आक्सीजन देने वाले पेड़ों को मुक्ति की चाह

पेड़ हमारे लिए फल, फूल और लकड़ी के अलावा जीवन के लिए  सबसे महत्वपूर्ण प्राणवायु देते हैं. लेकिन इन पेड़ों का दर्द कोई नहीं समझता. लेखिका ने सुबह की सैर में मिलने वाले वृक्षों का दर्द साझा करते हुए आपसे कुछ अपेक्षा की है. 

डा मुदिता तिवारी

1 मई श्रम दिवस और आदिम मजदूर

मां कहती है

 पेड़ रात में सोते हैं 

तो पेड़ 

क्या करता है दिन भर ?

हम्माल

हम्माली करता है 

मजूर

मजूरी 

अफसर 

अफसरी करता है 

बाबू 

बाबू गिरी 

और 

रात  गए थककर सोता है 

और पेड़ 

पेड़ क्या करता है दिन – भर ?

 चलिए देखें ,क्या करता है पेड़ दिन भर ।लेकिन उसके पहले ज़रा परमहंस योगानंद जी द्वारा जगदीश चन्द्र बोस पर लिखे गए संस्मरण का एक टुकड़ा ,बोस की जबानी पढ़ लिया जाय –

“अपनी खोज में मैं कब पदार्थ विज्ञान और प्रकृति विज्ञान के सीमा क्षेत्र में पहुंच गया, मुझे पता ही नहीं चला। मेरा आश्चर्य बढ़ता ही गया जब मैंने देखा सजीव जगत और निर्जीव जगत के बीच की सीमा रेखाएं मिट्टी जा रहे हैं मिटती जा रही हैं और स्पर्श बिंदु उभरते जा रहे हैं ।मैंने देखा कि निर्जीव जगत निष्क्रिय नहीं था वह तो असंख्य शक्तियों के अभाव में पुलकित हो रहा था।

सब में एक समान प्रतिक्रिया धातु, वनस्पति और प्राणी को एक ही सामान्य नियम में बांधती प्रतीत हुई। वे सब थकान और खिन्नता के तत्वतः एक समान लक्षण प्रदर्शित करते थे जिनमें पुनः तरोताजा और हर्षत्फुल्ल होने की संभावनाएं बनी रहती थी ।मृत्यु के साथ जुड़ी हुई स्थायी प्रतिक्रियाहीनता के प्रदर्शन में भी सब एक समान थे । इस विराट सामान्यत से  विभोर होकर मैंने बहुत बड़ी आशा के साथ अपने प्रयोगों के परिणामें को रॉयल सोसाइटी के समक्ष रखा ।”

परमहंस योगानंद के समक्ष जगदीश चन्द्र बोस जी ने क्रेस्कोग्राफ पर पौधे को ही नहीं, टिन धातु के संवेदन को भी दिखाया ।उन्होंने फर्न के पौधे  की नोक को धातु की एक छोटी सी छड़ से छुआ ।छूते ही उसका मूक नृत्य हठात रुक गया और जैसे ही उन्होंने छड़ हटाई ,उसकी लयबद्ध थिरकन पुनः शुरू हो गई ।

पेड़ों का वह कष्ट अबोला रह जाता है सो हमें उसकी पीड़ा का अनुमान ही नहीं होता ।हम तो उसके हर अंग को नोच कर उसका उपभोग उदर पूर्ति के लिए करते हैं ।उससे भी आगे बढ़कर सौन्दर्य और मनोरंजन के लिए करते हैं । कोई अबोला रहा जाएगा तो जानेंगे कैसे ? लेकिन पशु तो बोलते हैं जब स्वाद के लिए काटा जाता है ।कौन सा हम उसकी परवाह करते हैं जो वृक्षों की करें ? ज़ोर शोर से मजदूरों के लिए नारे लगाने वाले जब शाम को मच्छी खाते हैं तो वो भी ‘ रसना के लेलिहान उस रक्त कुंड ‘ को कितना याद करते हैं ?इसलिए यह कहना कि पेड़ बोल सकते तो जुल्म न होते ,बेमानी बात है ।असल बात यह है कि ‘ जाके पैर न फटी बेवाई सो का जाने पीर पराई ‘ !

एक बार जब जमादारों की हड़ताल थी तब हमने और छोटी बहन ने घर के सामने नाली साफ करने का संकल्प लिया ।फावड़ा लेकर हमने गाद निकाली । गाद निकलते ही जो बदबू का भभका सर में चढ़ा कि उल्टी आते आते रह गई । भूगोल में पढ़ा था कि लावा बहुत चिपचिपा होता है ।लेकिन इस  पोथी ज्ञान का अहसास नहीं था । उसका अनुमान गाद निकालने में लगाए जाने वाले दम से हमने लगाया । एक राह चलते सज्जन ने हम लोगों के प्रयासों कि तारीफ कर दी तो दुगने जोश में हमने गाद निकाली ।६ फीट लम्बी नाली साफ करने में फिचकुर निकल गया ।नहाने के थोड़े ही देर बाद बुखार चढ़ा और इतना बदन दर्द की एक सफ्ताह कराहते बीते । तब अहसास हुआ कि जमादार माने क्या । इस अहसास से गुजरे बिना आप जमादार होने के अहसास को बयां ही नहीं कर सकते ।यही बात पेड़ों के साथ भी समझिए ।

वो पेड़ जो चिलचिलाती गर्मी में जीवन पर पैरों पर खड़ा ही रहेगा ,विश्राम जिसे उपलब्ध ही नहीं है, वह अपने भोजन के निर्माण के दौरान हम सबके जीवन के लिए आक्सीजन बनाता है ।न जाने किस दुष्कर्म के प्रायश्चित के लिए उसे दिन भर अपने साथ हमारी भी चिंता करनी पड़ती है ! भोजन भी बस अपने निमित्त नहीं बनाता। मानव के लिए भोजन, लकड़ी, औषधि के साथ ही जानवरों के लिए भी चारा उपलब्ध कराता है । अपने विस्तार और विकास के  साथ वह जीव ,जंतुओं ,पक्षियों को आश्रय देता है , और पथिकों को छाया । जानवर और पक्षी तो उससे लिपटकर ,देह रगड़कर अपना प्यार दुलार भी प्रदर्शित कर देते हैं लेकिन मानव ! 

 1 मई, 1886 को मजदूरों ने रोजाना 15-15 घंटे काम कराने का विरोध किया लेकिन पेड़ वो तो अभिशप्त हैं दिन रात काम के लिए । ये काम तो उनकी नियति है ,इस पर विद्रोह नहीं कर सकते, लेकिन लोहे के संकरे जेलखानों  का तो विद्रोह कर सकते थे ! विस्तार की जगह न मिलती तो सूख ही जाते । असहयोग आन्दोलन करते ।लेकिन जीने की इच्छा ऐसी बलवती होती है कि हर कष्ट ,हर चुनौती में भी हरी भरी रहती है। 

मैंने प्रयागराज , टैगोर टाऊन इलाके के कुछ वृक्षों की फोटो लॉक डाउन के पहले खींची थी ।टहलते समय मुझे ऐसा लगता है कि चीख चीख कह रहे हों ,मुक्ति दिला दो इन जेलखानों से । कई वृक्षों ने तो लोहे के बाड़ों को अपनी देह में ही समा लिया है ।कई टेढ़ा खड़े होने को मजबूर हैं ।कई बीच -बीच के खानो से अपने हाथ बाहर पसार कर मुक्ति की गुहार लगाते हैं । टीसते घावों के बाद भी वह मौसम में  फूलों से गदराना नहीं छोड़ते ।वह दिखाते हैं कि कष्ट कैसा भी हो जीवन में ,उससे मुरझाएंगे नहीं। अपने फलने फूलने से मानव को धता बताएंगे । देख मानव तू तो सब पाकर भी कुंठित रह जाता है ,हमें देख! हम कैद में भी श्रृंगार करते हैं !

वन विभाग वृक्षों की  सुरक्षा के लिए जो बाड़े बनाता है , वही इनके असहनीय कष्ट का कारण बन जाता है । मैं पाठकों से अनुरोध करती हूं कि  देश भर में ऐसी असह्य पीड़ा झेल रहे इन अनगिनत प्राण वायु उत्पादक मजदूर वृक्षों को मुक्ति दिलवाने के लिए प्रयास करें । नगर निगम या वन विभाग से सम्पर्क कर इनका उद्धार किया जाय  ।यह हमारा इन पर उपकार नहीं ,अपितु कर्तव्य है ।सच्ची सेवा है ।

लेखिका डॉ मुदिता तिवारी , आर्य कन्या डिग्री कॉलेज ,  प्रयागराज, सम्बद्ध इलाहाबाद विश्व विद्यालय के  हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 

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