
राम दत्त त्रिपाठी

भारत की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी उपजाऊ मिट्टी है।हजारों वर्षों पहले हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और दूसरी नदियाँ अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लेकर आईं। हर वर्ष आने वाली बाढ़ नई जलोढ़ मिट्टी बिछाती रही। इसी मिट्टी ने उत्तर भारत के विशाल मैदानों को दुनिया के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में बदल दिया। इसी धरती ने सभ्यताओं को जन्म दिया। करोड़ों लोगों का पेट भरा। भारत को कृषि प्रधान देश बनाया।
लेकिन आज यही मिट्टी संकट में है।हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत का लगभग 30 प्रतिशत भूभाग किसी न किसी रूप में भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। लाखों हेक्टेयर घास के मैदान भी समाप्त हो चुके हैं। यह केवल पर्यावरण की खबर नहीं है। यह खेती, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और भारत के भविष्य की खबर है।
मरुस्थलीकरण का मतलब क्या है?
मरुस्थलीकरण का अर्थ केवल रेगिस्तान का फैलना नहीं है। इसका मतलब है कि जमीन अपनी उर्वरता खोने लगे। मिट्टी में जैविक पदार्थ कम हो जाए। पानी रोकने की क्षमता घट जाए। खेती की लागत बढ़े और उत्पादन घटने लगे।
यानी खेत दिखने में पहले जैसे रहें, लेकिन उनकी ताकत धीरे-धीरे खत्म होती जाए।
मिट्टी क्यों बीमार हो रही है?
इस संकट का कोई एक कारण नहीं है।जलवायु परिवर्तन से बारिश का स्वरूप बदल रहा है। कहीं सूखा है तो कहीं अचानक बाढ़।
जंगलों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ा है।
अत्यधिक भूजल दोहन ने कई क्षेत्रों में जलस्तर को खतरनाक स्तर तक पहुँचा दिया है। जब जमीन से लगातार पानी निकले और उसकी भरपाई न हो, तो मिट्टी और खेती दोनों प्रभावित होते हैं।
हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। लेकिन कई क्षेत्रों में वर्षों तक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग, एक ही फसल पर निर्भरता और भूजल के अत्यधिक दोहन ने मिट्टी की सेहत पर भी दबाव डाला। आज वैज्ञानिक भी मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।
जब बैल खेतों से गए
भारतीय खेती की सबसे बड़ी ताकत उसका प्राकृतिक चक्र था।
खेत पशुओं को चारा देते थे। पशु खेतों को गोबर की खाद देते थे। खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक थे।
मशीनीकरण ने खेती को आसान बनाया। ट्रैक्टर और आधुनिक उपकरणों ने किसानों का समय और श्रम बचाया।
लेकिन इसका एक दूसरा असर भी हुआ। बैलों की जरूरत कम होती गई। गोबर की उपलब्धता घटी। प्राकृतिक खाद का उपयोग कम हुआ। उसकी जगह रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ती गई। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता कई क्षेत्रों में कमजोर पड़ने लगी।
आज आवश्यकता आधुनिक कृषि और प्राकृतिक खेती के अच्छे तत्वों के बीच संतुलन बनाने की है।
सिकुड़ती खेती की जमीन
एक और बड़ा संकट खेती योग्य भूमि का लगातार कम होना है।
देश में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। नए शहर बस रहे हैं। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, वेयरहाउस और आवासीय परियोजनाएँ बन रही हैं।
विकास आवश्यक है। सड़कें, उद्योग और बेहतर संपर्क किसी भी देश की जरूरत हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की योजना बनाते समय उपजाऊ कृषि भूमि को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?
क्या हर परियोजना के लिए सबसे उपजाऊ जमीन ही सबसे आसान विकल्प बन जाती है?
यही प्रश्न भविष्य की नीति का केंद्र होना चाहिए।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मिलती सीख
गंगा और यमुना के दोआब का पश्चिमी उत्तर प्रदेश कभी अपनी उपजाऊ मिट्टी, गन्ने के खेतों और समृद्ध कृषि के लिए जाना जाता था।
आज इस क्षेत्र में तेज शहरीकरण, कंक्रीटीकरण और बड़े बुनियादी ढाँचे का विस्तार दिखाई देता है। दिल्ली-एनसीआर का फैलाव, नए एक्सप्रेसवे, औद्योगिक क्षेत्रों और आवासीय परियोजनाओं ने भूमि उपयोग का स्वरूप बदला है। साथ ही भूजल पर दबाव बढ़ा है और हिंडन जैसी नदियों का प्रदूषण भी गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। विभिन्न अध्ययनों में भूमि उपयोग में बदलाव के कारण भूजल पुनर्भरण घटने और सतही बहाव बढ़ने की ओर संकेत किया गया है। यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है।
यह किसी एक परियोजना का प्रश्न नहीं है। सवाल यह है कि विकास की योजना बनाते समय मिट्टी, पानी और पर्यावरण का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
सबसे अधिक मार किस पर?
इस संकट की सबसे बड़ी कीमत गरीब चुकाता है।
छोटा किसान।सीमांत किसान।
पशुपालक।खेतिहर मजदूर।
जब मिट्टी कमजोर होती है तो उत्पादन घटता है। जब उत्पादन घटता है तो आय कम होती है। जब चरागाह समाप्त होते हैं तो पशुपालन महंगा हो जाता है। जब भूजल नीचे जाता है तो सिंचाई की लागत बढ़ जाती है।
यानी सबसे बड़ी चोट उसी पर पड़ती है जिसके पास सबसे कम संसाधन हैं।
तीन बड़े खतरे
पहला खतरा पर्यावरण के लिए है। मिट्टी की उर्वरता घटती है। जैव विविधता कम होती है। भूजल रिचार्ज प्रभावित होता है। गर्मी, सूखा और बाढ़ जैसी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
दूसरा खतरा रोजगार के लिए है। भारत के करोड़ों लोग खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। भूमि और पानी का संकट ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
तीसरा खतरा खाद्य सुरक्षा के लिए है। यदि खेती योग्य भूमि घटती रही और मिट्टी की गुणवत्ता गिरती रही तो भविष्य में बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त और सस्ता भोजन उपलब्ध कराना कठिन हो सकता है।
विकास का नया अर्थ
बात विकास के विरोध की नहीं है।बात मानव और प्रकृति के सामंजस्य की है।
भारत को सड़कें चाहिए। एक्सप्रेसवे चाहिए। उद्योग चाहिए। आधुनिक शहर भी चाहिए।
लेकिन भारत को उपजाऊ खेत भी चाहिए। स्वच्छ नदियाँ भी चाहिए। चरागाह भी चाहिए। स्वस्थ मिट्टी भी चाहिए।
किसी देश की समृद्धि केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने किलोमीटर सड़क बनाई। यह भी देखना होगा कि उसने कितनी उपजाऊ भूमि बचाई, कितना भूजल सुरक्षित रखा और कितने किसानों की आजीविका मजबूत की।
आगे का रास्ता
समाधान विकास रोकना नहीं है।समाधान है टिकाऊ और पर्यावरण हितैषी विकास।
ऐसा विकास जिसमें भूमि उपयोग की बेहतर योजना हो। उपजाऊ कृषि भूमि की रक्षा हो। भूजल का विवेकपूर्ण उपयोग हो। वर्षा जल संचयन बढ़े। रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग हो। मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने पर जोर दिया जाए। खेती और पशुपालन के प्राकृतिक संबंध को फिर से मजबूत किया जाए।
आज जरूरत केवल नई परियोजनाएँ बनाने की नहीं है। जरूरत मिट्टी की सेहत बचाने की भी है।
क्योंकि मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी।खेती बचेगी तो किसान बचेगा।किसान बचेगा तो रोजगार बचेगा।
और तभी भारत की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत रहेगी।
महात्मा गांधी ने कहा था, “प्रकृति हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।”
शायद आज भारत की मिट्टी हमें यही संदेश दे रही है।
विकास की रफ्तार बनी रहे, लेकिन उसकी दिशा ऐसी हो जिसमें मानव और प्रकृति साथ-साथ आगे बढ़ें। यही पर्यावरण हितैषी और टिकाऊ विकास का रास्ता है। यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है।
लेखक परिचय :
राम दत्त त्रिपाठी भारत के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं जिनका पत्रकारिता में चार दशकों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में 21 वर्षों तक काम किया और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के प्रत्यक्षदर्शी संवाददाता रहे। 24 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अयोध्या फ़ैसले की सटीक खबर उन्होंने सबसे पहले दी। गंगा प्रदूषण और पर्यावरण पर उनकी पत्रकारिता 1989 से जारी है। अब वे ramdutttripathi.in और mediaswaraj.com के माध्यम से स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं। वे लखनऊ में रहते हैं और उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ जर्मनी के गोटिंगेन विश्वविद्यालय में ‘आरडी त्रिपाठी पेपर्स’ के रूप में सुरक्षित हैं।



