सरकार पर लगाम लगाने का वक्त आ गया है

दिलीप कुमार , सीनियर एडवोकेट, इलाहाबाद हाईकोर्ट

सरकार बदलने का समय नहीं है, हां सरकार पर लगाम लगाने का वक्त आ गया है . 

राष्ट्र के बहुसंख्यक समझदार नागरिकों ने नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व को आस्था के साथ स्वीकार किया और उनकी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी को अपना समर्थन देकर सत्तारूढ़ किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र में एवं भारत गणराज्य के अधिकतर प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी. कुछ कुछ अपवाद के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कमजोर नेतृत्व के कारण जनता का विश्वास खो दिया. यहां तक कि एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने में भी इस पार्टी ने कोई सार्थक कदम नहीं उठाए. केवल सत्ता दल के नेतृत्व की व्यक्तिगत आलोचना विपक्षी दल की कर्तव्य परायणता नहीं मानी जा सकती .

आज विश्व स्तर पर कोरोना महामारी से हमारा राष्ट्र  विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है. राष्ट्र की बाहरी सीमाओं पर भी पड़ोसी मुल्कों का दबाव बढ़ रहा है. ग्रीष्म काल में बढ़ते हुए तापमान ने देश के किसान मजदूर और निचली आय  के नागरिकों को एक असहनीय संकट में ला खड़ा किया है.

 मैं एक वरिष्ठ नागरिक के वर्ग से आता हूं . शायद बहुत छोटी सी अंश में वरिष्ठ नागरिकों के वर्ग को सहूलियतें  दी गई है.

आज इनके एवज में इस वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह समाज के युवान महिलाएं एवं तरुणाई के लिए यह आवाहन करें की लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की निरंकुशता राष्ट्र एवं समाज को पीछे धकेल देती है.

 भारत गणराज्य का नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक है और इतिहास गवाह है कि जब कभी लोकतंत्र के नाम पर सत्ता पक्ष ने निरंकुश होने का प्रयास किया तो जनता ने सही समय पर उनको सही सबक सिखाया.

आपातकाल में तत्कालीन निरंकुश सत्तासीन पक्ष ,अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के पूर्वी भाग को बांग्लादेश के रूप में स्थापित करने में सफलता के बाद, अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्ता में बने रहने की ज़िद के अधीन हो निरंकुश हुआ.  निरंकुशता के विरुद्ध उठी हर आवाज को कुचलने का कुत्सित प्रयास किया गया. नतीजा सबको पता है प्रतिक्रिया स्वरूप चू- चू के मुरब्बे के समान विपरीत विचारधारा के लोग इकट्ठे होकर जनता द्वारा सत्तासीन किए गए. अल्प समय की यह व्यवस्था आपस में वाद विवाद में उलझ कर सत्ता खो बैठी.

 आज 2020 के दशक में एक बार फिर सत्ता पक्ष की निरंकुशता की दस्तक सुनाई दे रही है लोकतंत्र के सभी स्थाई खंभों में दरार स्पष्ट नजर आ रही है. विधायी  क्षेत्र में विपक्ष अपने कमजोर नेतृत्व के कारण लोकतंत्र के प्रति सजग भूमिका निभाने में पूर्णतया असफल रहा है. कार्यपालिका क्षेत्र में सत्ता पक्ष अपनी मनमानी करने में पीछे नहीं है. लोकतांत्रिक प्रणाली की  यह खामी निरंकुशता का रास्ता अपना लेती है.

 न्यायपालिका के प्रति भी वह आस्था और विश्वास दिखायी नही देता नहीं है,  जो संविधान के अनुरूप अपेक्षित है. मैं स्वयं एक अधिवक्ता हूं और मुझे अपनी न्यायपालिका पर गर्व है. आज की इस विषम परिस्थिति और काल में लोकतंत्र को निरंकुशता से बचाने के लिए न्यायपालिका की गुरु तर भूमिका है मोटे तौर पर किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है. आत्मालोचन की जरूरत है . राष्ट्र के संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूलभूत अधिकार के अध्याय में समाहित किया है. आज विज्ञान और भौतिकता की दुनिया में मीडिया की लोकतंत्र में बड़ी भूमिका है इस संस्था को जनता का भरपूर समर्थन प्राप्त है.  मैं बड़े अदब के साथ यह कहने में संकोच नहीं कर रहा हूं कि  इस संस्था ने भी अपने गंभीर कर्तव्य बोध से मुंह मोड़ लिया है और कमोबेश सत्ता पक्ष की निरंकुशता के बादल इस पर भी छा गए हैं.  शायद व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आर्थिक संपन्नता आदि  से अभिभूत होकर लोकतंत्र के इस अंग को भी ग्रहण लग गया है. इस खंभे को सुचारू बनाने का सही समय आ गया है. निरंकुशता की दस्तक पर जनता की आवाज बुलंद करने हेतु मैं बिना किसी दलगत राजनीति अथवा व्यक्तिगत  द्वेष- विद्वेष के विनम्र प्रार्थना करता हूं कि भारत का जागरूक नागरिक अपना कर्तव्य निभाने हेतु बढ़कर आगे आए और निरंकुश सत्तासीन पक्ष पर लगाम लगाकर उसे सही दिशा पर ले चले, ताकि सत्ता पक्ष लोकतंत्र को स्थाई रूप से  मजबूती  प्रदान कर सके. हमें यह विश्वास है कि  सत्ता पक्ष जनता जनार्दन की इस लगाम के इशारे को ठीक से समझ कर राष्ट्र एवं समाज को उन्नति की राह पर ले चलने में सक्षम है और उसका आगे का कदम राष्ट्रहित में ही बढ़ेगा.

लेखक  दिलीप कुमार , वरिष्ठ अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं न्यासी इटावा हिंदी सेवा निधि.

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