क्या योगी आदित्यनाथ समूचे हिन्दू समाज के नेता नहीं हैं?

योगी आदित्यनाथ एक साथ महाराज और मुख्यमंत्री दोनों हैं।

प्रेमकुमार

प्रेम कुमार

क्या योगी आदित्यनाथ समूचे हिंदू समाज के नेता नहीं हैं? इन दिनों यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि बीजेपी में योगी आदित्यनाथ के लिए सुरक्षित विधानसभा सीट की तलाश हो रही है। एक राज्यसभा सांसद ने सपने में आए भगवान श्रीकृष्ण के हवाले से मथुरा से योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ाने की इच्छा भी रख दी है। मथुरा का महत्व किसी से छिपा नहीं है। नाथ संप्रदाय के मठाधीश के लिए इस सीट का खास तौर से धार्मिक महत्व है। इससे पहले अयोध्या की सीट से चुनाव लड़ने का आग्रह साधु-संतों की एक टोली योगी आदित्यनाथ से कर चुकी है।

योगी आदित्यनाथ नाथ संप्रदाय के सर्व मान्य नेता तो हैं लेकिन क्या हिन्दू समाज के भी सर्वमान्य नेता बन सके हैं? हिन्दू समाज न तो उत्तर प्रदेश तक सीमित है, न ही खास जाति-समुदायों तक। हिन्दू समाज का दायरा बहुत बड़ा है। यूपी की लगभग 80 फीसदी आबादी हिन्दू है। अगर यूपी में 19 करोड़ हिन्दुओं के नेता योगी आदित्यनाथ होते, तो उनकी ताकत का अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता।.

गोरखपुर क्यों छोड़ना चाहते हैं योगी आदित्यनाथ?

गोरखपुर योगी आदित्यनाथ के लिए कर्मस्थली भी है और धार्मिक नजरिए से भी नाथ संप्रदाय के लिए महत्वपूर्ण है जिसके वे महाराज हैं। गोरखपुर अगर वक्त के साथ चुनाव जीतने के ख्याल से मुफीद नहीं रह गया, तो वैकल्पिक सीट अयोध्या या मथुरा ही क्यों हो? इसका संदेश यही जाता है कि धार्मिक महत्व वाले पौराणिक शहर और वहां की सीटों पर ही योगी आदित्यनाथ का प्रभाव है। यह बात कुछ हजम नहीं होती क्योंकि उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को 325 सीटें मिली थीं। इनमें अकेले बीजेपी के पास 305 सीटें हैं।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ऐसा चेहरा हैं जो मठाधीश भी हैं और मुख्यमंत्री भी। वे योगी का जीवन भी जीते हैं और देश के सबसे बड़े प्रदेश के प्रमुख होकर भी वे सक्रिय रहते हैं। योगी आदित्यनाथ एक साथ महाराज और मुख्यमंत्री दोनों हैं। ये भूमिकाएं एक-दूसरे से इतनी घुली-मिली हैं कि फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता है। मुख्यमंत्री के तौर पर धर्म से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर योगी आदित्यनाथ फैसले करते हैं, सख्त भी दिखते हैं और संदेश भी देते नज़र आते हैं लेकिन यह उनके मुख्यमंत्री होने की शक्ति का प्रमाण होता है न कि महाराज होने की?

सिर्फ महाराज होकर शासन की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि उन्होंने गोरखपुर से लखनऊ का रुख किया। राजनीति में आने के बाद गोरखपुर में नाथ संप्रदाय के महाराज के तौर पर योगी की शक्ति में बढ़ोतरी हुई है मगर अब भी मुख्यमंत्री होने के कारण प्राप्त लोकतांत्रिक शक्ति के समक्ष यह ताकत छोटी ही रही।

योगीराजमेंसोशलइंजीनियरिंगगायब!

फिर भी अगर यह सवाल उठ रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ पूरे हिन्दू समाज के नेता नहीं हैं तो इसके पीछे भी तर्क हैं। 2017 का विधानसभा चुनाव बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नहीं लड़ा था। 2019 के आम चुनाव से पहले जो गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे उसमें बीजेपी को मात मिली थी। योगी के गढ़ गोरखपुर में बीजेपी हार गयी थी। 2017 का विधानसभा चुनाव केशव प्रसाद मौर्य की सोशल इंजीनियरिंग के दम बीजेपी ने लड़ा भी और जीता भी। मगर, ओबीसी वर्ग से आने वाले केशव प्रसाद को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली। मनोज सिन्हा और योगी आदित्यनाथ के नामों पर विचार के बाद योगी का नाम तय कर दिया गया। तब योगी आदित्यनाथ सांसद थे और उनका प्रभाव क्षेत्र पूरब के सीमित इलाकों में था।

मोदी पार्ट टू में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने और राम मंदिर निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद योगी आदित्यनाथ को कट्टर हिन्दुत्व की सियासत को आगे बढ़ाने का अवसर मिला। फिर सीएए विरोधी आंदोलन में योगी की यह छवि और मजबूत हुई। किसान आंदोलन के दौरान भी यह सिलसिला चला। अपराधियों पर कार्रवाई का राजनीतिक और धार्मिक इस्तेमाल करने में भी योगी सरकार सफल रही।

इन सबके बावजूद योगी आदित्यनाथ को सबसे ज्यादा कोरोना ने परेशान किया। असंगठित मजदूरों की घर वापसी, सड़क पर चलते मजदूर, गंगा में तैरती लाशें, तटों पर दफनाई गयी लाशें, श्मशान घाटों में तस्वीर लेने पर रोक जैसी घटनाओं ने योगी सरकार की पोल खोलकर रख दी। हालांकि जब कोरोना विस्फोट हुआ था तब ‘कोरोना जेहाद’ बताकर हिन्दुत्व का झंडा बुलंद किया गया था। मगर, बाद की  घटनाएं योगी सरकार पर भारी पड़ गयीं।

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योगी के लिए हर तबके में बढ़ी है नाराज़गी

वर्तमान में योगी सरकार से नाराज़ तबका चाहे किसान हों या मुसलमान, बेरोजगार हों या महंगाई की मार झेलती जनता- इनमें ज्यादातर हिन्दू समाज के लोग हैं। राम मंदिर निर्माण के दौरान जमीन घोटाले की बात हो या चंदे के दुरुपयोग की- इससे हिन्दू समाज योगी सरकार से सशंकित हुआ। उनकी शंकाओं का समाधान नहीं किया गया। मगर, प्रदेश में ओबीसी का जो सबसे बड़ा वर्ग है और जिसकी आबादी 42 फीसदी है वे योगी आदित्यनाथ से कतई खुश नहीं है। इस वर्ग से आने वाली छोटी-छोटी पार्टियां जो 2017 में केशव मौर्य के नेतृत्व वाली बीजेपी में साथ दे रही थीं, वे योगी सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। सबसे उल्लेखनीय बात तो ब्राह्मणों की नाराज़गी है जो देशभर में बीजेपी का वोट बैंक है। मगर, ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए बीजेपी को कमेटी बनानी पड़ रही है। एससी वर्ग खुलकर मुखर नहीं दिखता, मगर सोशल मीडिया पर सक्रिय ट्विटर हैंडल पर नज़र डालें तो योगी-मोदी सरकार के खिलाफ उनके गुस्से को समझा जा सकता है।

जब उत्तर प्रदेश में इतने व्यापक पैमाने पर योगी सरकार के खिलाफ असंतोष है तो वे पूरे हिन्दू समाज के नेता कैसे हो सकते हैं! यह हिन्दू समाज की नाराज़गी का डर ही है कि बीजेपी सांसद को सपने आ रहे हैं कि भगवान श्रीकृष्ण चाहते हैं कि योगी मथुरा से चुनाव लडें। गोरखपुर में ब्राह्मण और निषाद योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोलबंद हैं तो मथुरा में अकेले ब्राह्मण ही उनका चुनावी बेड़ा गर्क करने को तैयार बैठे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि न तो मुख्यमंत्री बनने से पहले कभी योगी आदित्यनाथ हिन्दू समाज के सर्वमान्य नेता थे। और, न ही मुख्यमंत्री बनने के बाद वे खुद को इस रूप में स्थापित कर पाए हैं।

@AskThePremKumar

पत्रकारितामें 25 वर्षकाअनुभव, पत्रकारिताकेशिक्षक, स्तंभकारऔरराजनीतिकविश्लेषक।

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