कार्यवाई की जा सके ।  

​1979 से पुलिस संरचना और कार्यपद्धति में सुधार के लिए कई राष्ट्रीय पुलिस आयोग गठित किये गए जिन्होंने कई सिफारिशे की परन्तु उन्हें कभी किसी भी राज्य ने लागू नहीं किया । उल्लेखनीय है कानून व्यवस्था राज्य का विषय है ।विभिन्न पुलिस आयोग के सिफारिशों को लागू करने के लिए 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह व एक अन्य उच्च पुलिस अधिकारी एन के सिंह ने मिल कर एक याचिका प्रस्तुत किया जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार सभी राज्यों को नोटिस जारी की परन्तु किसी भी राज्य ने उस याचिका की सुनवायी के लिए रूचि नहीं दिखाई ।

अंत में लगभग दस वर्षों बाद, 2006 में, सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस आयोगों द्वारा सिफारिश की गयी सात निर्देशों को लागू करने के लिए निर्देश जारी किया परन्तु उन सिफारिशों कोआज तक किसी भी राज्य ने नहीं माना । सिर्फ आन्ध्र प्रदेश और अरुणांचल ने एक दो सिफारिशों को लागू किया है, बाकी के राज्य, तमाम दबाव के बावजूद, पुलिस सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषय पर पूर्ण उदासीन बने हुए हैं । 2010 में ‘कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिवस ने उन सात निर्देशों को मात्र,’ प्रैक्टिकल मेकनिज्म टू किक स्टार्ट रिफॉर्म्स’ बताया।

​यदि भारत जैसे प्रजातान्त्रिक देश को विश्व के सर्वश्रेष्ठ कानून व्यवस्था वाले राज्य की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर लाना है तो पुलिस सुधार के साथ साथ उच्च कोटि के अन्वेषण करने वाली संस्था को स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है ।

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