अखिलेश यादव और परिवार हमेशा साथ खड़े रहे : अब्दुल्लाह आजम खान

बीजेपी का अपना एजेंडा है। वो लड़ाकर हुकूमत करना चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश के रामपुर से सांसद और यूपी में मुसलमानों के बड़े नेता रहे आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम खान जेल से रिहा किये जा चुके हैं। लगभग दो साल सीतापुर की जेल में बिताने के बाद 15 जनवरी 2022 को उन्हें जमानत पर रिहा किया गया है। हालांकि, उनके पिता आजम खान अब भी जेल मेें हैं। आजम खान बीमार हैं और कोविड काल में एक बार तो उनकी हालत ऐसी हो गयी थी कि बचने की उम्मीद खत्म हो चुकी थी। शायद पिता के साथ पुत्र का वही लगाव मंच से जनता को संबोधित करते हुये अब्दुल्लाह आजम खान की आंखों से आंसू बनकर बाहर निकल गया। पुत्र की आंखों से निकले आंसुओं ने वहां मौजूद लोगों के दिल तक अपनी पहुंच बना ली, जिसके वोटों में तब्दील होने की उम्मीद से किनारा नहीं किया जा सकता।

जबकि अब्दुल्लाह आजम खान उन आंसुओं का सियासत से कोई संबंध नहीं बताते। उनका कहना है कि वे आंसू एक पुत्र का पिता के स्वास्थ्य की चिंता को लेकर था, उनकी तकलीफ को लेकर था, और उसके सियासी मायने नहीं निकले जाने चाहिए।

बहरहाल, ‘द वायर’ ने आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम खान से कई मुद्दों पर बातचीत की, आइये जानते हैं कि वे सवाल क्या थे और उन सवालों के अब्दुल्लाह खान ने क्या जवाब दिये…

दो साल बाद जेल के बाहर की दुनिया कितनी बदली हुई नजर आयी?

दुनिया इतनी बदली कि दो साल बाद अपना घर भी अजनबी सा लगा। रिहाई की कोई खुशी नहीं बल्कि ये एक मजबूरी की रिहाई थी क्योंकि आप देख रही हैं कि जो भी ये सियासी माहौल है। लेकिन एक बेटे के तौर पर रिहाई बहुत सख्त थी क्योंकि अपने ​बीमार वालिद (पिता) को आठ बाय आठ की कोठरी में छोड़कर आना किसी भी औलाद के लिये बेहद सख्त काम है।

आजम खान साहब की तबीयत अब कैसी है?

जब वे आईसीयू में थे और बेहोशी की आलम के बाद उन्हें थोड़ी देर के लिये होश आया तो उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि बेटे अगर मुझे कुछ ऐसा हो गया है जो ठीक नहीं हो सकता तो मुझे जो कुछ भी हो, वो घर जाकर के हो। आजम खान साहब करीब पांच महीने तक मेदांता में रहे। आईसीयू में रहे। मैं मानता हूं कि वे जिस हालत में थे, उन्हें किसी की दुआ ने ही बचाया है। हालांकि, बीमार तो वे अब भी हैं। तकलीफ में हैं, लेकिन मजबूत हैं, लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ेंगे।

आप पर तकरीबन 40 मुकदमे हैं और पूरे परिवार पर लगभग 100 मुकदमे?

मैं बताता हूं। मेरे वालिद पर करीबन 100 मुकदमे हैं। मेरी वालिदा जो पीएचडी हैं, प्रोफेसर रही हैं, सांसद रही हैं, एमएलए हैं, उन पर करीबन 35 मुकदमे हैं, मैं खुद एमटेक हूं, एमएलए था, अभी भी मेरा मामला सुप्रीम कोर्ट में है, मेरे ऊपर 45 केसेज हैं। मेरे बड़े भाई हैं, उन पर केसेज हैं। मेरे ताऊ जो एक लेखक हैं और रिटायर्ड सुपरिटेंडिंग इंजीनियर हैं, उन पर केसेज हैं। मेरे वालिद की बड़ी बहन, मेरी फुफ्फू भी लेखिका और रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं, उन पर भी केसेज हैं। यहां तक कि करीबन नौ साल पहले मेरी दादी का इंतकाल हो गया था, यूपी पुलिस ने मेरी दादी तक के खिलाफ एफआईआर की है। जब मामला बढ़ा और अखबारात में आया तो पुलिस ने कहा कि गलती हो गयी वरना मेरी मरी दादी तक पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर दी थी।

मैं मानता हूं कि वे जिस हालत में थे, उन्हें किसी की दुआ ने ही बचाया है। हालांकि, बीमार तो वे अब भी हैं। तकलीफ में हैं, लेकिन मजबूत हैं, लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ेंगे।

बकरी चुराने और मुर्गी चुराने जैसे भद्दे मामलों में भी आप सभी को फंसाया गया, मानो आज जो गद्दी पर बैठे हैं, वे दूसरी तरफ कभी नहीं होंगे। ऐसा नहीं कि आप ही केवल उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे, यादव परिवार पर तो हमने इसका कोई खास असर होते नहीं देखा?

देखिये, बीजेपी का अपना अलग एजेंडा है। वो लड़ाकर हुकूमत करना चाहते हैं। समाज के बीच नफरत पैदा हो, भाई भाई से लड़े और किसी जमाने में जो अंग्रेजों ने किया था, डिवाइड एंड रूल, वे वही कर रहे हैं। आज मुल्क के सामने और भी कई मसले हैं, जिनके बारे में हमें सोचना पड़ेगा। जैसे किसान हैं, किसानों का मुद्दा है, बेरोजगारी का मुद्दा है, किसी एक मगरूर इंसान ने बेगुनाह लोगों को अपनी गाड़ी से कुचल दिया, ऐसे लोगों के इंसाफ का मुद्दा है, आरक्षण के मुद्दे हैं। बहुत से मुद्दे हैं। मेरे ख्याल से भाजपा ने यह सब सिर्फ इसलिये किया था कि समाज को बांटा जा सके, लेकिन अगर आज मैं कहूं कि समाज के हर वर्ग ने, पूरी सोसायटी ने इसका बहुत बुरा माना है कि आज तक जिस पूरे परिवार का एक भी आदमी थाने तक नहीं गया था, उसे आपने लैंड माफिया, भैंस चोर, बकरी चोर, किताब चोर, मिट्टी चोर, पेड़ चोर, 16 हजार 600 रुपये गल्ले से चुराना, शराब की बोतलें चुराना, फर्जी जन्म प्रमाण पत्र होना, फर्जी पैन कार्ड होना, फर्जी पासपोर्ट होना और एक ऐसे आदमी की ओर से अटैंप्ट टू मर्डर का केस लगाया गया, जिसे अपनी जिंदगी में न मैंने, न मेरे वालिद ने कभी देखा भी था कि वो कौन है? तो यह सब सिर्फ इसलिये हुआ था ताकि समाज को बांटा जा सके। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि कुछ मीडिया हाउसेस में अभी भी ट्रांसपेरेंसी है, जिनमें अभी भी सच बोलने की हिम्मत है।

दिल पर हाथ रखकर बतायें कि जिस समाजवादी पार्टी को आपके वालिद और आपके पूरे परिवार ने अपनी पूरी जिंदगी दी, क्या वो उस वक्त आपके साथ खड़ी थी, जब आपको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी?

मैं बिल्कुल दिल पर हाथ रखकर कहुंगा। मुझसे पहले भी यह सवाल किया गया था तब मैंने कहा था कि मदद दो तरह की होती है। एक जो दिखायी जाय मगर की नहीं जाय। और दूसरी जो की जाये मगर दिखायी नहीं जाय। ये मुद्दा भी बीजेपी ने ही बनाया या ​उन लोगों ने बनाया जो जाने अनजाने उनकी ही मदद करना चाहते हैं ताकि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव जी के परिवार से हमारा परिवार दूर हो जाये लेकिन मैं आपसे ये कहना चाहुंगा कि जैसा कि हमारे मजहब में भी कहा जाता है कि मदद एक हाथ से करो तो दूसरे हाथ को पता न चले। ठीक उसी तरह, मदद की उन्होंने। और वो मदद की जो दिखायी नहीं। और बहुत से लोगों ने हमदर्दी दिखायी तो लेकिन की नहीं।

दिखायी देने में क्या हर्ज था?

अगर दिखायी देता तो लोग कहते कि अपनी पार्टी के इतने पुराने नेता की मदद करके दिखावा कर रहे हैं। क्या दिखाना चाहते हैं? अगर मदद करनी थी तो खामोशी से की होती। फिर, ये मुकदमे न तो अखिलेश यादव ने लिखवाये न उनकी सरकार ने। तो हम किसी इंसान को बिना वजह किसी चीज के लिये जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। उन्होंने जो मदद की, वो मैं जानता हूं। मेरा परिवार जानता है। मैं यहां कहना नहीं चाहता। दिखाना नहीं चाहिये। बस, उन्होंने जो मदद की, वो हमारे उनके बीच बात रहे, वही बेहतर है।

मीडिया हो या फिर सियासत, हर जगह अगर कोई अपनी बात खुलकर नहीं कह रहा हो तो इसका मतलब यही है कि उनको डराया, धमकाया जाता है। उनकी अपनी मजबूरियां हैं। कुछ लोग मजबूरियों से मजबूर हैं और कुछ लोग मजबूती से उसका सामना कर रहे हैं। बस इतना है।

एक खबर मीडिया में थी कि तकरीबन एक दर्जन लोगों को आजम खान साहब चाहते थे कि​ टिकट दिये जायें और उन सभी के साथ आप अखिलेश यादव से मिलने पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने आपकी बात मानने से इनकार कर दिया। ये खबर सही है?

बिल्कुल फर्जी खबर है। आज सवाल कैंडिडेड पर नहीं है। आज सवाल यह है कि कितनों को रोजगार मिला? कितने किसानों की मौत ठंडी इटावा की सड़क पर सोने के कारण हुई? कितने बेगुनाह लोग लखीमपुर खीरी में गाड़ी की टायर के नीचे कुचलकर मार दिये गये? कितने लोगों का रोजगार चला गया? महंगाई कहां पर है? उन्नाव और हाथरस में क्या हुआ, सवालात ये हैं।

पूरा इंटरव्यू सुनने के लिये क्लिक करें…

बता दें कि आजम खान को उत्तर प्रदेश में केवल मुसलमानों का नेता ही नहीं माना जाता बल्कि उन्हें समाजवादी पार्टी का कद्दावर नेता भी माना जाता है, जो मुलायम सिंह यादव के साथ समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे हैं। जनता के बीच उनकी पकड़ का अंदाज महज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि बीजेपी की तेज आंधी यानी 2019 के चुनाव में भी वे अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे थे। 70 साल से ज्यादा उम्र के आजम खान नौ बार विधायक, दो बार सांसद और कई बार मंत्री भी रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक आकार देने में आजम खान का योगदान कभी नहीं भूला जा सकता।

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