उपेक्षा से बदहाल शिक्षा और शिक्षक

               

 

संतोष कुमार
डॉ संतोष कुमार, असिस्टेंट  प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार  

पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम से जब पूछा गया कि वह दुबारा राष्ट्रपति बनेंगे? उनका जवाब था कि वह अब बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। कलाम साहब की लोकप्रियता इतनी थी कि वह बिना किसी विशेष प्रतिरोध के पुनः भारत के सर्वोच्च पद पर आसीन हो सकते थे। किन्तु विद्या के प्रति उनकी भावनाएं अधिक प्रबल थीं। शिक्षा का क्षेत्र ही ऐसा है जहाँ सृजनशील व्यक्ति स्वयं को सर्वाधिक उपयुक्त पाते हैं। शिक्षक दिवस जिनकी स्मृति में मनाया जाता है, वह भी एक राष्ट्रपति ही थे। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की विद्वता उन्हें एक महान शिक्षक बनाती थी। भारत में शिक्षा और शिक्षक दोनों हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। इसी कारण भारत को विश्व गुरु के नाम से जाना जाता रहा है। कबीरदास तो शिक्षक को भगवान से बड़ा दर्ज़ा देते हैं। भारत की संस्कृति में गुरु को जीवन का सूर्य माना जाता है। स्वामी विवेकानंद उसे मनुष्य के आध्यात्मिक पिता की संज्ञा देते हैं। वह कहते हैं कि शिक्षक ही  मनुष्य को जीवन जीने योग्य बना सकते हैं। 

प्राचीन काल से ही भारत में ज्ञान के प्रति सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टिकोण रहा है। शायद ही ऐसा कोई ग्रन्थ हो जिसमे ज्ञान के प्रति उदासीनता प्रदर्शित की गई हो। ऐसा नहीं है कि तब से अब तक शिक्षा एक धारा में गतिशील रही हो। राजनीतिक परिवर्तनों ने शिक्षा को प्रभावित किया। मध्यकाल में शिक्षा का स्वरुप मूलतः धार्मिक था और निश्चित दायरे में ज्ञान की बातें होती थीं। आधुनिक काल में, ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा औपनिवेशिक सोच से व्यापक रूप से प्रभावित थी। आज़ादी के बाद शिक्षा का मूल उद्देश्य नए भारत के निर्माण में सहायक मानव संसाधन का सृजन करना था। शिक्षा पर सबसे हालिया प्रभाव उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर में आया। आज के भारत में शिक्षा और शिक्षक दोनों पर इस संक्राति का सर्वाधिक प्रभाव है। 

शिक्षा की पूरी प्रक्रिया में शिक्षक की अहम भूमिका है। लेकिन अब हालात तेज़ी से बदल रहे हैं।  जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा था कि अलीबाबा के पास सामान नहीं है और ओला के पास अपनी टैक्सियां नहीं है फिर भी ये बड़े व्यवसायी हैं। आज शिक्षक से अधिक अध्यापन के सुविधा प्रदाता महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।  इसका सीधा असर शिक्षा और शिक्षकों पर पड़ रहा है। यह वैसा ही है कि आलू -टमाटर उगाने वाले किसान से अधिक लाभ चिप्स और टोमैटो सॉस बनाने वाले पा रहे हैं।  वे सरकारी तंत्र हो या निजी, ऐसी कोशिशें हो रही हैं जो शिक्षक को नेपथ्य में करती हैं। आइये कुछ प्रत्यक्ष उदाहरणों से समझने  का प्रयास करते हैं। 

कानपुर नगर जनपद की घाटमपुर तहसील में एक गाँव है जमालपुर।  यहाँ रहने वाले शिक्षक अश्वनी शुक्ला एक निजी विद्यालय में पढ़ाते हैं। वो कहते हैं कि पूरे कोरोना काल में उन्होंने बच्चों के लिए अनथक श्रम किया कि उनकी पढाई न प्रभावित हो। किन्तु उन्हें कई महीनों का वेतन नहीं दिया जा रहा है। वह आगे कहते हैं कि विद्यालय का संचालन एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी करते हैं। इसलिए वह अपनी मनमानी कर रहे हैं। उनके अनुरोध करने पर भी वह वेतन नहीं दे रहे हैं। 

दूसरा उदाहरण एक सरकारी स्कूल में कार्यरत शिक्षिका का है। नाम न छापने की शर्त पर वह कहती हैं कि उनके बच्चे और पति लख़नऊ में रहते हैं। पति ही बच्चों का पालन पोषण करते हैं। जबकि वह कानपुर देहात में कार्यरत हैं।  उनके बच्चे की तबियत ख़राब होने पर उन्होंने अवकाश का प्रार्थना पत्र दिया था।  किन्तु उसे निरस्त कर दिया गया। इसके अलावा उनके अवशेष वेतन को विभाग पाँच साल से लटकाये हुए है। इससे बड़ी बात यह है कि महिला होकर भी उन्हें अपने कार्य के लिए 140 किमी रोज यात्रा करनी पड़ती है। जबकि अनेक पुरुष अध्यापकों को समीपस्थ तैनाती दी गयी है।  वो आगे कहती हैं कि उन्होंने अपने बच्चे की परीक्षा से पहले बाल्य देखभाल अवकाश का प्रार्थना पत्र दो बार दिया था।  किन्तु दोनों बार उसे निरस्त कर दिया गया था।  शिक्षा अधिकारियो के इस उत्पीड़न से वह बेहद परेशान हैं।  वह सुबकते हुए कहती हैं कि उनके बच्चे ही माँ विहीन हो गए हैं। वह अपने ही बच्चों की उपेक्षा से अपराधबोध  से ग्रस्त महसूस करती हैं।  

ये दोनों उदाहरण सिद्ध करते हैं कि शिक्षकों की घोर उपेक्षा हो रही है। निजी संस्थान निरंकुश हो चले हैं तो वहीँ शिक्षा अधिकारी तानाशाहों की तरह शिक्षकों से पेश आ रहे हैं। कुल मिलाकर व्यवसायी और नौकरशाह शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक उस बाड़ की तरह है जो अपने ही खेत खा रही है। सरकारी स्कूलों में कोरोना के समय शिक्षा अधिकारियों के लचर रवैये के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में एक तरह से शिक्षा ठप्प हो गयी है। जबकि ऑनलाइन व्यवस्था होने पर भी शिक्षकों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। जो शिक्षिका  पूरे हफ़्ते प्रतिदिन  140  किमी यात्रा करेगी, वह स्वस्थ मन से अध्यापन कार्य कैसे कर सकती है ?  उसका पूरा ध्यान अपनी सुरक्षा और यात्रा प्रबंधन में ही लगा रहता है। वहीँ किसी अध्यापक को वेतन न देना गंभीर नैतिक अपराध है।  

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