राम मंदिर: मोदी के अयोध्या दौरे को लेकर काशी के पंडितों ज्योतिषाचार्यों में रार ठनी

(मीडिया स्वराज़ डेस्क) 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 5 अगस्त को राम मंदिर का भूमि पूजन/  शिलान्यास करने जा रहे हैं। लेकिन इसके मुहूर्त को लेकर  इसके मुहूर्त को लेकर संत समाज दो धड़ों में बंट गया है।ज्योतिष के लिए प्रसिद्ध काशी नगरी में इस पर शास्त्रार्थ  की चुनौती आ गयी है. 

इस बीच  स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि शास्त्रार्थ जनता में फैले भ्रम को स्पष्ट करने की स्पष्ट विधा है। इसीलिए श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण मुहूर्त पर उठे विवाद पर शास्त्रार्थ होना चाहिए। वह इसके लिए स्थान व अन्य व्यवस्था उपलब्ध कराने को तैयार हैं।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने कहा है कि वादे वादे जायते तत्वबोधः अर्थात् वाद-विवाद और संवाद से ही सत्य तत्व निकलकर सामने आता है। प्राचीन काल से ही हमारे देश में सत्य पक्ष को स्थापित करने और असत्य पक्ष को हटाने के लिए शास्त्रार्थ की परिपाटी रही है। आज भी भले ही इसका वह प्राचीन स्वरूप न रहा हो पर वाद-विवाद को समाज में सत्य पक्ष की स्थापना के लिए स्वीकार किया गया है। आगामी 5 अगस्त 2020 को अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि में मन्दिर निर्माण के लिए शिलान्यास का मुहूर्त काशी के आचार्य पण्डित गणेश्वर शास्त्री द्रविड जी ने निकाला है। उन्होंने 32 सेकेण्ड का मुहूर्त बताया है जिसके आधार पर प्रधानमंत्री द्वारा शिलान्यास किया जाना निश्चित हुआ है।

इस मुहूर्त को गलत बताकर पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपना विरोध प्रकट किया है। इसके लिए उन्होंने अनेक शास्त्रों से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं और यह भी कहा है कि अशुभ मुहूर्त में किए गये कार्यों का दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि पूज्य शंकराचार्य जी द्वारा मुहूर्त पर दिए गये वक्तव्य सोशल मीडिया सहित अखबारों और टेलीविजन के कुछ चैनलों पर प्रसारित हुए। तभी से पूरे देश के विद्वान् और ज्योतिषी दो भागों में बॅट गये हैं। कुछ शास्त्र के अर्थात् शंकराचार्य जी के पक्ष को प्रमाण मान रहे हैं तो कुछ गलत मुहूर्त बताने वाले आचार्य द्रविड जी को। ऐसे में इस सम्बन्ध में किसका पक्ष सही और शास्त्रीय है यह जानने के लिए पूरा देश उत्सुक है। हमने समाचार माध्यमों से यह जाना कि काशी के अंकित तिवारी नाम के ज्योतिषी ने आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्रविड जी को शास्त्रार्थ की चुनौती को स्वीकार कर लिया है।
पूरे देश के सामने शास्त्र का सही पक्ष सिद्ध हो इसके लिए शास्त्रार्थ होना समय की मांग है। इस शास्त्रार्थ के आयोजन के लिए हम स्थान सहित अन्य व्यवस्था करने को तैयार हैं।

 शास्त्रार्थ का यह नियम होता है कि पहले दोनों पक्ष अपनी ओर से 5-5 नाम उपलब्ध कराते हैं। फिर उनमें से जो नाम दोनों पक्षों की ओर से आता है उन्हीं को शास्त्रार्थ का मध्यस्थ स्वीकार किया जाता है। इसके बाद तिथि, स्थान, समय एवं शास्त्रार्थ की शर्तें तय होती है और शास्त्रार्थ आरम्भ होता है।
यदि मुहूर्त बताने वाले आचार्य गणेश्वर शास्त्री और अंकित तिवारी दोनों उपर्युक्त बातें तय करें तो हम इस महत्वपूर्ण विषय पर शास्त्रार्थ के लिए श्रीविद्यामठ का स्थान और अन्य व्यवस्था करने को तैयार हैं।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आगे कहा :

यह तरीका कब से निकल गया कि जिसे चुनौती दी जा रही है उसके घर में हम जाएं। अगर शास्त्रार्थ सचमुच उनको स्वीकार है तो उनको किसी ऐसे स्थान पर जाना चाहिए जो दोनों पक्षों के लिए कॉमन हो और इसीलिए श्री विद्या मठ ने यह पेशकश की है कि अगर शास्त्रार्थ होना है तो उसके लिए स्थान उपलब्ध कराने के लिए श्री विद्या मठ तैयार है .

 जरूरी नहीं है कि द्रविड़ जी की बीमारी के समय में उन से शास्त्रार्थ किया जाए अगर वह कह रहे हैं कि वे बीमार हैं तो उनको स्वस्थ होने दिया जाए. स्वस्थ होने के बाद वह अपनी बात को सिद्ध करें लोगों के बीच में सिद्ध करें. आश्चर्य होता है कि मुहूर्त बताने के लिए 5 पृष्ठ का पत्र तैयार करने के लिए वे बीमार नहीं है और उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने के लिए वे बीमार हैं .

 चुनौती स्वीकार करते हैं लेकिन कहते हैं हमारे घर में आ जाइए . कोई किसी के घर में कैसे प्रवेश करेगा? इसका मतलब है कि वह 7 साल के लिए तैयार नहीं है.  अगर शास्त्रार्थ  के लिए  तैयार हैं तो दोनों पक्ष 5 – 5 नाम ऐसे लोगों का बताएं जिनको वह मध्यस्थ के रूप में स्वीकार करना चाहते हो,  और तय  करें कि कौन सी जगह होगी, कौन सा दिन होगा कौन सा समय होगा. क्या बिंदु होगा,  विचार का . कौन-कौन से ग्रंथ में प्रमाण माने जाएंगे.  किस भाषा में शास्त्रार्थ होगा.  लिखित होगा कि मौखिक होगा आदि आदि .

वैसे द्रविड़ जी ने अपना दूसरा पत्र जारी करके अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास किया है.  इसी से सिद्ध हो जाता है कि उनके पहले पत्र में उनसे गलतियां हुई थी,  दूसरे पत्र में भी गलतियां हैं , ठीक उसी तरह से जैसे उनके पहले पत्र में थी.  अगर पहले पत्र में गलती नहीं थी तो फिर दूसरा पत्र उनको क्यों जारी करना पड़ा?

शंकराचार्य जी सनातन धर्म के सर्वोच्च आचार्य हैं, उनका यह दायित्व है कि धर्म का कार्य अगर कहीं पर हो रहा हो तो वह अपनी बात कहें। मुहूर्त की बात करना और बिना मुहूर्त के मुहूर्त बनाना यह मुहूर्त के साथ अन्याय है . अगर आप मुहूर्त नहीं मानते तो आर्य समाजियों की तरह आप कहिए कि मुहूर्त नहीं मानते,  हम तो अपनी सुविधा के अनुसार करेंगे लेकिन अगर आप मुहूर्त मानते हैं तो फिर सच्चा मुहूर्त मानिए.

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