आपकी जमा पूंजी को अब एक और नया ख़तरा

प्रस्तावित एफ़.एस.डी.आर. बिल 2019 से, आप अपनी जीवन भर की कमाई से वंचित हो सकते हैं

असद मिर्ज़ा
असद मिर्ज़ा

—असद मिर्ज़ा

कोरोना वायरस के कारण देश की वर्तमान जीर्ण आर्थिक स्थिति में, जहां एक आम आदमी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हर संभव संघर्ष कर रहा है, कुछ शक्तियां सरकारी बैंकों में जमा आम लोगों के पैसे हड़पने के लिए अपना गुप्त अभियान जारी रखे हुए हैं। यह प्रक्रिया 2017 में शुरू हुई थी। हम भारतीयों की, चाहे शिक्षित हों या अशिक्षित, एक ख़ास आदत है, जो प्रशंसनीय भी है, कि हम बचत करने और भविष्य के लिए बचाकर रखने में विश्वास रखते हैं। अधिकांश अर्थशास्त्री इसे बहुत अच्छी वित्तीय प्रवृत्ति मानते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह छोटी-छोटी बचतें हमारे देश की जी.डी.पी. में लगभग 35% का योगदान देती हैं। घरेलू क्षेत्र की बचत भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा निवेश है। आधिकारिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जी.डी.पी. में घरेलू बचत की कुल हिस्सेदारी 2008 में लगभग 37% थी, लेकिन 2018 में यह घटकर 30.5% रह गई।

इन छोटी बचतों के लिए, छोटे जमाकर्ता राष्ट्रीयकृत बैंकों या एन.बी.एफ़.सी. कम्पनियों में जाते हैं या अपने घरों में जमा करते हैं। हालांकि, तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश जमाकर्ता राष्ट्रीकृत बैंकों में और आजकल तो निजी बैंकों में भी रखने लगे हैं। इसका कारण इन बैंकों पर उनका भरोसा है और उन्हें उम्मीद है कि उन्हें आवश्यकता पड़ने पर या फिर बुढ़ापे में जब पैसों की ज़रुरत होगी तो उन्हें आसानी से अपने पैसे वापस मिल जाएंगे। इसके अलावा इन बचत खातों पर उन्हें उचित लाभ भी मिलने की आशा रहती है।लेकिन आर्थिक सुधारें के नाम पर विचाराधीन कुछ वित्तीय प्रस्तावों को, यदि लागू किया जाता है, तो देश का पूरा आर्थिक परिदृश्य बदल जाएगा और छोटे जमाकर्ताओं और बचतकर्ताओं के हितों को आघात पहुंच सकता है।

नए बिल की पृष्ठभूमि
2017 से देश के बैंकों के प्रबंधन की सभी ज़िम्मेदारियों को एक नई संस्था को सौंपने की कोशिश की जा रही है, हालांकि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) पिछले 70 वर्षों से इस ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से निभा रहा है।अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ (AIBOA) के पूर्व महासचिव थॉमस फ़्रेंको ने एक वेब चैनल को दिए गए साक्षात्कार में बताया कि सरकार ने वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक (FRDI) 2017 में तैयार किया था और उसे 2017 और 2018 में संसद में पेश किया गया था, लेकिन बिल पास नहीं हो पाया और 2019 में उसे वापस ले लिया गया, मगर अब उसका नाम बदलकर वित्तीय क्षेत्र विकास विनियमन, संकल्प विधेयक (Financial Sector Development, Regulation and Resolution Bill-2019) का नाम दिया गया है। और इसे लोकसभा से पास कराने के लिए इस वर्ष संसद के मानसून या शीतकालीन सत्र के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता है।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इस बिल की पृष्टभूमि 2008 में अमेरिकी मंदी के साथ शुरू हुई थी। 2008 में अमेरिकी बैंकों के वित्तीय संकट में घिरने के बाद, अमेरिकी प्रशासन ने अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व के माध्यम से अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली को भारी वित्तीय सहायता प्रदान की। इसके बाद अमेरिका ने जी-7 समूह पर दबाव डाला कि वह भारत सहित अधिक से अधिक देशों को सम्मिलत करके एक वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफ़.एस.बी./FSB) स्थापित करे । इसमें भविष्य में वाणिज्यिक बैंकों को बचाने (बेलआउट पैकेज) के लिए एफ़.एस.बी. के नियमों के संबंध में एक नोट भी जारी किया। अन्य सिफ़ारिशों के अतिरिक्त एक सिफ़ारिश यह भी की गई है कि सरकार अब वाणिज्यिक बैंकों को बेलआउट पैकेज प्रदान नहीं करेंगी, बल्कि इसके लिए बैंक बचतकर्ताओं के पैसों का उपयोग किया जाएगा।अमेरिका, यूरोपीय और भारतीय बैंकों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बड़ी संख्या है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा दी गई गारंटी से बचतकर्ताओं का विश्वास बढ़ता है। इसके अतिरिक्त ये बैंक विभिन्न वित्तीय और नियामक क़ानूनों का भी पालन करते हैं और इस संबंध में उनका अब तक का रिकॉर्ड काफ़ी अच्छा रहा है।

एफ़.एस.डी.आर.- 2019
लेकिन प्रस्तावित एफ़.एस.डी.आर. बिल इस पूरी स्थिति को मौलिक रूप से बदल देगा। इसमें बीमार बैंकों के बेलआउट के संबंध में जो सिफ़ारिशें पेश की गई हैं उनमें से एक यह है कि एक नया संकल्प प्राधिकरण बेलआउट (Regulatory Authority) से संबंधित नियम तय करेगा। श्री फ़्रेंको के अनुसार, इसका मतलब यह है कि सरकार या वित्तीय संस्थानों की ओर से मदद के बजाय, बेलआउट के लिए सबसे पहले बैंक में जमा आम लोगों के पैसों का उपयोग किया जाएगा, जो अपने आप में ग़लत है और निवेश के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि बिल में बैंक को चुकानेवाली राशि की ज़िम्मेदारी छोटे जमाकर्ताओं पर डाली गयी है। छोटे जमाकर्ताओं की संख्या कोई कम नहीं है, बल्कि श्री फ़्रेंको के अनुसार, देश के 68% छोटे जमाकर्ता वरिष्ठ नागरिक हैं, जिन्होंने अपनी वित्तीय स्थिरता के लिए इन बैंकों में अपने जीवनकाल की बचत जमा कर रखी है।

यहां यह सवाल उठता है कि जब देश के पास पहले से ही एक आर.बी.आई. मौजूद है जो प्रभावी रूप से अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करता आ रहा है, तो एक नया नियामक प्राधिकरण स्थापित करने की आवश्यकता ही क्या है? श्री फ़्रेंको के अनुसार इसका उत्तर यह है कि आर.बी.आई. द्वारा अनुशंसित किसी भी बेलआउट पैकेज को संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए। लेकिन एफ़.एस.डी.आर.-2019 में, संसद को निरस्त कर दिया गया है और एक प्रस्तावित नियामक प्राधिकरण को किसी भी बीमार बैंक को बचाने के लिए सिफ़ारिशें देने का अधिकार सौंप दिए गए हैं।इस विधेयक के नतीजे में देश के बैंकों पर से जमाकर्ताओं का विश्वास उठ सकता है। सरकार ने पहले लोगों को बताया कि सभी के पास बैंक खाता होना चाहिए। फिर सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी प्रकार की सहायता बैंकों को डिजिटलीकरण के नाम पर हस्तांतरित कर दी गई। और अब जो नई सिफ़ारिशें की गई हैं उनके परिणामस्वरूप, लोग अपने स्वयं के पैसे ही आसानी से नहीं निकाल सकेंगे। श्री फ़्रेंको का कहना है कि अब यह संभव है कि प्रस्तावित नवगठित नियामक प्राधिकरण एक दिन अचानक घोषणा करेगा कि अमुक बैंक भली प्रकार काम नहीं कर रहा है, इसलिए इसे पूरी तरह से एक कॉर्पोरेट घराने को स्थानांतरित किया जा रहा है, और हो सकता है कि उक्त कॉरपोरेट हाउस पहले से ही उस बैंक का सबसे बड़ा कर्ज़दार रहा हो।

बैंकिंग क्षेत्र के लिए पॉलिसी फ़्रेमवर्क
1990 के दशक तक, कुछ मामूली घोटालों को छोड़कर हमारी बैंकिंग प्रणाली में कोई समस्या नहीं थी। श्री फ़्रेंको का कहना है कि 1990 के बाद से, जब हम अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (WB) में गए थे, उसके बाद से ही हमारी वित्तीय नीतियां बदल गई हैं। हमारे नेताओं ने हमें आश्वासन दिया था कि तीन साल के भीतर सब कुछ ठीक हो जाएगा और हम दुनिया की सबसे मज़बूत और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन जाएंगे। हमारी प्राथमिकताएं तो बदल गई हैं, लेकिन हमें समस्याओं को जिस प्रकार हल करना चाहिए था, वैसा नहीं किया जा रहा है। हमारी 28% आबादी अभी भी ग़रीबी रेखा से नीचे रह रही है। लेकिन हमारी नीतियां और कार्यक्रम उनकी बेहतरी के लिए नहीं हैं क्योंकि देश के केवल एक प्रतिशत अल्पसंख्यक देश के सभी वित्तीय संस्थानों और धन को नियंत्रित करते हैं और वे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से सस्ते ऋण लेकर अपनी संपत्ति में लगातार वृद्धि कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट संस्थानों में से एक के ज़िम्मे विभिन्न बैंकों के 275,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं। लेकिन उनसे पैसा वसूल करने के लिए एक प्रभावी प्रणाली विकसित करने के बजाय, हमारे नियामक सामान्य लोगों को परेशान करते रहते हैं, जिन्होंने छोटे क़र्ज़ ले रखे हैं। और अब इन सरकारी बैंकों को इन्हीं कॉरपोरेट घरानों को बेचने की योजना तैयार की जा रही है, जिन पर उनका करोड़ों रुपये बक़ाया है।

आम आदमी अभी तक डिजिटलीकरण, विमुद्रीकरण और जी.एस.टी. के आघात से उबर नहीं पाया है, और अब कोरोना वायरस महामारी और आर्थिक मंदी से और भी अधिक परेशान है। उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह जिनपर अपने पैसों और वित्तीय हितों के लिए भरोसा करता रहा है, न जाने उनपर उसका भरोसा कब चकनाचूर हो जाए।संक्षेप में यह कि वर्तमान सरकारी बैंकों को मज़बूत करने के लिए उनमें पैसा डालने और बड़ी-बड़ी रक़म डकार जानेवाले घरानों से धन प्राप्त करने के लिए एक सख़्त और कुशल प्रणाली बनाने के बजाय, बैंकिंग क्षेत्र को बैक डोर के माध्यम से निजी व्यावसायिक घरानों को सौंपने का प्रयास हो रहा है। भारत में भी इसका परिणाम वही हो सकता है जो चिली और पेरू जैसे देशों में इस तरह के तंत्र को अपनाने के कारण हुआ। भारत की अर्थव्यवस्था इस बिल से इतनी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है कि शायद यह अपने पैरों पर खड़ा होने योग्य ही न रहे और भविष्य में आई.एम.एफ.तथा विश्व बैंक के इशारों पर नाचता रहे।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह बीबीसी-लंदन और ख़लीज टाइम्स-दुबई के साथ जुड़े रहे हैं।)

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