गंगा का संकट और समाधान

अगर नदी और लोगों के बीच से सरकार हट जाय, तो गंगा ही नहीं, देश की सारी नदियां वापस अपने रूप में आ सकती हैं और हमारा जल चक्र ठीक हो सकता है।

निलय उपाध्याय

अंग्रेजों ने गंगा के साथ वही सलूक किया, जो यहां के लोगों के साथ किया। गंगा के साथ सरकार का अंग्रेजों वाला ही रिश्ता आज भी है। आजाद होने के बाद गंगा को तो पता ही नहीं चला कि यह सब इतना चुपके चुपके कैसे और कब हो गया। गंगोत्री से हरिद्वार तक की यात्रा में गंगा बस गंगनानी के ऊपर ही दिखती है, इसके बाद गंगा का दर्शन तो बस झील दर्शन है। केदार नाथ और बद्रीनाथ के रास्तों पर भी बांधों के ही दर्शन होते हैं। गंगा का संकट जल के चरित्र का संकट है। आने वाले समय में यह जल संकट भयानक रूप लेने वाला है। इससे बचने का एक ही रास्ता है कि अगर नदी और लोगों के बीच से सरकार हट जाय, तो गंगा ही नहीं, देश की सारी नदियां वापस अपने रूप में आ सकती हैं और हमारा जल चक्र ठीक हो सकता है।

चार महीनों तक गंगा के साथ रहा। स्वर्ग लोक की ऊंचाइयों से मृत्युलोक और पाताल लोक की गहराई तक यात्रा करते हुए, गंगा के अनगिनत संकटों को प्रवृत्तियों की तरह देखने और गहन विश्लेषण के बाद मुझे मूलत: पांच संकट नजर आए। बंधन, विभाजन, प्रदूषण, गाद और भराव। ये संकट नदी को मौत तक पहुंचा देते है। इन अर्थों में गंगा मौत के बहुत करीब है।

बंधन : गंगा घाटी में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर कितने बांध बनाये गये हैं, इसका एक काल्पनिक चित्र बनाकर देखें कि वह चित्र कैसा लगता है और तब खुद से पूछें कि इतने सारे बंधनों में बंधी गंगा, क्या राष्ट्रीय नदी हो सकती है। क्या यह नदी न्यायालय से मानवीय अधिकार प्राप्त नदी हो सकती है? देश गुलाम था, यहां के लोग गुलाम थे। अंग्रेजों ने गंगा के साथ वही सलूक किया, जो यहां के लोगों के साथ किया। गंगा के साथ सरकार का अंग्रेजों वाला ही रिश्ता आज भी है। आजाद होने के बाद गंगा को तो पता ही नहीं चला कि यह सब इतना चुपके चुपके कैसे और कब हो गया। गंगोत्री से हरिद्वार तक की यात्रा में गंगा बस गंगनानी के ऊपर ही दिखती है, इसके बाद गंगा का दर्शन तो बस झील दर्शन है। केदार नाथ और बद्रीनाथ के रास्तों पर भी बांधों के ही दर्शन होते हैं। गंगा का संकट जल के चरित्र का संकट है। आने वाले समय में यह जल संकट भयानक रूप लेने वाला है। इससे बचने का एक ही रास्ता है कि अगर नदी और लोगों के बीच से सरकार हट जाय, तो गंगा ही नहीं, देश की सारी नदियां वापस अपने रूप में आ सकती हैं और हमारा जल चक्र ठीक हो सकता है। इस बंधन के घाटे का आकलन नहीं हो सकता। जब हम इसका आकलन करते हैं तो यह सरकारों की मूर्खता या अदूरदर्शिता नहीं, लूट का तरीका समझ में आता है। जैसे गांव में रात को डकैत आते थे।

फरक्का

घर के लोगों की पिटाई करते थे और उन्हें बांध देते थे। किसी को बांध दो तो लूटना आसान हो जाता है। गंगा को जहां-जहां बांधा गया है, वहां-वहां जितनी जल की लूट हुई है, उतनी कमीशन की भी नहीं हुई। इस लूट में जितने देशी लोग शामिल हैं, उतने ही विदेशी भी हैं। वे कर्ज देते हैं और कमीशन देकर काम करने के बहाने अपना पैसा वापस ले जाते हैं। इन बांधों का एकमात्र लाभ यह है कि हमें बिजली मिलती है। लेकिन एक नजर घाटे पर भी डालते हैं। गंगा की मिट्टी जो हिमालय से चलती है, बांध में जाकर रुक जाती है और बिहार के किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पाता, टनल से गुजरती गंगा के जल को धूप नहीं मिलती। झील में जाकर पानी रुक जाता है और प्रदूषित होता है। प्रोटेक्शन वाल न होने के कारण पानी रिसकर पहाड़ में जाता है। कई गांव गिरकर झील में समा चुके हैं। यह इससे भी खतरनाक खबर है कि हिमालय की कॉपर प्लेट गल चुकी है। हिमालय खतरे में है। गांव लगभग खाली हो चुके हैं। अकेले टिहरी में इतना पानी जमा है कि अगर कहीं यह बाँध दरका, तो ऎतिहासिक हादसे का कारक बनेगा। हरिद्वार तिनके की तरह बह जाएगा, दिल्ली भी नहीं बचेगी। यह भूकंप क्षेत्र है, यह जानते हुए भी ये बांध बनाए गए। अगर जीवन की रक्षा करनी है, तो अब नए बांधों की मंजूरी नहीं देनी चाहिए। पुराने बांधों को भी धीरे-धीरे चरणबद्ध ढंग से खाली कर देना चाहिए। बिजली बनाने के बहुत तरीके हो सकते हैं, गंगा बनाने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है। अगर अब भी नहीं चेते, तो परिणाम भयावह हो सकते है।

विभाजन : जहां-जहां गंगा बंधी है, वहीं पर विभाजित भी हुई है। पहाड़ में विभाजित होने के बाद झील में सड़कर टनल में गई है और अपना औषधिय गुण खोकर वापस आई है। हरिद्वार, बिजनौर और नरोरा आते आते पूरी तरह लुट गई है। कानपुर तक गंगा का जल खेतों में है, नदी के पाट में नहीं है। गंगा का जल उद्योगों में है, क्योकि हर उद्योग को माल धोने के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता है।

हरिद्वार में जमीन पर उतरते ही गंगा के जल की लूट मच जाती है। सरकार गंग नहर से खेतों की सिंचाई और दिल्ली के निवासियों के पीने के लिए सारा पानी ले जाती है। हरिद्वार नहर से तीन धाराएं अलग से निकलती हैं। एक धारा पुराने श्मशान के लिए, दूसरी धारा आश्रमों के दरवाजों पर चक्कर लगाने के लिए और तीसरी धारा खेती और हरिद्वार का नाला धोने के लिए जाती है। इसके बाद जो थोड़ा सा जल बचता है, वह गंगा की मूल धारा में मिलता है और आगे जाता है। उत्तर प्रदेश में नेता साफ़ कहते है की नहर वोट देती है, गंगा नहीं | पूरे उत्तर प्रदेश में जिस तरह नहरों का जाल बिछा है, उसके बाद गंगा मे नालों और रसायन का पानी भी नही बचता। नरोरा एटमिक प्लांट से निकलने वाली गंगा का हाल यह होता है कि उसे बकरी पैदल पार कर जाती है। यह उस भारत की विडम्बना है, जहाँ पंच तत्व चिंतन पर जोर दिया गया है, जहां जल को देवता और गंगा को मां का मान दिया गया है।

​टिहरी

प्रदूषण : गंगा में प्रदूषण गंगोत्री से ही आरम्भ हो जाता है। गंगोत्री में गंगा के मंदिर का नाला सबसे पहले गंगा को प्रदूषित करता है। उसके बाद गंगा तट पर जितने भी शहर बने हैं, जितने आश्रम बने हैं, सबका नाला गंगा में गिरता है। इसकी शुरूआत पुराण काल में ही हो गई थी, जब वैदिक मर्यादा का उल्लंघन कर गंगा का पाट तोड़ दिया गया था और तट पर लोग बसने लगे थे। पहले गंगा के तट पर देवता आए, फ़िर राजा और अब तो नगर बस गए हैं। सबका नाला गंगा में ही गिरता है।

आगे जब हम गंगा के प्रदूषण की बात करते हैं तो सिर्फ़ गंगा ही नहीं, उन तमाम नदियों के प्रदूषण की बात करनी होगी, जो गंगा में आकर मिलती हैं। कन्नौज में जहां राम गंगा और काली नदी आ कर मिलती हैं, वहां गंगा पूरी तरह से नाला बन जाती है। इसके चार कारण हैं। 1. जल की कमी, 2. सहायक नदियां, 3. नगर और उद्योग तथा 4. धार्मिक क्रिया कलाप। अगर गंगा में जल की मात्रा रहे तो वह अपने प्रवाह, मिट्टी और हवा के कारण अपने को कुछ स्वच्छ कर सकती है। मगर बिलकुल आपाधापी में गंगा के किनारे नगर बसाए गए, उद्योग लगाए गए, जल निकासी के लिए आज भी हमारे पास कोई नीति नहीं है। इसे समझने के लिए मैंने कई जगहों की यात्रा की और उसी क्रम में अहमदाबाद भी गया। अहमदाबाद का मल-जल वहां की नदी में नहीं जाता, बल्कि उसका शोधन होता है। वहां से निकलने वाला जल खेतों में सिंचाई के लिए जाता है और मल का खाद बनता है, जो 300 रूपए किलो बिकता है और लाभ में है। यह विज्ञान का समय है। आज कोई भी वस्तु बेकार नहीं है। हर शहर से निकलने वाले मल जल से वहां की बिजली जलाई जा सकती है। जिस नगर के नाले गंगा में या किसी नदी में गिरते है वहां की नगर पालिका लोगों से टैक्स लेती है कि वे जल मल निकासी की व्यवस्था करेंगे। क्या लोग इसलिए टैक्स देते है कि आप हमारा मल गंगा में गिरा दें? टेम्स नदी को लंदन की गंगा कहा जाता है। लंदन टेम्स के किनारे है। आबादी बढ़ने के साथ ही टेम्स नदी में भी प्रदूषण बढ़ता गया और वह मरने के कगार पर आ गई। सफाई के अभियान शुरू किए गये, लेकिन सफ़लता तब मिली जब महीने में एक दिन जहां-जहाँ से टेम्स नदी गुजरती है, लोग सफाई करते हैं। लोगों ने टेम्स को डेढ़ सौ साल पहले जैसी बना दिया है। गंगा नदी की सफ़ाई को मासिक पर्व बना दिया जाय।

गाद : गाद को समझने के लिए गंगा का पथ और प्रवाह समझना होगा। जिस पथ पर मैंने यात्रा की, वह गंगा का सदियों पुराना पथ था, जिस प्रवाह के साथ यात्रा की वह गंगा का प्रवाह था। पथ तो वहीं था, पर प्रवाह वह नहीं था। इसे समझने के लिए समुद्र तल से उंचाई और दूरी को समझना पडेगा क्योंकि समुद्र तल मानक है। यह पृथ्वी गोल है। उंचाई मापने के लिए समुद्र तल का इस्तेमाल किया जाता है। यह भी माना जाता है कि पूरी दुनिया में समुद्र का तल एक होता है इसलिए उंचाई मापने के लिए समुद्र के जल से अच्छा मानक दूसरा नहीं है।

समुद्र तल से गंगोत्री की उंचाई 3415 मीटर है। केदार नाथ की उंचाई 3584 मीटर है। बद्री नाथ की उंचाई 3300 मीटर है। समुद्र तल से हरिद्वार की उंचाई 250 मीटर है। समुद्र तल से बनारस की उंचाई 81 मीटर है। समुद्र तल से भागलपुर की उंचाई 52 मीटर है। समुद्र तल से फ़रक्का की उंचाई 12 मीटर है। समुद्र तल से कलकत्ता की उंचाई 9 मीटर है। गंगोत्री से हरिद्वार की दूरी 300 किलोमीटर है। हरिद्वार से बनारस की दूरी लगभग 800 किलोमीटर है। बनारस से भागलपुर की दूरी 600 किलोमीटर है। भागलपुर से फ़रक्का की दूरी 150 किलोमीटर है। फ़रक्का से कलकत्ता की दूरी 300 किलोमीटर है।

गंगा की जितनी धाराएं हैं, वे गंगोत्री, केदार नाथ और बद्री नाथ की ओर से आती है जो 3300 मीटर से उपर है। जब गंगा हरिद्वार आती है, तो 3000 मीटर की ऊंचाई से लुढ़कती हुई आती है। पहाड़ में टनल बनाने का काम इसीलिए होता है कि इस ऊंचाई से उसके उतरने की गति का इस्तेमाल किया जा सके। हरिद्वार से वाराणसी की दूरी लगभग 800 किलोमीटर है। समुद्र तल से बनारस की उंचाई 81 मीटर है। यानी गंगा हर मीटर की दूरी 3 सेन्टीमीटर की ढलान के साथ करती है। वाराणसी से भागलपुर और कलकत्ता तक उसका प्रवाह घटता जाता है, मगर उसका पाट चौड़ा होता जाता है। बक्सर के बाद गंगा का पाट दो किलोमीटर से बढता हुआ 8 किलोमीटर तक हो जाता है। कलकत्ता तक समुद्र की लहरें आती हैं और कई बार ऎसी घटनाएं हुईं, जब गंगा में नहाते लोगों को समुद्र खींच कर ले गया है और बड़ी कठिनाई से लोगों के प्राण बचाए गए हैं। जब वेग कम होगा और पाट बढ़ेगा तो जल में कचरा जमता है। यह कचरा मल का नहीं, बल्कि भारी और नकली रसायनों का है। गंगा के पास इतना पानी नहीं रहता कि वह अपने जल से उस गाद को बहा सके। इसके फ़लस्वरूप नदी के बीच गाद जम जाती है और वह किनारे से होकर बहने लगती है, इसके कारण गंगा का पाट चौड़ा होता जाता है और कटाव होने लगता है। कटाव के कारण हजारों गांवों के लोग विस्थापित होते हैं।

इसे भी पढ़ें :

गंगा को जान-बूझकर मारा जा रहा है– राजेन्द्र सिंह

गाद पर दियारा क्षेत्र बनता है, जो अपराधियो का स्वर्ग बन जाता है। गाद से भूतल जल में रसायन समाता है और बीमारियों का कारण बनता है। नदी के तट पर बोल्डर गिराने के बजाय, उसके गर्भ को साफ़ कर दिया जाय तो नदी अपनी मूल धारा में रहेगी। गंगा गर्भ, गंगा तट और गंगा क्षेत्र का सीमांकन किया जाना चाहिए। यह सच्चाई है कि बाढ़ में भी नदी उसी जगह तक जाती है, जहां कभी उसकी धारा थी। अगर बनारस तक यानी समुद्र तल से 81 मीटर की उंचाई तक बाढ़ का असर दिखता है, तो समझा जा सकता है कि गंगा में कितनी गाद जमा है।
भराव : झारखंड के दो जिले साहबगंज और राज महल गंगा तट पर बसे हैं। यहां गंगा का प्रवाह प्रति कोस आठ इंच है। इस इलाके में हजारों क्रशर मशीनें लगी हैं। पत्थर तो बिक जाते हैं, मगर मिट्टी, बारिश में बहकर गंगा में समा जाती है। इस भराव और फ़रक्का बांध के कारण पानी नहीं निकल पाता और बाढ़ आती है, तो बिहार को डुबा जाती है। फ़रक्का में हजारों एकड़ लंबा चौड़ा मिट्टी का द्वीप बन चुका है। इस इलाके से क्रशर उद्योग को हटा देना चाहिए। अगर जरूरी हो तो मिट्टी का भी अलग उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि मिट्टी गंगा में न जा सके। फ़रक्का बांध बनाने के बाद वह इंजीनियर, जिसने बांध बनाया था, आज यह बयान दे रहा है कि फ़रक्का में यह नहीं बनना चाहिए था। यह गलत हुआ, किन्तु उसे गलत कहने वाला इंजीनियर गुमनाम जिन्दगी जीकर मर गया। हल्दिया की भी वही स्थिति हो गई है, जो उसके पहले के बंदरगाह हुगली की थी।

समाधान : कपिल मुनि ने कहा है कि प्रकृति का सम्यक ज्ञान ही मोक्ष है। कर्ता पुरुष नहीं होता, प्रकृति होती है। हमारे ऋषि कहते हैं कि अगर गुणों में साम्य हो तो प्रकृति के परिणाम दिखाई नहीं देते। अगर विषम हों, तो परिणाम दिखाई देते हैं और जीवन पर उसका असर दिखाई देता है। यह उसी तरह है, जैसे माया। विषम परिणाम विनाशी होता है। पुरूष का यज्ञ प्रकृति को साम्य अवस्था में लाने का दूसरा नाम है। भारतीय दर्शन इसे समझाने के लिए पूछता है- गंगा का दुःख क्या है? वह मरण शय्या पर है| गंगा के दुःख का कारण क्या है? पानी रोकना और नाला गिरना। समाधान क्या है? नाला रोको, पानी छोड़ो| जल चक्र से नाता जोड़ो। सुख की अवस्था कैसी हो? गर्भ हो, घाट हो, तट हो, पाट हो और गंगा का मान हो| गंगा ही नहीं तमाम नदियों पर बंधन, विभाजन, प्रदूषण, गाद और भराव के कारण उसके विषम परिणाम साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे हैं। राज्यों का आर्सेनिक मैप और राज्य का मैप बराबर हो चुका है। यह विषमता 2500 किलोमीटर के प्रवाह में अनगिनत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

twenty + fifteen =

Related Articles

Back to top button