आज का वेद चिंतन विचार मांडूक्योपनिषद छठा उपनिषद

उपनिषदों में मांडूक्य उपनिषद श्रेष्ठ माना जाता है। मांडूक्य यानी मेंढक का उपनिषद। कहा गया है कि पहले इस उपनिषद को सुनें। यह सुनकर ज्ञान हुआ तो ठीक नहीं तो दस उपनिषद सुनें। मांडुक्य उपनिषद नन्हा – सा है। और वह ओंकार की व्याख्या में ही समर्पित है। उसमें विश्व – तेजस् – प्राज्ञ इन तीन अवस्थाओं का जिक्र है। विश्व यानी विश्वोपाधि धारण करने वाला आत्मा। सादी भाषा में विश्वात्मा। उसमें जागृति है।

तेजस् यानी स्वप्न में का आत्मा। स्वप्न में आत्मा उठा और यहां से काशी चला गया। ट्रेन से काशी जाएंगे तो दो दिन लगते हैं । स्वप्न का आत्मा झट पहुंच जाता है। कभी चंद्र पर जाता है, पिताजी देवलोक में होंगे तो वहां भी जा सकता है । ऐसा तेजस्वी आत्मा है। प्राज्ञ यानी गहरी निद्रा में आत्मा परमात्मा में लीन हुआ रहता है । शंकराचार्य कहते हैं, सर्वकालीन ज्ञान से भरी जो निद्रा है वह तुम लो। कहां लोगे ? तुरीय – तलपे – तुरीय के बिस्तर पर। मांडूक्य उपनिषद कहता है- अयमात्मा ब्रह्म। सोअयमात्मा चतुष्पाद। अयमात्मा ब्रह्म महावाक्य है और चतुस्पाद यानी विश्व,तेजस्, प्राज्ञ, तुरीय।

हमारा विचार अत्यंत अव्यवहार्य है ,यह उपनिषद खुद कह रहा है। विलक्षण ग्रंथ है। उसकी शुरुआत ही अव्यवहार्यम् से होती है। अव्यवहार्यम्, अग्राह्यम्, अलक्षणम्,अचिंतयम्, अव्यपदेश्यम् , एकात्मप्रत्यवसारम्, प्रपंचोपशमम्, शांतम्,शिवम् अद्वेतम् एक द्वैती का दूसरे द्वैती के साथ विरोध हो सकता है।पर अद्वैती का किसी के साथ कोई विरोध नहीं । जो समग्र को नहीं मानते, अंश को मानते हैं- चाहे वह अंश कितना भी बड़ा हो , वे अंशवादी होते हैं।

उन्हें द्वैतवादी कहते हैं।वे लोग अपने निश्चय में पक्के होते हैं और अपने – अपने विचार को श्रेष्ठ मानते हैं। इसलिए वे एक दूसरे के विरोध में खड़े होते हैं। वे अपने धर्म, पक्ष को बढ़ावा देना चाहते हैं, तथा आपस -आपस में झगड़े पैदा करते हैं। जहां द्वैत आता है वहां झगड़ा आ सकता है, पर अद्वैत में कोई झगड़ा नहीं रहता। अद्वैत सबको अपने पेट में समा लेता है। विनोबा भावे

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