गंगा के उद्गम प्रदेश देवभूमि उत्तराखंड में नमामि गंगे पर ₹1,000 करोड़ खर्च के बाद भी गंगाजल आचमन के योग्य नहीं — CAG रिपोर्ट का खुलासा . हरिद्वार महाकुंभ 2027 से पहले बड़ा सवाल
राम दत्त त्रिपाठी

सनातन हिंदू धर्म में आचमन — अर्थात् पूजा से पहले हथेली में गंगाजल लेकर पीना — शुद्धि का सबसे पवित्र कर्म माना जाता है। लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि देवभूमि उत्तराखंड में — जहाँ गंगा जन्म लेती है — नमामि गंगे पर अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद गंगाजल आचमन के योग्य भी नहीं रहा ।
मार्च 2026 में उत्तराखंड विधान सभा के गैरसेंण में हो रहे बजट सत्र में पेश हुई CAG की रिपोर्ट (Report No. 2 of 2025) 2018 से 2023 के बीच नमामि गंगे कार्यक्रम का लेखा-जोखा है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है: हरिद्वार में गंगाजल ‘B श्रेणी’ में है — स्नान के लिए सीमांत, पीने या आचमन के लिए अयोग्य। और यह स्थिति तब है जब हरिद्वार महाकुंभ 2027 केवल कुछ महीनों दूर है।
₹1,000 करोड़ खर्च, पर गंगा की सेहत नहीं सुधरी
केंद्र सरकार ने 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड को नमामि गंगे के तहत लगभग ₹1,000 करोड़ दिए। यह कार्यक्रम 2014 में ₹20,424 करोड़ के विशाल बजट के साथ शुरू हुआ था। परंतु CAG ने पाया कि धन का बड़ा हिस्सा या तो बर्बाद हुआ या अनुपयोगी ढाँचे पर खर्च हुआ जो कभी काम ही नहीं किया।
सबसे चौंकाने वाले आँकड़े वन विभाग के
गंगा के पारिस्थितिक पुनर्जीवन के लिए FIG (Forestry Interventions for Ganga) योजना में ₹885.91 करोड़ और 54,855 हेक्टेयर वृक्षारोपण का लक्ष्य था। खर्च हुआ मात्र ₹144.27 करोड़ — यानी केवल 16 प्रतिशत। शेष 84% धनराशि उपयोग में ही नहीं आई।
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट — नाम के
CAG ने 2023 में उत्तराखंड के 44 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का निरीक्षण किया। परिणाम भयावह रहे:
• 44 में से केवल 3 से 5 STP ही NGT के मानकों पर खरे उतरे
• मात्र 6 से 12 STP पर्यावरण मंत्रालय (MoEF) के मानकों को पूरा कर सके
• अधिकांश STP में BOD, TSS और Faecal Coliform के स्तर तीनों तिमाहियों में अनुमत सीमाओं से बहुत अधिक रहे
• गौमुख से हरिद्वार के बीच 16 शहरों में फैले 21 STP से एक भी घर को जोड़ा नहीं गया.
कनेक्टिविटी की स्थिति देखें तो तस्वीर और भी दयनीय हो जाती है: हरिद्वार में 69%, ऋषिकेश में 29%, श्रीनगर में 12%, उत्तरकाशी में 9%, और चमोली में मात्र 6% घरों में सीवर लाइन जुड़ी थी। बाकी घरों का अनुपचारित मलजल सीधे गंगा की सहायक नदियों में बह रहा है।
विडंबना यह है कि हरिद्वार के 68 MLD क्षमता के STP पर कभी-कभी 84 MLD तक बोझ पड़ा — यानी क्षमता से 24% अधिक। दूसरी ओर देवप्रयाग का STP मुश्किल से 70 घरों का सीवेज उठा रहा था।
लापरवाही की कीमत जानें गईं
CAG रिपोर्ट केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है — इसमें अनकही मानवीय त्रासदी भी दर्ज है।
अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट न होने के कारण रुद्रप्रयाग में 75 KL क्षमता का STP 2021 में भूस्खलन में नष्ट हो गया और ₹88 लाख की सरकारी संपत्ति बर्बाद हुई। CAG ने इसे ‘परिहार्य हानि’ बताया। इससे भी दर्दनाक है चमोली STP की घटना — 2023 में विद्युत दुर्घटना में 28 लोगों को बिजली का झटका लगा और 16 की जान चली गई।
ये हादसे सरकारी लापरवाही की पराकाष्ठा हैं।
पहाड़ी शहरों में कूड़ा, घाटों पर चिताएँ
10 पहाड़ी कस्बों में CAG के निरीक्षकों ने पाया कि कूड़ा या तो नदी की ढलान पर फेंका जा रहा था या जलाया जा रहा था, जो बाद में बारिश में गंगा में बह जाता था।
चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी में 11 स्थानों पर शवदाह घाट बनाए गए — लेकिन स्थानीय जरूरतों और परंपराओं का आकलन किए बिना। नतीजा यह कि वे घाट आज खाली और जर्जर पड़े हैं, जबकि नदी किनारे खुली चिताएँ पहले की तरह जलती रहती हैं।
13 साल में एक योजना भी नहीं बनी
CAG रिपोर्ट का सबसे गंभीर तथ्य यह है: 2011 में राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण ने 2020 तक गंगा में अनुपचारित शहरी अपशिष्ट जल और औद्योगिक प्रवाह रोकने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 2026 आ गया — 13 साल बाद भी कोई योजना नहीं बनी। गंगा बेसिन के एक भी जिले में District Ganga Plan नहीं है।
यह महज प्रशासनिक विफलता नहीं है — यह नीतिगत इच्छाशक्ति का अभाव है।
2017 में भी यही हुआ
CAG की यह रिपोर्ट पहली बार नहीं आई। 2017 में भी CAG ने नमामि गंगे में अप्रयुक्त धनराशि, दीर्घकालिक योजना का अभाव, और प्रदूषण नियंत्रण कार्यों की निष्क्रियता पर सरकार को आड़े हाथों लिया था। एक दशक बाद वही आरोप, वही विफलताएँ — और गंगा का वही हाल।
2027 महाकुंभ: पवित्रता की परीक्षा
हरिद्वार में 2027 में महाकुंभ होना है। करोड़ों श्रद्धालु हर की पौड़ी पर डुबकी लगाएँगे — इस विश्वास के साथ कि वे पवित्र जल में स्नान कर रहे हैं। लेकिन CAG रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार में गंगा का जल गुणवत्ता वर्ग ‘B’ में है — स्नान के लिए सीमांत, पीने या आचमन योग्य नहीं। और यह गैर-कुंभ समय की स्थिति है।
महाकुंभ के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़, अस्थायी शिविरों का कचरा, और बढ़ा हुआ मल-जल प्रवाह इस स्थिति को और गंभीर बना देगा।
2021 के प्रयागराज कुंभ में गंगा प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ा था — हरिद्वार में बुनियादी ढाँचा उससे भी कमज़ोर है।
श्रद्धा और कर्म के बीच की खाईं
हम गंगा को ‘माँ’ कहते हैं। उनके जल से आचमन करते हैं। पर हमारा आचरण क्या कहता है? गंगा किनारे के घरों का मल-जल उन्हीं में बहाते हैं। पूजा की सामग्री, प्लास्टिक, और अस्थियाँ उन्हीं में विसर्जित करते हैं। और सरकारें? ₹1,000 करोड़ खर्च कर ऐसे STP बनाती हैं जो किसी घर से नहीं जुड़े।
यह विरोधाभास केवल व्यक्तिगत आस्था का नहीं, व्यवस्थागत पाखंड का है। CAG की रिपोर्ट इसी पाखंड के ख़ुलासे का दस्तावेज़ है।
आगे का रास्ता
CAG रिपोर्ट केवल सरकार की आलोचना नहीं करती — वह एक रोडमैप भी सुझाती है। प्रत्येक ज़िले में गंगा योजना बने। STP का संचालन पारदर्शी हो। स्थानीय समुदायों को निर्माण और रखरखाव में शामिल किया जाए। और सबसे ज़रूरी — खर्च किए गए हर रुपये का जवाबदेही तय हो।
2027 का महाकुंभ एक अवसर है — केवल आध्यात्मिक नवीनीकरण का नहीं, बल्कि गंगा के प्रति हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी की पुनर्प्रतिज्ञा का। लेकिन यह तभी संभव है जब श्रद्धा शब्दों से निकलकर कर्म में उतरे।
नहीं तो हर की पौड़ी पर स्नान आस्था का प्रतीक तो होगा — स्वच्छता का नहीं।
स्रोत: CAG Report No. 2 of 2025, Uttarakhand Legislative Assembly (March 2026) | Namami Gange Programme Performance Audit 2018–2023
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