संजय उवाच: विकास दुबे का सच कई महानायकों की कीर्ति हर लेगा

दीपक गौतम, स्वतंत्र पत्रकार, सतना (मध्य प्रदेश

—दीपक गौतम, स्वतंत्र पत्रकार, सतना मध्यप्रदेश

प्रश्न: विकास दुबे गिरफ्त में आकर भी बच नहीं पाया संजय ! अब आगे क्या ?
उत्तर: महाराज, मुझे क्षमा करें, लेकिन यह गिरफ्त नहीं प्राण बचाने के लिए किया गया रणनीतिक सरेंडर था. लेकिन दुबे जिस राजनीतिक संरक्षण से अब तक जीवित था वही उसका काल बन गया प्रभु. इसके पीछे किसी शक्तिशाली गरिष्ठ, वरिष्ठ या कनिष्ठ का वरदहस्त लग रहा है. यदि वह जीवित रहता तो कई चेहरों का सच सामने आ जाता, जो राजनीति के कई महानायकों की कीर्ति हर लेता राजन.

प्रश्न: तो क्या इसीलिए दुबे का एनकाउंटर कर दिया गया संजय ?
उत्तर: महाराज, राजनीति कई धड़ों में बंटी है और यहां सत्तालोलुप लोग कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहते हैं. एक धड़े ने उसको उज्जैन लाकर अपना मनोरथ सिद्ध करना चाहा था, लेकिन जिनके घिनौने चेहरे दुबे का मुंह खुलने से बाहर आ सकते थे, वो भला चुप कैसे रह सकते थे. यहां शतरंज के खेल की तरह प्यादों को कुर्बान कर शह और मात दी जाती है. विकास दुबे का एनकाउंटर भी इसी राजनीतिक शतरंज की बिसात है महाराज. इसमें प्यादे तो लगातार शहीद हो रहे हैं, लेकिन राजा सुरक्षित है. आप देखिए प्रभु कि विकास के सभी साथी भी ढेर कर दिए गए हैं, ताकि सच्चाई भी उन्हीं के साथ दफन हो जाए. अब तो सच से परे कुछ नई रोचक कहानियां ही सामने आएंगी

प्रश्न: क्या इस शतरंज का असली खिलाड़ी सामने आएगा संजय ?
उत्तर: महाराज, असली मोहरा तो वजीर ही है, जो प्यादे के पीछे बैठा है. लेकिन इसे चलने वाला खिलाड़ी अभी दिखाई नहीं दे रहा है. उसे सामने आने में कितना समय लगेगा यह कहना अभी संभव नहीं है. अब तो घटनाक्रमों को जोड़कर ही निष्कर्ष निकाले जाएंगे. मैं देख रहा हूं कि दुबे अपने आकाओं के गले की हड्डी बन गया था भगवन. इसलिए उसे मारकर कई लोगों की राजनीतिक आभा को जीवनदान दिया गया है. आप मेरे कम कहे में अधिक समझिए राजन.

प्रश्न: यह तो विषधर पालकर बाद में उसे ही कुचलना हुआ संजय ?
उत्तर: जी हां महाराज, अब राजनीति पहले जैसी नहीं रही है, उसे संचालित करने वाले सिंडीकेट में अपराधियों की बड़ी भागीदारी है. इन विषधरों को अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए पहले यही सत्ताधारी पालते-पोषते हैं. आज इन्हीं के जहर से राजनीति का पेड़ हरियाता है. लेकिन बाद में बड़े होकर जब ये विषधर उन्हें ही डसने लगते हैं, तब उनका फन कुचल दिया जाता है. दुबे का इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है. कालांतर में यदि दो दर्जन से ज्यादा गवाह मुकरे नहीं होते, तो आज विकास दुबे विषधर नहीं बनता, उसके पालन-पोषण की कहानी बहुत कुछ कहती है महाराज.

प्रश्न: तो क्या दुबे विषधर बनने के बाद पश्चाताप स्वरूप भोले बाबा से लिपटने आया था संजय ?
उत्तर: महाराज, यह पश्चाताप कम प्राण बचाने की कोशिश अधिक थी. क्योंकि विषधर अपने स्वामियों की जगह उनके विरोधियों के आशीर्वाद और सरंक्षण से यहां पहुंचा था. अब जब उसके पालनहार ही उसके वध के लिए अग्रसर हों, तो जीवित रहना कहां तक संभव है प्रभु. सबसे अधिक चिंता का विषय इन विषधरों को मिला विष है, जो प्रकृति से नहीं बल्कि हमारी राजनीति से मिलता है.

(NOTE ; संजयउवाच महाभारत के दो प्रमुख पात्रों के सहारे विभिन्न विषयों पर व्यंग्य लिखने की एक कोशिश है। इसका महाभारत से कोई संबन्ध नहीं है.)

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