स्वामी के झटकों के बाद कितनी बदली यूपी की राजनीति और बीजेपी की रणनीति

बीजेपी यूपी में न तो ब्राह्मणों को खुश रख पायी और न ही दलितों और पिछड़ी जातियों को ही अपने साथ रखने में कामयाब हो पायी।

स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) के झटकों के बाद कितनी बदली यूपी की राजनीति और बीजेपी की रणनीति? यह सवाल आज हर किसी के अंदर कौंध रही है। हर कोई जानना चाहता है कि यूपी की राजनीति के केंद्र में अब तक धर्म मुद्दा था, लेकिन स्वामी प्रसाद के झटकों ने उसे अब जाति पर लाकर खड़ा कर दिया है, ऐसे में कितनी बदली यूपी की राजनीति? इसका कितना और कैसा असर अब यूपी की राजनीति में देखने को मिलेगा? हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस बार यूपी की राजनीति को कई और मुद्दे भी सामने या परदे के पीछे से प्रभावित कर रहे हैं, उन सबकी पड़ताल करता सुषमाश्री का यह आलेख…

अमूमन धर्म की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता की वापसी का रास्ता उन्हें इस कदर नये समीकरण तलाशने को मजबूर कर देगा। कुछ समय पूर्व तक जहां यूपी चुनाव से पहले देश में हिंदू मुस्लिम के बीच दूरियां लगातार बढ़ाने पर काम हो रहा था, कभी ‘धर्म संसद’ तो कभी ‘बुल्ली बाई ऐप’ के जरिये हिंदू और मुस्लिम के बीच की खाई को और गहरा किया जा रहा था, वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य के एक ही बैटिंग ने एक एक करके बीजेपी के सारे विकेट गिराने का काम किया है। स्वामी ने न केवल बीजेपी को कमजोर बना दिया बल्कि उसकी चुनावी रणनीति पर भी करारा हमला बोल दिया है। धर्म को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी के लिये जाति का मुद्दा इस बार दोधारी तलवार बन चुका है। प्रदेश में योगी सरकार के रहते हुये बीजेपी यूपी में न तो ब्राह्मणों को खुश रख पायी और न ही दलितों और पिछड़ी जातियों को ही अपने साथ रखने में कामयाब हो पायी।

मंडल और कमंडल की राजनीति

कहने की जरूरत नहीं कि यूपी में लंबे समय से मंडल और कमंडल की राजनीति केंद्र में देखी जाती रही है, लेकिन 2014, 2017 और 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने कमंडल और मंडल, सभी को एक ही छत के नीचे लाकर खड़ा करने में कामयाबी हासिल की थी, जिसका फायदा उन्हें बीजेपी के फेवर में पड़े जबरदस्त वोटों के जरिये देखने को मिला भी था।

पिछड़ी जाति के केशव प्रसाद मौर्य को सीएम का चेहरा बताकर 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने राज्य की जनता के साथ धोखा किया और योगी आदित्यनाथ को उन पर थोप दिया। पूरे चुनाव के दौरान यूपी में अध्यक्ष के तौर पर मेहनत करके बीजेपी को जीत दिलाने वाले केशव प्रसाद मौर्य ही नहीं, यूपी की जनता को भी बीजेपी कोर कमिटी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह फैसला रास नहीं आया था, लेकिन बेमन से ही सही, पर उन्होंने पीएम मोदी की बात मानकर योगी को सीएम मान लिया।

केसरिया पहनने वालों की कोई जाति नहीं होती

केशव प्रसाद मौर्य ने दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों को समझाया कि केसरिया पहनने वालों की कोई जाति नहीं होती। ऐसे में यदि उन्हें सीएम पद पर बैठाने का फैसला बीजेपी की कोर कमिटी करती है तो हमें इसे मान लेना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि हमें योगी को सीएम मानते हुये अपने सारे काम करने चाहिये। हुआ भी यही। केशव प्रसाद मौर्य को डिप्टी सीएम का पद मिला और कुछ विभाग भी। योगी और मौर्य अपने अपने विभागों का काम देखने लगे, लेकिन योगी ने अचानक मौर्य के विभाग में दखलअंदाजी शुरू कर दी, जो मौर्य को पसंद नहीं आयी। यहीं से शुरू हुआ दोनों बड़े मंत्रियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई, जो लगातार बढ़ती ही गई। यूपी में सीएम और डिप्टी सीएम के बीच की यह खटपट मीडिया के जरिये केंद्र तक पहुंचा तो केंद्र सरकार ने दोनों को एक दूसरे के काम में दखल देने से मना किया और शांति से राज्य में सत्ता का स्वाद लेने की सलाह दी।

यूपी में सीएम और डिप्टी सीएम के बीच की यह खटपट मीडिया के जरिये केंद्र तक पहुंचा तो केंद्र सरकार ने दोनों को एक दूसरे के काम में दखल देने से मना किया और शांति से राज्य में सत्ता का स्वाद लेने की सलाह दी।

फिर, मामला शांत हो गया लेकिन कुछ समय बाद फिर जब योगी ने मौर्य के विभाग में गड़बड़ी पर दखल देना आरंभ किया तो मौर्य ने भी एक चिट्ठी लिखकर योगी के पीडब्लयूडी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और गड़बड़ी को मीडिया के सामने लीक कर दिया। एक बार फिर दोनों नेताओं के बीच की यह खाई गहरी पहले से ज्यादा गहरी होती दिखी।

योगी को UP पर जबरदस्ती लाद दिया गया

सरकार बनने के दो साल के अंदर ही यूपी सरकार के मंत्रियों के बीच की यह खाई बाहर आने लगी थी। मंत्री और विधायक ही नहीं, जनता भी बीजेपी की योगी सरकार से त्रस्त महसूस करने लगी। उनका कहना था कि योगी को उन पर जबरदस्ती लाद दिया गया है, जोकि बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। खास बात यह है कि योगी मोदी बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि मोदी ने खुद के बल पर सबकुछ अर्जित किया है, जबकि उन्हें यह सब थाली में परोसकर ​दे दिया गया। ऐसे में पीएम मोदी के साथ उनकी बराबरी कभी नहीं हो सकती। और हमारे लिये उनकी यह कोशिश हजम कर पाना भी मुश्किल होता जा रहा है।

दिसंबर 2019 को यूपी विधानसभा में हुई ऐतिहासिक घटना

बहरहाल, इसी बीच दिसंबर 2019 की वह ऐतिहासिक घटना यूपी विधानसभा में देखने को मिली, जिसे कभी चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। यूपी की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ, जब प्रदेश सरकार के 100 से ज्यादा विधायक खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा में धरना देते हुये दिखे। यही नहीं, विपक्ष के विधायकों को मिलाकर तकरीबन 200 विधायक तब विधानसभा में सरकार की नीतियों व विधायकों और मंत्रियों की बातें न सुनने का विरोध करते हुये धरने पर बैठे रहे। तब विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों को समझा बुझाकर धरना खत्म करने के लिये मना लिया और शाम तक उनकी बात सुनकर उस पर कार्रवाई करने का यकीन भी दिलाया। फिर जाकर यह धरना खत्म किया गया, लेकिन विधायकों की यह एकजुटता उसी वक्त योगी सरकार को नैतिकता की दुहाई देकर त्यागपत्र देने की सलाह तक दे चुकी थी, क्योंकि उनके खिलाफ धरने पर बैठने वाले विधायकों की संख्या 200 पार हो चुकी थी, जिससे पता चलता है कि योगी सरकार अल्पमत में आ चुकी थी।

दिसंबर 2019 की वह ऐतिहासिक घटना यूपी विधानसभा में देखने को मिली, जिसे कभी चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। यूपी की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ, जब प्रदेश सरकार के 100 से ज्यादा विधायक खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा में धरना देते हुये दिखे।

सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर ने अखिलेश से मिला लिया था हाथ

बहरहाल, तब मामले को जैसे तैसे संभाल ​तो लिया गया, लेकिन उसी वक्त यह तस्वीर साफ हो चुकी थी कि आगे योगी आदित्यनाथ के लिये सबकुछ आसान नहीं होगा। साथ ही राजनीति के जानकार यहां तक कहने लगे ​थे कि इसे योगी सरकार के लिये खतरे की घंटी की मान लेना चाहिये। हुआ भी यही। इस घटना के दो साल बाद चुनाव से ठीक पहले एक एक कर विधायकों की एक लंबी फेहरिस्त ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया और विपक्ष के समाजवादी खेमे में शामिल हो गये। कुछ लोगों का कहना है कि अखिलेश और राजभर ने कई रैलियां करने के बाद भी जनता के बीच जो मुकाम हासिल नहीं किया था, स्वामी के चौकों और छक्कों ने बड़ी ही आसानी से यूपी की राजनीति में उन्हें वह इंद्रधनुषी स्थान दे दिया। बहरहाल, खास बात यह है कि बीजेपी का साथ छोड़ने वालों में स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी, दारा सिंह समेत जितने भी विधायक हैं, वे सभी कहीं न कहीं पिछड़ी जातियों से आते हैं। वहीं, सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर ने तो दो साल पहले ही बीजेपी का साथ छोड़ दिया था और चुनाव से पहले अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया था।

यूपी बीजेपी में मची हलचल की बीते दो साल से ही चल रही थी तैयारी

राजभर ने खुद भी मीडिया स्वराज को दिये एक इंटरव्यू में यह माना कि यूपी बीजेपी में मची हलचल की तैयारी बीते दो साल से ही चल रही थी, लेकिन ये विधायक सही मौके का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने यहां तक कहा कि दो साल पहले जब गाजियाबाद के लोनी विधायक नंद किशोर गुर्जर को पुलिस ने प्रताड़ित किया, और जब उन्होंने अपनी बात विधानसभा में रखने की कोशिश की, तो उनकी बात नहीं सुनी गयी, उसके बाद प्रदेश के मंत्रियों और विधायकों का यह दर्द खुलकर सामने आ गया, जिसका चित्रण ​दो साल पहले विधानसभा में विधायकों के धरने के रूप में हम सभी ने देखा था। उन्होंने यहां तक माना कि योगी सरकार में मंत्रियों और विधायकों तक की कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। योगी आदित्यनाथ अपने अलावा किसी को कुछ भी नहीं समझते थे, जिससे विधायकों और मंत्रियों में रोष व्याप्त था। नतीजतन, इन सब झटकों की प्लानिंग की गई थी।

योगी ने केवल ठाकुरवाद को दिया बढ़ावा

यूपी की जनता योगी आदित्यनाथ को लेकर कहती है कि हमने केशव प्रसाद मौर्य को सीएम बनाने के लिये बीजेपी को वोट दिया था लेकिन योगी को यह समझकर सीएम मान लिया कि वे भगवाधारी हैं और भगवा धारण करने वालों की कोई जाति नहीं होती, लेकिन योगी ने सरकार में रहकर सिर्फ और सिर्फ ठाकुरवाद को बढ़ावा दिया है। ठाकुरों के अलावा न तो उन्होंने ब्राह्मणों की सुनी और न ही दलितों व पिछड़ी जातियों की, और धर्म की तो यहां बात भी करना बेमानी होगी। सत्ता के मद में चूर योगी यह भी भूल गये कि पांच साल के बाद सरकार को एक बार फिर जनता के बीच जाना है, उनसे वोट मांगना है, और अगर सीएम की कुर्सी पर बैठकर अगर वे केवल ठाकुरों का ही काम करते रहेंगे तो क्या इससे अगले चुनाव में बीजेपी फिर से सत्ता में आ पायेगी?

क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी

यूपी में शिक्षा संस्थाओं के निजीकरण का प्रयास, प्रतियोगिता परीक्षा के पेपर्स का लीक होना, यूपी पीसीएस में योग्य उम्मीदवारों के न मिलने का बहाना बनाकर अपर कास्ट के उम्मीदवारों की बहाली कर देना… जैसे कई और भी ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर बीजेपी की योगी आदित्यनाथ सरकार पर दिखा। इससे भी प्रदेश की पिछड़ी जातियों में व्याप्त रोष इस बार के चुनावों पर दिखेगा। बल्कि यह कहना गलत न होगा कि अपने वोटर्स की नाराजगी को देखते हुये ही इतनी बड़ी संख्या में प्रदेश के पिछड़े वर्ग के नेताओं ने चुनाव से ठीक पहले बीजेपी का साथ छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होने का फैसला ​लिया। उनके इस फैसले के साथ यकीनन उनके वोटर्स भी हैं। वरना इतना बड़ा कदम ये मंत्रिगण यूं ही नहीं ले लेते। यूपी की राजनीति में जबरदस्त पकड़ रखने वाले बीबीसी के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी भी मानते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य सरीखे इतने दिग्गज नेताओं ने यह फैसला यूं ही नहीं ले लिया होगा। इसके पीछे उनके वोटर्स की नाराजगी भी अहम कारण होगी।

योगी को गोरखपुर भेजने की वजह

अब बीजेपी के लिये सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या पूर्वांचल से आने वाले इन सभी नेताओं के उनके खिलाफ लामबंद हो जाने के बाद भी पूर्वांचल में बीजेपी कुछ कमाल कर पायेगी? हालांकि, योगी आदित्यनाथ का गृहनगर गोरखपुर भी पूर्वांचल में ही आता है और योगी ने यहां काफी काम भी किया है। योगी पिछले चार बार से गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीतते रहे हैं। वे यहां स्थित गोरखपुर मंदिर के महंत भी रहे हैं। योगी जिस नाथ संप्रदाय को मानते हैं, उसे मानने वाले लोग बड़ी संख्या में यहां मौजूद हैं, जो योगी के साथ खड़े रहते हैं। यही वजह है कि पूर्वांचल में बीजेपी को जीत दिलाने की जिम्मेदारी देकर योगी आदित्यनाथ को उनके गृहनगर गोरखपुर भेज दिया गया।

योगी की पीएम बनने की महत्वकांक्षा

जबकि कुछ समय पूर्व तक बीजेपी प्रयागराज, अयोध्या और मथुरा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को विधानसभा चुनाव में पहली बार उतारने की तैयारी कर रही थी। योगी आदित्यनाथ के हिंदुओं का बड़ा नेता बनने की महत्वाकांक्षा को देखते हुये बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व खुद भी नहीं चाहता था कि योगी को इन इलाकों से चुनाव में उतारा जाय, हालांकि इसके बावजूद योगी कई बार इन इलाकों से चुनाव में उतरने की अपनी ख्वाहिश केंद्र सरकार को बता चुके थे। बहरहाल, स्वामी प्रसाद मौर्य के जबरदस्त झटके के बाद बीजेपी ने अपना इरादा बदल लिया और योगी को सीधे उनके गृहनगर गोरखपुर शहर से विधानसभा चुनाव में उतरने की सलाह दे डाली।

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बीजेपी और पिछड़ी जातियों की नाराजगी

सत्ता में वापसी के महत्वकांक्षी योगी आदित्यनाथ को समझा बुझाकर बीजेपी की कोर कमिटी ने वापस उन्हें उनके नगर भेज तो दिया है, लेकिन बीजेपी अब भी इस चिंता को गंभीरता से समझ रही है कि यूपी की सत्ता में उसकी वापसी इस बार पहले से भी कहीं ज्यादा मुश्किल होने वाली है। बीजेपी ने जब टिकटों की पहली लिस्ट जारी की, तो उसमें सबसे ज्यादा टिकट पिछड़ी जातियों से आने वाले नेताओं को दिया गया। इसके अलावा महिलाओं और युवाओं को भी टिकट दिये गये। पहली लिस्ट देखकर ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बीजेपी पिछड़ी जातियों की नाराजगी को अब समझ रही है, लेकिन शायद अब बहुत देर हो चुकी है।

धर्म बनाम जाति की राजनीति

ऐसे में बीजेपी की नीतियों को बारीकी से समझने वाले जानकार बताते हैं कि माना कि बीजेपी के लिये इस वक्त यूपी फतह बेहद मुश्किल होती दिख रही है, खासकर स्वामी प्रसाद मौर्य के झटकों के बाद, जिसने न केवल उनका साथ छोड़कर उन्हें कमजोर बना दिया बल्कि धर्म की उनकी राजनीति को भी जाति की राजनीति में बदलकर उनकी रणनीति को कमजोर बना दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव से पहले एक बार फिर यदि बीजेपी धर्म और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को गर्म बनाने की कवायद करके ज्यादा से ज्यादा हिंदू वोट अपनी झोली में डलवाने की कोशिश करें तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं होगी। दरअसल, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी इस वक्त चुपचाप बैठी नहीं हो सकती बल्कि वह अपनी अगली रणनीति की तैयारी में जुटी होगी। बस, इंतजार इस बात का है कि उनकी अगली रणनीति क्या होगी?

बीएसपी और कांग्रेस करेंगे बीजेपी की मदद

हालांकि, मायावती का इस चुनाव में रहना भी कहीं न कहीं बीजेपी के लिये फायदेमंद साबित होगा और जहां तक कांग्रेस पार्टी की बात है तो वह भी वोटकटवा पार्टी की तरह यूपी में पिछले रास्ते से बीजेपी के लिये मददगार ही साबित होगी। यानि बीजेपी के लिये बीएसपी और कांग्रेस का इस चुनाव में होना फायदेमंद साबित होगा, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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घर के झगड़े का असर

राजनीति में इंट्रेस्ट लेने वाले कुछ लोग बीजेपी के आपसी झगड़ों की तुलना पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी के घर के झगड़ों की याद दिलाकर कर रहे हैं। उनका कहना है कि घर के झगड़ों को बेशक तरजीह नहीं दिया जाता लेकिन इसमें इसकी ताकत होती है कि आपको बाहर हार का सामना करने को मजबूर कर दे। ऐसा ही तो पिछले चुनावों में अखिलेश और उनके चाचा के अलग अलग हो जाने की वजह से समाजवादी पार्टी के साथ हुआ था, और वही इस बार बीजेपी के साथ होगा।

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